दिल्ली में महज दो घंटे की बारिश और इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के परिसर में पानी का फैल जाना सिर्फ बारिश की खबर नहीं है. यह उस आधुनिक निर्माण संस्कृति पर सवाल है, जिस पर अब सोचने का समय आ गया है. क्योंकि यह कोई पहली बार नहीं हुआ है. यह बार-बार हो रहा है. बेंगलुरु के नए एयरपोर्ट की छत से बार-बार पानी टपकता है. दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल-1 की छतरी पहले भी तूफान में फट चुकी है.
देश के सबसे बड़े और सबसे आधुनिक हवाई अड्डों में से एक में अगर बारिश का पानी यात्रियों के रास्ते और परिसर तक पहुंच जाता है तो सवाल सिर्फ इतना नहीं होना चाहिए कि उस दिन कितनी बारिश हुई? असली सवाल यह होना चाहिए कि जिस इमारत को देश की राजधानी के मौसम के हिसाब से बनाया गया है, उसकी जल निकासी व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों पड़ गई?
दिल्ली ही नहीं, देश और दुनिया के कई हिस्सों से नई बनी इमारतों में पानी रिसने, छतों से टपकने, बेसमेंट में जलभराव और ड्रेनेज सिस्टम फेल होने की तस्वीरें लगातार सामने आती हैं. चीन में हाल की बाढ़ के दौरान मॉल, एयरपोर्ट और दूसरी आधुनिक इमारतों में पानी घुसने के दृश्य भी इसी बड़ी समस्या की तरफ इशारा करते हैं. सवाल यह नहीं है कि आधुनिक इमारतें बारिश में क्यों प्रभावित होती हैं. सवाल यह है कि इतनी महंगी और अत्याधुनिक तकनीक के बावजूद हम बारिश के पानी से हार क्यों जाते हैं?
अक्सर इसके जवाब में भ्रष्टाचार को कारण बताया जाता है. घटिया सामग्री, ठेकेदारों की मिलीभगत, निर्माण में समझौते, निरीक्षण की खानापूर्ति और रखरखाव की अनदेखी, इनमें से कोई भी कारण हो सकता है. लेकिन हर बार भ्रष्टाचार को दोष देकर आगे बढ़ जाना भी आसान रास्ता है. दरअसल समस्या कहीं इससे गहरी है.वह है इंजीनियरिंग और डिजाइन की सोच.
भारत कोई ऐसा देश नहीं है जहां मौसम एक जैसा रहता हो. उत्तर भारत में तो गर्मी, ठंड और बारिश तीनों अपने चरम पर होता है. इसी के चलते आधुनिक वास्तुकला कई बार सवालों के घेरे में आती है. आज की कई इमारतें दूर से देखने पर शानदार लगती हैं. विशाल ग्लास की दीवारें, चमकदार छतें, बड़े एट्रियम, खुली लॉबी, विशाल पार्किंग और आकर्षक बाहरी ढांचा. लेकिन सवाल है कि क्या यह सब भारतीय मौसम के लिए डिजाइन किया गया है? क्या डिजाइन तैयार करते समय यह कल्पना की गई थी कि एक घंटे में असामान्य मात्रा में बारिश हो जाए तो पानी कहां जाएगा? क्या छत की क्षमता, जल निकासी, बैकफ्लो और आसपास की जमीन की सोखने की क्षमता को भविष्य की बारिश के हिसाब से आंका गया?
मुंबई का छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस इसका शानदार उदाहरण है. औपनिवेशिक काल में बना यह स्टेशन केवल स्थापत्य की दृष्टि से सुंदर नहीं था, बल्कि उसके डिजाइन में स्थानीय मौसम, हवा और प्राकृतिक रोशनी के इस्तेमाल की समझ भी दिखाई देती है. ऊंची छतें, बड़े वेंटिलेशन स्पेस और ऐसी संरचना जिसमें हवा और रोशनी का प्राकृतिक प्रवाह हो.ये चीजें उस दौर की वास्तुकला का हिस्सा थीं.
हावड़ा ब्रिज के आसपास का पुराना कोलकाता भी हमें इसी तरह की जलवायु-संवेदनशील वास्तुकला की याद दिलाता है.हावड़ा स्टेशन की विशाल संरचना ने दशकों तक बारिश और उमस वाले मौसम का सामना किया है. लखनऊ का चारबाग रेलवे स्टेशन की पुरानी बिल्डिंग भी अपने समय की ऐसी वास्तुकला का उदाहरण है जिसमें भवन केवल उपयोग के लिए नहीं, बल्कि स्थानीय जलवायु और जीवनशैली को ध्यान में रखकर बनाए गए थे.
दिल्ली का राष्ट्रपति भवन और इंडिया गेट के आसपास की औपनिवेशिक वास्तुकला भी एक अलग तरह की सोच बताती है. मोटी दीवारें, ऊंची छतें, छज्जे, बरामदे, बड़े खुले हिस्से और प्राकृतिक हवा के लिए जगह ,ये सब केवल सजावट नहीं थे. इनके पीछे भारतीय मौसम को समझने की अंतर्दृष्टि थी. इसी तरह राजस्थान की पुरानी हवेलियों में आंगन और मोटी दीवारें गर्मी से बचाने का काम करती थीं. केरल की पारंपरिक वास्तुकला में ढलानदार छतें भारी बारिश को ध्यान में रखकर बनाई जाती थीं. असम और पूर्वोत्तर के कई पारंपरिक घरों को बाढ़ और नमी से बचाने के लिए जमीन से ऊपर उठाकर बनाया जाता था. दक्षिण भारत के मंदिरों की विशाल संरचनाएं भी स्थानीय मौसम और वर्षा को ध्यान में रखकर विकसित हुईं.
यानी हमारे पूर्वजों के पास आज की तरह कंप्यूटर मॉडलिंग और अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर नहीं थे, लेकिन उनके पास स्थानीय मौसम का अनुभव और प्रकृति को पढ़ने की समझ थी. आज हमारे पास उससे कहीं बेहतर तकनीक है. फिर भी अगर नई इमारत बारिश में पानी रोकने के बजाय पानी जमा करने लगे तो हमें तकनीक से ज्यादा अपनी सोच पर सवाल करना चाहिए.
एक और बदलाव महत्वपूर्ण है. पहले भवन को अक्सर एक दीर्घकालिक सार्वजनिक संरचना की तरह देखा जाता था. आज कई परियोजनाएं समय और लागत के दबाव में पूरी हो रही हैं. डिजाइन, निर्माण और रखरखाव तीन अलग-अलग खानों में बंट जाते हैं. इंजीनियर डिजाइन बनाता है, ठेकेदार निर्माण करता है और बाद में कोई दूसरा विभाग रखरखाव करता है. नतीजा यह होता है कि जिम्मेदारी सबकी होती है और जवाबदेही किसी की नहीं.जलवायु परिवर्तन ने समस्या को और गंभीर कर दिया है. मौसम विभाग लगातार बता रहा है कि कम समय में बहुत अधिक बारिश जैसी चरम मौसमी घटनाएं बढ़ रही हैं. ऐसे में पुराने औसत आंकड़ों के आधार पर ड्रेनेज डिजाइन करना पर्याप्त नहीं है. शहरों और इमारतों को भविष्य की चरम बारिश को ध्यान में रखकर डिजाइन करना होगा.
और केवल एयरपोर्ट की बात क्यों? हमारे शहरों में अंडरपास कुछ घंटों में तालाब बन जा रहे हैं. नए बने फ्लाईओवर के नीचे पानी जमा हो जाता है. मेट्रो स्टेशनों में पानी घुस जाता है. मॉल के बेसमेंट में पानी भर जाता है. नई सड़कों पर गड्ढे बन जाते हैं. सवाल यह है कि हम हर साल इन घटनाओं को आपदा की तरह क्यों देखते हैं, जबकि बारिश भारत के लिए कोई नई घटना नहीं है?
जरूरत है कि हर बड़े सार्वजनिक निर्माण के लिए क्लाइमेट ऑडिट अनिवार्य किया जाए. इमारत बनने से पहले यह प्रमाणित होना चाहिए कि वह स्थानीय तापमान, बारिश, हवा, नमी और संभावित बाढ़ की परिस्थितियों को झेलने में सक्षम है. केवल भवन की सुंदरता और लागत नहीं, उसकी मौसम-प्रतिरोधक क्षमता भी निर्माण की कसौटी बने. हमें आधुनिकता से पीछे जाने की जरूरत नहीं है. ग्लास की इमारतें बनें, शानदार एयरपोर्ट बनें, बड़े मॉल बनें, अत्याधुनिक स्टेशन बनें. लेकिन आधुनिकता का मतलब प्रकृति की अनदेखी नहीं हो सकता है. हमारी नई इमारतें इतनी आधुनिक क्यों नहीं हो सकतीं कि वे पुरानी इमारतों की मौसम समझ और नई तकनीक दोनों को साथ लेकर चलें?
बारिश दुश्मन नहीं है. बारिश तो इस देश की जिंदगी है. अगर हर तेज बारिश हमें यह बताने लगे कि हमारी नई इमारतें उसे संभाल नहीं सकतीं, तो समस्या बारिश में नहीं, हमारी इंजीनियरिंग में है.
हमें ऐसी इमारतें नहीं चाहिए जो उद्घाटन के दिन शानदार दिखें और पहली बड़ी बारिश में अपनी कमजोरी बता दें.