scorecardresearch
 

आंखों देखी: जंतर-मंतर पर उस रात मैंने एक अलग ही 'आंदोलन' देखा

23 जुलाई की देर रात 11 बजे मैं जतंर-मंतर पहुंची. अपने करियर में मैंने कई बड़े आंदोलन को कवर किया लेकिन जंतर-मंतर पर Gen-Z का ये आंदोलन कुछ अलग ही था.

Advertisement
X
जेन जी ने 36 दिनों तक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट किया. (फोटो-ITG))
जेन जी ने 36 दिनों तक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट किया. (फोटो-ITG))

मुझे दिल्ली में रिपोर्टिंग करते हुए बहुत लंबा वक्त हो चुका है...मैंने आंदोलनों के कई रूप देखे हैं. 2008 में नोएडा का भूमि अधिग्रहण आंदोलन हो, 2012 में निर्भया कांड के बाद उमड़ा जन-आक्रोश हो, सियासी रैलियां हों, 'नॉट इन माई नेम' मूवमेंट हो या फिर मणिपुर हिंसा के खिलाफ आदिवासियों का वह भावुक धरना...इन प्रदर्शनों के कई अलग पहलू सामने आए. लेकिन यकीन कीजिए, इस Gen-Z के आंदोलन में कुछ ऐसा था जो मैंने इससे पहले कभी महसूस नहीं किया.

नीट पेपर लीक मामले को लेकर 36 दिनों तक विरोध प्रदर्शन चला. मीडिया ने इसे 'जेन-ज़ी प्रोटेस्ट' कहा. जंतर-मंतर पर हुए इस प्रदर्शन में मैंने सिर्फ एक रात बिताई. संयोग से यह 23 जुलाई की वही रात थी, जब सोनम वांगचुक ने 26 दिनों के बाद अपना अनशन तोड़ा था.

वहां कदम रखते ही जो सबसे पहली चीज मुझे सबसे ज्यादा खटकी और जिसने मुझे हैरान किया वह थी इन युवाओं की गंभीर बेपरवाही यानि गंभीर विषयों को बिना किसी खास आदर या पारंपरिक औपचारिकता के पेश करना.

अक्सर जब मैं किसी राजनीतिक या सामाजिक मुद्दे जैसे यौन हिंसा या धार्मिक हिंसा से जुड़े प्रदर्शनों को कवर करती हूं, तो वहां चेहरे गंभीर और तल्ख दिखते हैं. हवा में एक राजनीतिक भारीपन होता है. लेकिन प्रोटेस्ट कर रहे इन बच्चों में ऐसा कुछ नहीं था. ऐसा नहीं है कि वे अपने हक को लेकर गंभीर नहीं थे; वे जब तक न्याय न मिल वहां तब तक बैठने को तैयार थे. लेकिन उनका अंदाज बिल्कुल अलग था...जैसे वे कह रहे हों, ' इतना गंभीर किसलिए (व्हाई सो सीरियस)'

Advertisement

उनके पोस्टरों में पारंपरिक आंदोलनों में दिखने वाले घिसे-पिटे नारे जैसे 'इस्तीफा दो' या 'न्याय करो' नहीं दिख रहे थे. बल्कि इसकी जगह ये युवा हाथों में मीम्स वाले पोस्टर थामे हुए थे प्रोटेस्ट कर रहे थे. एक पोस्टर तो ऐसा था जो मेरे दिमाग में हमेशा के लिए छप गया...उस पर लिखा था, 'क्रिस्टोफर नोलन पर्दे पर 'ओडिसी' दिखा रहे हैं...और ये हमें अपनी 'औकात' दिखा रहे हैं'

इतना ही नहीं, मंच से लाउडस्पीकर पर बज रहा म्यूजिक किसी आंदोलन जैसा नहीं, बल्कि किसी रेव पार्टी जैसा लग रहा था. जब मैंने धरना स्थल में एंट्री की, तो पूरी भीड़ हैप्पी न्यू ईयर फिल्म के गाने 'हम इंडियावाले' पर थिरक रही थी, जिसके ठीक बाद 'चक दे इंडिया' बजने लगा. हाथों में छोटे पंखे और हवा में लहराते पोस्टरों के साथ ये प्रोटेस्टर्स नाच-कूद रहे थे. मैंने ऐसा महसूस किया जैसे मैं किसी राजनीतिक धरने पर नहीं, बल्कि किसी कॉलेज फेस्ट में आ गई हूं.

यह भी पढ़ें: घर में बगावत-परिवार से झगड़ा, पहचान भी छिपाई... कैसे-कैसे जंतर-मंतर पहुंचे थे Gen-Z

एक फीमेल रिपोर्टर होने की वजह से किसी भी भीड़-भाड़ वाली जगह पर जाते ही मेरे दिमाग के किसी एक कोने में सुरक्षा को लेकर खतरे की घंटी बजने लगती है. लेकिन इस माहौल में, मेरे दिमाग का वह वार्निंग सिग्नल पूरी तरह से शांत था. 

Advertisement

दिल्ली पुलिस ने जहां बैरिकेड्स और मेटल डिटेक्टर लगाए थे, ठीक वहीं से स्टूडेंट्स की बनाई एक ह्यूमन चेन यानि वालिंटियर्स की लाइन शुरू हो रही थी. आने और जाने वालों के लिए अलग-अलग रास्ते थे. ये वालिंटियर्स विनम्र होने के साथ-साथ बेहद सख्त भी थे. क्योंकि मंच का रास्ता बैरिकेड के ठीक पास था, इसलिए वे वहां किसी को भी खड़े होकर फोटो लेने की इजाजत नहीं दे रहे थे. बैरिकेड के ऊपर घोड़े की तरह सवार एक लड़का चिल्ला रहा था, 'कृपया लाइन बढ़ाते रहिए, एक-दूसरे से दूरी बनाए रखिए...'

और भीड़? उसका तो क्या कहना...सचमुच अलग और लाजवाब थी. लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. वे एक लंबी, अनुशासित लाइन में खड़े थे. कोई धक्का-मुक्की कोई लाइन तोड़ने की कोशिश नहीं कर रहा था. वे आराम से खड़े होकर वीडियो बना रहे थे, पोस्टरों के साथ सेल्फियां क्लिक कर रहे थे. जब मैं लाइन में लगने के बजाय सीधे मीडिया एंट्री की तरफ बढ़ने लगी, तो कुछ युवाओं ने मुझे बाकायदा तिरछी नजरों से इस कदर देखा मानो कह रहे हों कि आप नियम तोड़ रही हैं.

बैरिकेड पर बैठे उसी वालिंटियर ने मुझे टोकते हुए कहा, 'मैम, ये बाहर निकलने वाला रास्ता है. एंट्री इधर से है. एग्जिट वाले से मत आइए, उससे क्राउड ब्लॉक हो जाएगा.

यह भी पढ़ें: 'नेपाल-बांग्लादेश की तरह सड़क पर उतरे GenZ', NEET पेपर लीक पर भड़के केजरीवाल

Advertisement

मैं करीब साढ़े ग्यारह बजे जंतर-मंतर पहुंची थी. ऑफिस की गाड़ी ने मुझे केरल हाउस के पास अशोक रोड सर्कल पर आराम से छोड़ दिया था. पुलिस ने जंतर-मंतर रोड को बंद करने के लिए एक बड़ी बस खड़ी कर रखी थी. वहां से महज इतनी ही जगह थी कि पुलिस की मर्जी से एक गाड़ी निकल सके. उस वक्त भी, उस छोटे से रास्ते से युवा, परिवार, दोस्तों के ग्रुप यानि इंसानों का एक समंदर जंतर-मंतर की तरफ बढ़ रहा था.

आगे बढ़ने पर रास्ता थोड़ा संकरा हो जाता है. वहां मीडिया के कैमरे तैनात थे जो भीड़ से थोड़े अलग, लेकिन हर हलचल पर नजर रखे हुए थे. उनके ठीक बगल में RAF की गाड़ियां और दिल्ली पुलिस की 'इक्षणा' (Ikshana) मोबाइल सर्विलांस वैन खड़ी थी. ये वही वैन है जिसके एआई (AI) फेशियल रिकग्निशन टेकनीक पर इन दिनों काफी विवाद चल रहा है.

बैरिकेड्स की भूलभुलैया को पार करते हुए जैसे ही मैंने मेन एरिया में एंटर किया, तो देखा कि भीड़ के बैठने के लिए बैरिकेड्स से ही एक गैलरी बनाई गई थी, जहां प्रदर्शनकारी पिछले कई दिनों से डटे हुए थे. अंदर घुसते ही एक स्टॉल था जहां पानी और चाय बांटी जा रही थी.

वहां घुसते हुए एक शख्स ने मजाक में चिल्लाकर पूछा, 'मोदी जी की चाय है क्या?' तभी भीड़ में से किसी ने तुरंत जवाब दिया, 'उनकी नहीं है... चाय भी हमारी है, देश भी हमारा है.' यह कोई रटा-रटाया नारा नहीं था, बस हाजिरजवाबी और युवाओं का अपना एक अलग अंदाज था.

Advertisement

भीड़ के बीच AISA, SFI, KYS समेत कई तजुर्बेकार छात्र संगठनों के कार्यकर्ता चटाइयों पर गोल घेरा बनाकर डफली बजा रहे थे. वह जाने-पहचाने वामपंथी नारे लगा रहे थे. यह किसी प्रोटेस्ट का वह चेहरा था जिसे देखने की मुझे आदत थी. लेकिन उनकी तादाद उन 'आम छात्रों' के मुकाबले बहुत कम थी, जो किसी संगठन से नहीं थे. ये आम छात्र बेबाक थे, रील्स बना रहे थे और अपने अनूठे पोस्टरों के साथ घूम रहे थे.

जब मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्हें पता है कि सोनम वांगचुक ने अनशन तोड़ दिया है, तो उन्होंने उलटा मुझसे ही पूछ लिया कि मुझे कैसे पता चला. क्योंकि वहां इंटरनेट बंद है और मंच से कोई घोषणा भी नहीं हुई है. वे एक बड़े मीडिया हाउस की रिपोर्टर की बात पर आंख मूंदकर भरोसा करने को तैयार नहीं थे. किसी राजनीतिक रैली की तरह उन्होंने तुरंत जीत का जश्न मनाना शुरू नहीं किया, बल्कि वे सतर्क थे.

यह भी पढ़ें: CJP प्रोटेस्ट कवर करते हुए महिला रिपोर्टर के रूप में मेरे साथ क्या हुआ

मैं रात के करीब 3 बजे तक वहां रुकी रही. उस वक्त भी लोग आ रहे थे. कई कामकाजी प्रोफेशनल्स दफ्तर की शिफ्ट खत्म होने के बाद सीधे वहां पहुंच रहे थे. कुछ परिवार भी अपने छोटे बच्चों के साथ आए हुए थे.

Advertisement

रात के करीब 12 बजे लाइन में अपने 6 साल के बेटे के साथ खड़ी एक मां से मैंने बात की. उन्होंने मुझसे कहा, 'मैं अपने बेटे को दिखाना चाहती हूं कि यह लड़ाई उसी के लिए है. अगर हम आज आगे नहीं बढ़ेंगे, तो इनका क्या होगा?'

जब मैं उनका इंटरव्यू ले रही थी, तभी कुछ लड़कों ने चुपके से महिला के सिर के पीछे अपना पोस्टर कैमरे के फ्रेम में ला दिया. उस पर लिखा था, 'पुलिस अपराध नहीं रोकती, वे क्रांतियां रोकते हैं'... उन्होंने न तो कोई नारा लगाया, न ही इंटरव्यू में कोई खलल डाला. वे चेहरा छिपाए हुए थे, उन्होंने बस अपना मैसेज मेरे कैमरे के जरिए दुनिया तक पहुंचा दिया और चुपचाप पीछे हट गए.

वहां का माहौल इतना अनूठा था कि कुछ अनोखे और बेहद मजेदार वाकये भी हुए. रात के 1 बजे, फॉर्मल्स में लिपटे एक उलझे हुए सज्जन मेरे पास आए. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं सीधा ऑफिस से आ रहा हूं. जरा बताइए असली प्रदर्शन बैरिकेड के अंदर चल रहा है या बाहर?' दरअसल, वे बाहर रील्स बनाते युवाओं को देखकर पूरी तरह हैरान और कंन्फ्यूज्ड थे.

यह भी पढ़ें: जैसे ही धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर आई, प्रोटेस्टर्स का ऐसा था रिएक्शन, देखें Video

Advertisement

एक और शख्स मिले, जिनकी उम्र करीब 40 साल रही होगी. वह मुंबई से आए अपने ऑफिस के इंटर्न्स के साथ वहां पहुंचे थे. यह उनके जीवन का पहला प्रोटेस्ट था. उन्होंने बड़ी सादगी और भोलेपन से मुझे बताया, 'मैं आने को लेकर श्योर नहीं था, लेकिन बच्चे मुंबई से आए हैं तो मैं उनकी सुरक्षा देखने चला आया.' वे किसी ऐसी 'मामा डक' की तरह परेशान दिख रहे थे जिसके बच्चे कहीं खो गए हों. उन्होंने कहा, 'मुद्दा बहुत बड़ा है, जानता हूं...पर रात के 2 बज रहे हैं और मुझे समझ नहीं आ रहा कि वे कहां चले गए, इसलिए मैं यहीं गेट पर उनका इंतजार कर रहा हूं.

रात के 3 बजे जब मैं वहां से निकलने लगी, तो मैंने देखा कि केरल हाउस गेट के पास वालिंटियर्स ने फुटबॉल खेलना शुरू कर दिया था. दोनों तरफ आरएएफ की गाड़ियां खड़ी थीं. बीच सड़क पर लड़के-लड़कियां फुटबॉल को किक मार रहे थे. पूछने पर एक ने हंसते हुए कहा, 'सोना नहीं है न... यह हमें जगाए रखता है.'

लेकिन उस रात की जो तस्वीर मेरे जेहन में हमेशा के लिए दर्ज हो गई है... वह थी 17-18 साल के कुछ लड़कों का एक ग्रुप. वे पुलिस की उसी अत्याधुनिक सर्विलांस वैन 'इक्षणा' के कैमरों के ठीक सामने खड़े होकर फनी रील्स बना रहे थे. उनमें से एक ने पोज देते हुए कैमरे की तरफ देखा और बड़े नजाकत से पूछा, 'इस एंगल से मैं कैसा लग रहा हूं?'

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement