अरे यार!... अब बाहर कौन जाए सामान लेने के लिए!
Gen Z की शॉपिंग फिलॉसफी को अगर एक लाइन में समझना हो, तो शायद यही है. ऑफिस, कॉलेज, ट्रैफिक और रोजमर्रा की भागदौड़ के बीच बाजार जाकर एक-एक चीज खरीदना अब कई लोगों को टू मच एफर्ट या टाइम टेकिंग लगता है. जेन-जी हमेशा स्मार्ट वर्क में ज्यादा यकीन रखते है.
फोन उठाओ, ऐप खोलो, सामान चुनो और कुछ ही मिनटों में डोरबेल बज जाती है- मैम आपका ऑर्डर है, लोकेशन पर खड़ा हूं, और ये मूमेंट किसी के लिए भी बहुत ही सुकून भरा होता है. जेन-जी को लगता है कि वाह! बिना टाइम वेस्ट किए जो चाहा वो मिल गया भले पैसे थोड़े ज्यादा लगे. लेकिन क्या ये प्रचलन सही में सिर्फ देता है या इसके नुकसान भी है.
Gen Z के लिए Quick Commerce सिर्फ सामान मंगाने का तरीका नहीं, बल्कि उनकी पूरी लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुका है. इस जेनेरेशन को ऐसी चीजें पसंद हैं जो उनकी लाइफ को तेज और आसान बनाएं. इसलिए बाजार जाकर सामान खरीदने के बजाय फोन से कुछ clicks में order करना उन्हें ज्यादा practical लगता है.
दिक्कत तब शुरू होती है जब यही convenience shopping को जरूरत से निकालकर impulse की तरफ ले जाती है. ऐप पर कुछ पसंद आया, offer दिखा या लगा कि “चलो ये भी मंगा लेते हैं”, तो खरीदारी हो गई. यानी Gen Z के लिए जहां Quick Commerce टाइम सेविंग हैक है, वहीं कई बार यही habit बिना महसूस कराए spending habit भी बदल देती है.
लेकिन कुछ मिनटों में डिलीवरी के चक्कर में एक चीज surprisingly fast खत्म हो रही है-महीने का बजट.
मान लीजिए घर में दूध खत्म हो गया. जरूरत है सिर्फ दूध की. लेकिन Quick Commerce ऐप खोलते ही सामने snacks, skincare, cold drinks, chocolates और कपड़े भी दिखाई देने लगते हैं. और फिर मन कहां मानता है. दिमाग कहता है-“ये भी तो चाहिए था…”, इसे भी ले लूं क्या? दूध ₹60 का था, लेकिन cart पहुंच गया ₹450 पर.
वेलकम टू Impulsive Buying.
इम्पल्सिव बायिंग क्या होती है?
इम्पल्सिव बाइंग यानी बिना पहले से प्लान किए अचानक कोई चीज खरीद लेना. कई बार हमें उस चीज की असल में जरूरत नहीं होती, लेकिन कोई ऑफर, डिस्काउंट, आकर्षक पैकेजिंग या उस वक्त का मूड हमें खरीदारी के लिए उकसा देता है. खासकर Gen Z के बीच यह ऑनलाइन शॉपिंग और क्विक-कॉमर्स ऐप्स की वजह से और आसान हो गया है.
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कुछ ही मिनटों में सामान सामने है, तो “अभी चाहिए” वाली फीलिंग भी तुरंत पूरी हो जाती है. यानी खरीदारी जरूरत से कम और मूड, सुविधा या एक्साइटमेंट से ज्यादा प्रभावित होने लगती है.
बजट बिगड़ने के 3 मुख्य कारण क्या है-
1. फ्री डिलीवरी का जाल: ऐप पर अक्सर लिखा होता है- जहां एक दाम की शॉपिंग पर फ्री डिलीवरी. आपका बिल 220 रुपए का होता है, तो आप उस 79 रुपए को पूरा करने के लिए 100 रुपए का ऐसा सामान (जैसे चिप्स, कोल्ड ड्रिंक) डाल लेते हैं जिसकी आपको जरूरत ही नहीं थी.
2. छोटे-छोटे ट्रांजेक्शन का असर: 50 रुपए की ब्रेड, 40 रुपए का दूध, 100 रुपए की सब्जी. दिन में तीन बार ऑर्डर करने पर आपको लगता है कि छोटा सा तो खर्च है, लेकिन महीने के अंत में ये जुड़कर 3 हजार से 4 हजार का अतिरिक्त बोझ बन जाते हैं.
3. कम मात्रा, ज्यादा दाम: क्विक कॉमर्स पर मिलने वाली सब्जियां या फल अक्सर पैकेट (जैसे 250 ग्राम या 500 ग्राम) में होते हैं, जिनकी प्रति किलो कीमत लोकल किराना या मंडी से काफी ज्यादा होती है.
जो जेन-जी को convenience लगता है वो धीरे-धीरे बजट किलर भी बनती जाती है और इसका पता सिर्फ महीने के अंत में अपने अकाउंट बैलेंस को देखकर लगता है. क्योंकि किराना स्टोर में शॉपिंग अक्सर list के हिसाब से होती है, जबकि Quick Commerce में shopping कई बार mood के हिसाब से की जाती है.