मुगल बादशाह औरंगजेब ने काफी बेरहमी से भारत पर शासन. सत्ता पाने के लिए उसने अपनों को भी नहीं बख्शा. अपने पिता शाहजहां को बंदी बनाया. भाईयों की जान ली. यहां तक की उसने अपने बच्चों पर भी रहम नहीं खाई. शाहजहां ने अपनी बेटी तक को जेल में डाल दिया था.
औरंगजेब और उनकी पत्नी दिलरस बानू बेगम की सबसे बड़ी बेटी का नाम जेब-उन-निस्सा था. एक बेहतरीन पोएट थी. जेब-उन-निस्सा, छद्म नाम -मखफी से लिखते थीं. उनके लिए सख्त औरंगजेब ने दरबार में कवियों को आने की अनुमति दी थी.
इस हद तक बेटी को छूट देने और उसे प्यार करने वाले सबसे सख्त मुगल बादशाह औरंगजेब का धीरे-धीरे रुख बदलने लगा. उसे अपनी प्यारी बेटी ही दुश्मन लगने लगी. औरंगजेब के लिए यह नई बात नहीं थी. जिस शख्स ने अपने पिता और भाईयों के साथ दुश्मन से भी बदतर व्यवहार किया था. उसके लिए बेटी को दुश्मन बना लेना नया नहीं था.
एक समय ऐसा आया, जब औरंगजेब ने अपनी बेटी को जेल की काल कोठरी में डाल दिया. ठीक वैसे ही जैसे उसने अपने पिता शाहजहां को बंदी बना लिया था. अब सवाल उठता है कि औरंगजेब ने आखिर ऐसा क्यों किया. किस वजह से बेटी के लिए उसका स्नेह अविश्वास में बदल गया.
इस वजह से नाराज था औरंगजेब
बेटी को जेल में डालने के पीछे कई वजहें थीं. जेब-उन-निस्सा का कभी औरंगजेब के भाई और उसके प्रतिद्वंद्वी दारा शिकोह से अच्छे संबंध थे. जेब-उन-निस्सा पर उसके चाचा का विशेष स्नेह था. जब औरंगजेब और दारा शिकोह के बीच लड़ाई शुरू हुई, तब भी जेब-उन-निस्सा की सहानुभूति अपने चाचा के साथ ही थी.
जेब-उन-निस्सा अपने सबसे छोटे भाई मुहम्मद अकबर को चिट्ठियां भेजती थी. वह उसका सबसे प्यारा भाई था. अब सवाल उठता है कि आखिर भाई-बहन के बीच स्नेह की वजह से पिता को क्यों नाराजगी होगी. इसकी वजह मुहम्मद अकबर का विद्रोही तेवर था. जेब-उन-निस्सा का स्नेह अपने उस भाई से था, जो औरंगजेब के खिलाफ खड़ा हो गया था. अकबर ने औरंगजेब के विरुद्ध राजपूत राजकुमारों के साथ गठबंधन कर लिया था. उसने राजपूतों के साथ मिलकर औरंगजेब की सेना के खिलाफ लड़ाई भी लड़ी.
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औरंगजेब की नाराजगी की शायद अंतिम वजह, जेब-उन-निस्सा का मराठा नेता शिवाजी के प्रति सहानुभूति थी. वह औरंगजेब के सबसे बड़े दुश्मन शिवाजी महाराज का सम्मान करती थी. इन वजहों से नाराज होकर आखिरकार औरंगजेब ने ज़ेब-उन-निस्सा को जेल भेज दिया. दिल्ली के सलीमगढ़ किले में 20 वर्षों के लिए उसे कैद कर दिया गया. कैद में रहते हुए 1702 में ज़ेब-उन-निस्सा की मृत्यु हो गई.