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कर्नाटक और केरलम में कांग्रेस के भीतर सत्ता के बंटवारे का पार्ट 2, कौन बनेगा प्रदेश अध्यक्ष?

कांग्रेस शासन वाले राज्यों में नेतृत्व का मसला हल करने के बाद राहुल गांधी संगठन में बदलाव करने जा रहे हैं. केरल और कर्नाटक के अलावा जोर उन राज्यों पर भी है, जहां आने वाले दिनों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं - और ध्यान यह रखा जा रहा है कि सब कुछ मिशन 2029 के हिसाब से दुरुस्त हो.

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कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी. (Photo: PTI)
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी. (Photo: PTI)

कर्नाटक में भी सब कुछ केरल की ही तरह फाइनल है. शपथग्रहण जैसी महज कुछ औपचारिकताएं बाकी हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन की तरह राज्यों का दौरा कर रहे हैं. राजस्थान के बाद उत्तराखंड दौरे का कार्यक्रम बना है. 

तैयारी 2029 की है, लिहाजा सब कुछ दुरुस्त करना है. जहां सत्ता मिली है, वहां सरकार और बाकी जगह संगठन. पहले उन राज्यों में जहां चुनाव हो चुके हैं या फिर विधानसभा चुनाव होने हैं. केरल में सत्ता समीकरण ठीक करने की हर संभव कोशिश हुई, अब संगठन में जिम्मेदारियां देकर पावर बैलेंस करना है. 

एक रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस फिलहाल 6 राज्यों में संगठन में बदलाव कर सकती है. दो राज्य तो केरलम और कर्नाटक ही हैं. केरल जहां चुनाव के बाद कांग्रेस की सरकार बनी है, और कर्नाटक जहां नेतृत्व परिवर्तन हुआ है. सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री पद छोड़ देने के बाद डीके शिवकुमार कमान संभालने जा रहे हैं. 

कर्नाटक और केरल में सरकार के कामकाज को शेप देने के बाद संगठन में उसी हिसाब से बदलाव करने हैं. कर्नाटक और केरल के साथ तमिलनाडु में भी कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति होनी है. उत्तर प्रदेश और पंजाब में अगले साल चुनाव होने हैं, ऐसे में वहां काफी सोच-समझकर फैसला लिया जाना है. कांग्रेस में बदलाव की बयार तो राजस्थान में भी महसूस की गई है. 

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प्रदेश कांग्रेस कमेटियों के अध्यक्ष के साथ साथ राज्यों के प्रभारी भी बदले जा सकते हैं - और राहुल गांधी के ताजा और आगे होने वाले दौरे को ऐसे ही संभावित बदलावों से जोड़कर देखा जा रहा है. 

कर्नाटक कांग्रेस में अब क्या होने वाला है

कर्नाटक में राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ी समस्या थी डीके शिवकुमार से किए गए वादे पूरे कर पाना. बड़े दिनों बाद ऐसा कोई वादा पूरा हो पाया है. वरना, राजस्थान में सचिन पायलट और छत्तीसगढ़ में टीएस सिंह देव तो बस इंतजार ही करते रह गए. सिद्धारमैया की तरह न तो अशोक गहलोत ने बड़ा दिल दिखाया, न ही भूपेश बघेल ने. 

डीके शिवकुमार अब मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. चुनावी जिम्मेदारियों का एक पूर्ण चक्र पूरा कर चुके हैं. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत दिलाई, सरकार भी बनवाई और तीन साल के इंतजार और संघर्ष के बाद अब मुख्यमंत्री भी बन रहे हैं. 

मध्य प्रदेश में तो कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी अध्यक्ष पद छोड़ने को तैयार नहीं हुए थे. सत्ता से हाथ धो बैठे मगर ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए कोई स्कोप नहीं छोड़ा. अब कर्नाटक कांग्रेस में डीके शिवकुमार का उत्तराधिकारी चुना जाना है, और उसका सेलेक्शन नए मंत्रिमंडल के गठन पर निर्भर करेगा. जो मंत्री बनेगा, उसे तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद मिलने से रहा. अब हर कोई डीके शिवकुमार तो होता नहीं. डीके शिवकुमार कांग्रेस अध्यक्ष के साथ साथ सरकार में डिप्टी सीएम की जिम्मेदारी भी संभाल रहे थे. 

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फिलहाल सतीश जारकीहोली को कर्नाटक में कांग्रेस अध्यक्ष पद का सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा है. सतीश जारकीहोली अभी तक सिद्धारमैया की सरकार में मंत्री हुआ करते थे. अगर सतीश जारकीहोली मंत्री नहीं बनते, तब अध्यक्ष पद के दावेदार भी हो सकते हैं. 

कर्नाटक में डिप्टी सीएम पद का भी बंटवारा होना है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियांक भी एक दावेदार हैं. सिद्धारमैया के बेटे भी मंत्री बनने जा रहे हैं. ऐसे में जो मंत्री नहीं बनेगा, उनमें से ही कोई अध्यक्ष बनेगा. नए अध्यक्ष की भी डीके शिवकुमार जितनी ही जिम्मेदारी होगी - 2029 के आम चुनाव में कांग्रेस की झोली में ज्यादा से ज्यादा सीटें डाल देने की कोशिश करना. 

कर्नाटक कांग्रेस की कमान बीके हरिप्रसाद को भी सौंपी जा सकती है, सूत्रों के हवाले से आई इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है. और, कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष पर फैसला डीके शिवकुमार के शपथ लेने से पहले भी लिया जा सकता है. 3 जून को डीके शिवकुमार शपथ लेने वाले हैं, और उससे पहले दिल्ली में बहुत सारी माथापच्ची होनी है. 

सारी बातें एक तरफ, और सिद्धारमैया की बात एक तरफ. सिद्धारमैया की कुर्बानी के लिए कोई एक्सचेंज ऑफर भी तो होगा. अव्वल तो सिद्धारमैया को राज्यसभा की सीट और दिल्ली में बड़ी भूमिका का ऑफर राहुल गांधी की तरफ से दिया गया है. हालांकि, सिद्धारमैया ने विनम्रतापूर्वक राहुल गांधी का ऑफर ठुकरा दिया है. 

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78 साल के सिद्धारमैया कर्नाटक की राजनीति में ही बने रहना चाहते हैं. एक शर्त उनकी पहले से ही थी कि वो डीके शिवकुमार के नीचे काम नहीं करेंगे - सिद्धारमैया को कर्नाटक कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर उनको भी खुश किया जा सकता है. 

सत्ता के बाद केरलम में संगठन की कमान किसे

केरलम में सरकार तो बन चुकी है. मुख्यमंत्री पद के सारे दावेदार तो किसी न किसी बहाने संतुष्ट किए जा चुके हैं. चुनाव नतीजे आने के पहले से ही तीन दावेदार थे. केसी वेणुगोपाल, वीडी सतीशन और रमेश चेन्निथला. वीडी सतीशन मुख्यमंत्री बन गए. रमेश चेन्निथला मंत्री बने हैं, और उनको पसंदीदा गृह विभाग भी मिल चुका है - और केसी वेणुगोपाल के समर्थकों को भी कैबिनेट में समायोजित कर लिया गया है. 

केरलम कांग्रेस अध्यक्ष सनी जोसेफ भी वीडी सतीशन मंत्रिमंडल में शामिल हो चुके हैं. केरलम कांग्रेस अध्यक्ष के लिए दौड़, दावेदारी और लॉबिंग शुरू हो गई है. कोई जातीय समीकरणों में फिट होने की कोशिश कर रहा है, तो कोई समुदाय के हिसाब से. कुछ नेता ऐसे भी हैं जिनकी निष्ठा गुटों में शुमार मानी जाती है. ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व को ऐसे अध्यक्ष की तलाश होगी जो वीडी सतीशन की तरह सबको साथ लेकर चले और कांग्रेस को आगे ले जाए. साथ ही 2029 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस का नंबर कायम रहे, ऐसा सुनिश्चित कर सके. 

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फिलहाल जो तीन दावेदार केरल कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए माने जा रहे हैं, वे हैं - कोडिकुन्निल सुरेश, बेनी बेहनान और एंटो एंटनी. साथ ही, यूडीएफ संयोजक अदूर प्रकाश और सीनियर कांग्रेस नेता जोसेफ वझक्कन भी दौड़ में शामिल बताए जा रहे हैं.

केरल में एक गुट दलित नेता को अध्यक्ष बनाने की पैरवी कर रहा है, तो एक का कहना है कि किसी क्रिश्चियन को ही यह जिम्मेदारी मिलनी चाहिए. दलित कांग्रेस अध्यक्ष के पीछे एक दलील ये भी है कि मुख्यमंत्री वीडी सतीशन, गृह मंत्री रमेश चेन्निथला और कांग्रेस महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल सभी सवर्ण कैटैगरी से आते हैं. 

8 बार के सांसद कोडिकुन्निल सुरेश के समर्थक केरल में दलित कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति की मांग कर रहे हैं. कांग्रेस में नेताओं का एक तबका ऐसा भी है जो सनी जोसेफ के बाद भी ईसाई समुदाय से ही अध्यक्ष बनाए जाने की मांग कर रहा है. तर्क यह है कि बड़ी संख्या में ईसाई समुदाय ने चुनाव में कांग्रेस को सपोर्ट किया है. ईसाई कांग्रेस अध्यक्ष वाले पैमाने पर जोसेफ वझक्कन की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है.

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