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Sawan Somwar 2026: सावन का पहला सोमवार! आज शाम को बस इतनी देर रहेगा पूजा का शुभ मुहूर्त

Sawan Somwar 2026: सावन के पहले सोमवार का हिंदू धर्म में विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि इस दिन शिवलिंग पर जल चढ़ाने से भोलेनाथ अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं. इस दिन भक्त शिवलिंग पर भांग, धतूरा, दूध, भस्म, रुद्राक्ष और खासतौर से बेलपत्र भी अर्पित करते हैं.

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सावन के पहले सोमवार आज शाम बस इतनी देर रहेगा पूजा का मुहूर्त. (Photo: ITG)
सावन के पहले सोमवार आज शाम बस इतनी देर रहेगा पूजा का मुहूर्त. (Photo: ITG)

Sawan Somwar 2026: आज सावन का पहला सोमवार है. सावन के पहले सोमवार का हिंदू धर्म में विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि इस दिन शिवलिंग पर जल चढ़ाने से भोलेनाथ अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं. इस दिन भक्त शिवलिंग पर भांग, धतूरा, दूध, भस्म, रुद्राक्ष और खासतौर से बेलपत्र भी अर्पित करते हैं. ज्योतिषविदों का कहना है सावन के सोमवार सुबह और शाम दोनों प्रहर भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए. सुबह की पूजा के बाद अब लोग शाम की पूजा करेंगे. आइए आपको बताते हैं कि सावन के पहले सोमवार शाम की पूजा का मुहूर्त क्या है.

सावन सोमवार पर शाम की पूजा का मुहूर्त
गोधुली मुहूर्त-
शाम 06.53 बजे से शाम 07.14 बजे तक
सायाह्न संध्या- शाम 06.53 बजे से शाम 07.57 बजे तक

स्नान-दान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन के सोमवार व्रत रखने वाले लोग यदि शाम के समय भोलेनाथ का ध्यान करें अत्यंत लाभकारी माना जाता है. इस समय भगवान का स्मरण करें और अपने इष्ट देवों को योद करें. इससे आपके घर में सुख-समृद्धि हमेशा बनी रहेगी. संध्या काल में पूजा पाठ के बाद गरीब और जरूरतमंद लोगों को दान करना बिल्कुल न भूलें. पूजा-पाठ के बाद सफेद चीजों का दान करें. आप दूध, दही, चावल, चीनी, आटा, खीर या खाने की सामग्री दान कर सकते हैं.

भोलेनाथ की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

ओम जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥

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ओम जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥

ओम जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥

ओम जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥

ओम जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥

ओम जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥

ओम जय शिव ओंकारा॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥

ओम जय शिव ओंकारा॥

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥

ओम जय शिव ओंकारा॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥

ओम जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥

ओम जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ओम जय शिव ओंकारा॥

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