
जंतर-मंतर पर इन दिनों सिर्फ एक आंदोलन नहीं चल रहा, बल्कि एक नई पीढ़ी अपनी भाषा, अपने तौर-तरीकों और अपने विरोध के नए तरीके के साथ लोकतंत्र के सबसे पुराने औजार 'प्रदर्शन' को नए अंदाज में प्रदर्शित करती दिख रही है.
यह वह पीढ़ी है जिसे अक्सर 'ओटीटी वाली' या 'रील्स वाली कहकर दरकिनार कर दिया जाता है लेकिन जंतर-मंतर पर मौजूद भीड़ को करीब से देखने पर एहसास होता है कि डिजिटल क्रांति के दौर में पली-बढ़ी नई पीढ़ी- Gen Z जब सड़कों पर उतरती है तो आंदोलन का ढर्रा बदल जाता है.
जब आप कनॉट पैलेस स्थित जंतर-मंतर पर कदम रखते हैं, तो आपको अहसास होता है कि यह पारंपरिक दौर का धरना नहीं है. यह आज की नई पीढ़ी यानी ‘Gen Z’ का अपना आंदोलन है. महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, यूपी से लेकर देश के कोने-कोने से आए युवाओं का यह सैलाब किसी एक चेहरे या नेता के इशारे पर नहीं चल रहा. यहां न कोई सर्वमान्य नेता है, न कोई हिदायत देने वाला बड़ा चेहरा.
कई बार देखने पर लगता है कि यह एक स्वतःस्फूर्त आक्रोश है, तो कभी लगता है कि इसे पर्दे के पीछे से बहुत ही ऑर्गनाइज्ड तरीके से मैनेज किया जा रहा है. पर सच यह है कि इस भीड़ को कंट्रोल कर पाना किसी एक के बस की बात नहीं है-चाहे वो पुलिस प्रशासन हो या छात्रों के अपने प्रतिनिधि अभिजीत दिपके.
गुस्से से उबलती यह नई पीढ़ी किसी की सुनने के मूड में नहीं है. इससे ये भी महसूस होता है कि जब भीड़ का कोई स्पष्ट नेतृत्व नहीं होता, तब उसे नियंत्रित करना भी मुश्किल हो जाता है. यही वजह है कि कई बार हालात अचानक तनावपूर्ण भी हुए.

इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां कोई एक चेहरा भीड़ को नियंत्रित करता नहीं दिखता. कई बार ऐसा लगा कि मंच से अपील करने वालों की बात भी भीड़ पूरी तरह नहीं मान रही. लोगों के अपने-अपने समूह हैं, अपनी राय है और अपने फैसले हैं. शायद यही Gen Z की सबसे बड़ी पहचान भी है- वे किसी विचार से जुड़ते हैं, किसी व्यक्ति से नहीं.
जब घर से आई धमकी, तो मिला बेबाक जवाब
इस आंदोलन में जेन-जी का मिजाज हर मोड़ पर झलकता है. यहां हाथों में नारों वाले तख्तियां तो हैं ही साथ में रचनात्मक और तीखे मैसेजेस वाले पोस्टर्स भी हैं. हर पोस्टर एक निजी बयान था. किसी पर गुस्सा था, किसी पर व्यंग्य, किसी पर उम्मीद और किसी पर संविधान की बातें. सोशल मीडिया पर पली-बढ़ी यह पीढ़ी छोटे, असरदार और वायरल होने लायक संदेश लिखना जानती है. शायद यही वजह है कि उनके पोस्टर भी उतने ही प्रभावी दिखे जितनी उनकी इंस्टाग्राम स्टोरी.
ग्राउंड पर एक नजारा तो हैरान कर देने वाला था. प्रदर्शन में बैठी एक छात्रा के पास उसके पिता का फोन आया. पिता ने साफ लहजे में कहा, "तुरंत वहां से वापस लौटो, वरना खर्च के पैसे भेजने बंद कर दूंगा." उस लड़की का जवाब जेन-जी की मानसिकता को बिल्कुल साफ कर देता है. उसने बिना झिझके कहा-"पापा, बात पैसों की नहीं, मेरे अपने हक और भविष्य की है. मैं यहां अपने हितों के लिए बैठी हूं."

साफ दर्शाता है कि यह पीढ़ी सवाल पूछना जानती है और अपने हक के लिए किसी भी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं है.
लाठी खाने का गुस्सा, फिर भी पुलिस को खाना और फूल!
20 जुलाई को जब ‘संसद चलो’ के आह्वान के बाद पुलिस की ओर से छात्रों पर लाठीचार्ज हुआ, तो युवाओं का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. पुलिस की बर्बरता, आंसू गैस और महिलाओं से अभद्रता ने माहौल में भारी तनाव घोल दिया था. एक वीडियो तो ऐसा आया जहां पुलिस लाठीचार्ज कर रही है, एक युवक पुलिस के सामने सीना चौड़ा होकर लाठियां खा रहा है और पुलिस से खुद को और मारने की बात कहता है. यानि आंदोलन के लिए वह खुद को न्यौछावर करने को तैयार है.
21 जुलाई की शाम जब हमारे साथी अनुराग कश्यप ग्राउंड जीरो पहुंचे, तो हर चेहरे पर खौफ और आक्रोश का मिला-जुला भाव था. नेटवर्क पूरी तरह ठप्प था. साथी बिछड़ रहे थे, कैब्स बुक नहीं हो रही थीं और लोग अपने वीडियो तक अपलोड नहीं कर पा रहे थे. जब कोई अचानक ‘भागो-भागो’ चिल्लाता, तो खौफ ऐसा था कि 200-400 लोग बिना कुछ जाने दौड़ पड़ते थे. रात के अंधेरे में प्रेस कार्ड दिखाने तक का मौका नहीं मिल पा रहा था.
लेकिन इसी डर और गुस्से के बीच जेन-जी का एक अलग नजारा भी देखने को मिला. जो युवा पुलिस के लाठीचार्ज से भड़के हुए थे, वही अगले ही पल उसी सुरक्षाकर्मियों की तरफ हाथ बढ़ाकर उन्हें फूल और खाना ऑफर कर रहे थे.

अनाम मददगार
इस आंदोलन में जो लोग खुद जंतर-मंतर नहीं पहुंच सके, वे अपने कमरों में बैठकर इस लड़ाई में योगदान दे रहे हैं. सोशल मीडिया पर हैशटैग चलाए जा रहे हैं, इंस्टाग्राम, एक्स फेसबुक पर रील्स, फोटो अपलोड हो रही हैं. जब इंटरनेट बंद हुआ, तो बिना वाई-फाई और नेटवर्क के मैसेज ट्रांसफर करने वाली ऐप्स और ट्रिक्स सोशल मीडिया पर शेयर होने लगीं. ग्राउंड पर बैठे साथियों के लिए अनजान लोग जोमैटो, स्विगी और ब्लिंकिट जैसे ऑनलाइन ऐप्स से खाना डिलीवर करवा रहे हैं.
तमाम डिलीवरी बॉयज खाने के पैकेट लेकर धरना स्थल पहुंचते हैं, खाना बांटते हैं और चले जाते हैं. कोई नहीं जानता है कि यह खाना किसने भिजवाया है. हमारी टीम के दूसरे साथी ऋषभ, जिन्होंने पूरी रात जंतर-मंतर के फुटपाथ पर गुजारी, बताते हैं कि जब प्रशासन या नगर निगम की सफाई टीम वहां नहीं पहुंची, तो प्रदर्शनकारी छात्रों ने खुद झाड़ू और थैलियां उठाईं और पूरे प्रोटेस्ट साइट को चमका दिया. यही जेन-जी की पहचान है-20वे सिर्फ व्यवस्था से शिकायत नहीं करते, जरूरत पड़ने पर खुद व्यवस्था संभाल भी लेते हैं.

सिक्के का दूसरा पहलू
जंतर-मंतर का अंदरूनी हिस्सा जितना अनुशासित दिखता है, बाहर का नजारा उतना ही डरावना और उग्र है. जंतर-मंतर से सटे कनॉट पैलेस के इलाकों में बिखरी भीड़ में कई असामाजिक तत्व घुस चुके हैं, जो पूरे आंदोलन की दिशा मोड़ने पर आमादा हैं. पीएम मोदी और धर्मेंद्र प्रधान को लेकर नफरती पोस्टर्स और नारे बाजी का दौर जारी है. रात के समय माहौल और खतरनाक हो जाता है.
ऋषभ बताते हैं कि रात के दौरान कुछ ऐसे लोग भी दिखे जिनका छात्रों के मूल मुद्दे से शायद कोई संबंध नहीं था. "सुबह करीब चार बजे एक शराबी प्रवृत्ति का व्यक्ति फुटपाथ पर सो रही महिला के साथ छेड़छाड़ करने लगा. वहां मौजूद लोगों ने तुरंत उसे पकड़कर बाहर निकाल दिया." इसके अलावा भी कई बार महसूस हुआ कि महिलाओं की सुरक्षा यहां अहम मुद्दा है.
उकसावे की राजनीति और मीडिया के प्रति नफरत
हाथों में तलवारें और भाले लिए कुछ निहंग पुलिस के सामने बार-बार जाकर उकसाते दिखे, मानो वे किसी बड़ी हिंसक झड़प के इंतजार में हों. ये निहंग कौन हैं, कहां से आए हैं , नहीं पता. ऋषभ के मुताबिक, एक मीडियाकर्मी (शायद यूट्यूबर) जब ग्राउंड पर शूट कर रहा था, तो अचानक भीड़ ने उसे घेर लिया.

किसी ने चिल्लाकर कहा- "यह गोदी मीडिया है, सरकार की तारीफ करता है!" और भीड़ बेकाबू होकर उसे मारने दौड़ी. वह मीडियाकर्मी जैसे-तैसे भागकर जान बचा पाया. ऋषभ बताते हैं कि कुछ पलों के लिए लगा कि आज उसकी मॉब लिंचिंग हो ही जाएगी. वहीं बुधवार रात जब भीड़ बेकाबू हुई, तो पुलिस पर पत्थरबाजी की गई और मिर्च स्प्रे छिड़का गया, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल भी हुए.
क्यों खास है ‘Gen Z’ का मिजाज?
इस आंदोलन को सिर्फ एक 'भीड़' या 'गुमराह युवाओं का हुड़दंग' कहकर खारिज करना गलत होगा. हमें Gen Z के इस अंदाज को समझना होगा. यह पीढ़ी किसी राजनीतिक आका के एजेंडे पर नहीं चलती. इसीलिए यहां कोई एक लीडर नहीं है. यह पीढ़ी एक तरफ अपने अधिकार के लिए पुलिस की लाठियों के आगे सीना तानकर खड़ी होती है.
हां ये जरूर है कि भीड़ में घुसे असामाजिक तत्वों और हिंसा से इस आंदोलन को बचाना खुद इन आंदोलनकारियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि जंतर-मंतर पर बैठा यह जेन-जी भारत में जनांदोलनों की एक बिल्कुल नई और अनोखी पटकथा लिख रहा है.