‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ यानी एक देश, एक चुनाव को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज है. कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इस व्यवस्था की व्यावहारिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह देश में लागू करना आसान नहीं होगा. उन्होंने पूछा कि अगर किसी विधानसभा में सरकार का बहुमत खत्म हो जाता है या किसी वजह से सरकार गिर जाती है, तो फिर क्या होगा.
इमरान मसूद ने कहा कि अगर किसी विधानसभा की सरकार अपना बहुमत खो देती है और गिर जाती है, तो उसके बाद होने वाला चुनाव किस तरह कराया जाएगा. अगर अगला चुनाव सिर्फ बची हुई अवधि के लिए कराया जाता है, तो उसमें दोबारा सरकारी पैसा खर्च होगा.
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कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि यह व्यवस्था व्यावहारिक नहीं है. इसे पूरे देश में लागू करना आसान नहीं होगा. उनका सवाल सीधे तौर पर इस बात पर है कि अलग-अलग राज्यों में सरकारों के कार्यकाल अलग-अलग परिस्थितियों में खत्म होने की स्थिति में एक साथ चुनाव की व्यवस्था कैसे कायम रखी जाएगी.
असदुद्दीन ओवैसी के बयान पर भी बोले इमरान
इमरान मसूद ने असदुद्दीन ओवैसी के उस बयान पर भी प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने आरएसएस और बीजेपी पर मनुस्मृति लागू करने की कोशिश करने और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता नहीं होने का आरोप लगाया था.
इमरान मसूद ने कहा कि बीजेपी और आरएसएस का बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के संविधान से कोई वास्ता नहीं है. उन्होंने आरोप लगाया कि ये लोग संविधान को कमजोर करना चाहते हैं, लेकिन उनके पास ऐसा करने की ताकत नहीं है.
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बीजेपी ने कांग्रेस पर साधा निशाना
बीजेपी की तरफ से कांग्रेस के ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के विरोध पर सवाल उठाया गया है. बीजेपी सांसद शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि कांग्रेस के शासनकाल में 1951-52 से 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते रहे थे. ऐसे में अब कांग्रेस इस व्यवस्था को असंवैधानिक क्यों बता रही है.
बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस के शासनकाल में कई राज्यों की सरकारें गिराई गईं. समय से पहले चुनाव कराए गए, जिससे एक साथ चुनाव की व्यवस्था खत्म हुई. पार्टी का कहना है कि सवाल व्यवस्था का नहीं, बल्कि राजनीतिक नीयत का है.
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच यह बहस अब संविधान, संघवाद और चुनावी खर्च से आगे बढ़कर सरकारों के कार्यकाल और लोकतांत्रिक व्यवस्था के भविष्य तक पहुंच गई है.