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जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म हो गया, लेकिन PM मोदी-शाह ने क्यों इस कानून को छुआ तक नहीं!

कश्मीर के लोकजीवन में यह किस्सा आज भी उतना ही जीवंत है. जितना हर पतझड़ में लाल हो उठने वाला चिनार का पेड़. वही चिनार जो सदियों से कश्मीर को शीतलता दे रहा है और जिसकी छांव सदियों से प्रकृति प्रेमियों कवियों, सूफ़ियों-संतों और कलाकारों का रोमांटिक एड्रेस रहा है. 

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सात वर्ष पहले आज के दिन अनुच्छेद 370 निरस्त किया गया था. (Photo: ITG)
सात वर्ष पहले आज के दिन अनुच्छेद 370 निरस्त किया गया था. (Photo: ITG)

उसने फ़ारसी में कहा, "चे-नार अस्त?" यानी- "यह कैसी आग है?" सामने कोई लपटें नहीं थी, बल्कि उस शाही पेड़ से झड़ते लाल-लाल पत्ते थे. मौसम पतझड़ का था. हवा चलती तो लाल-पीले पत्ते झड़-झड़कर ज़मीन पर बिछ जाते और पूरी वादी किसी जलती हुई कालीन जैसी दिखाई देती. वो व्यक्ति हैरान था. बागों में पेड़ों के पत्ते पीले से चमकदार लाल रंग में बदल रहे थे. 

बात तब की है, जब कश्मीर में मुगलों की आमद हो चुकी थी. बादशाह सलामत जहांगीर वादियों की सैर पर निकले थे. झेलम के किनारे, डल झील के आसपास और मुगल बागों में खड़े इन विशाल वृक्षों की रंगत ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया. ऐसे ही माहौल में उन्हें एक दरबारी ने उन्हें 'चे-नार अस्त' की कहानी बताई. समय के साथ यही शब्द "चिनार" बन गया. माना जाता है कि इस पेड़ को चिनार नाम जहांगीर ने ही दिया. 

चिनार की छांव तले पीढ़ियों ने बांटे हैं इश्क के एहसास

इतिहासकार इस कहानी की पुष्टि नहीं करते. लेकिन कश्मीर की लोक स्मृतियों में यह किस्सा आज भी उतना ही जीवंत है. जितना हर पतझड़ में लाल हो उठने वाला चिनार. वही चिनार, जिसकी छांव सदियों से प्रकृति प्रेमियों, कवियों, सूफ़ियों-संतों और कलाकारों का रोमांटिक एड्रेस रहा है. 

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चिनार की छांव तले पीढ़ियों ने इश्क के एहसास बांटे हैं. लोक कथाओं, कविताओं और गीतों में चिनार प्रेमियों की वफा, बेवफा, वादे और इंतजार का गवाह रहा है. 

यही चिनार सदियों से कश्मीर की पहचान रहा है. जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा कहते हैं आज कश्मीर में चिनार का सबसे पुराना पेड़ 647 वर्ष पहले लगाया था. जी हां, सही सुना आपने. आधा हजार साल से भी पुराना चिनार का वृक्ष आज भी बड़गाम के चत्तरग्राम में लहलहा रहा है. 

धरती के ब्रैकेट में इतनी लंबी उम्र शायद ही किसी को मिलती हो. जब पूरी-पूरी सभ्यताएं खत्म हो गईं और इंसान बहुत तेज़ी से आगे बढ़ता रहा, तब भी ये पेड़ कायम रहे. समय का चक्र घूमते देखा देखा. इतिहास को बनते बिगड़ते. 

मुगल आए, अफ़ग़ान आए, सिख आए, हिन्दू डोगरा शासन आया, फिर आज़ाद भारत बना. कश्मीर की सियासत भी बदली और उसकी संवैधानिक हैसियत भी.

370 चला गया लेकिन चिनार की 'सुरक्षा' बनी रही

5 अगस्त 2019 को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35A को खत्म कर दिया. यह फैसला आज़ाद भारत के सबसे बड़े संवैधानिक बदलावों में गिना गया. लेकिन इसी बदलाव के बीच एक ऐसा कानून भी था, जो कश्मीर की पहचान से जुड़ा था और जिस पर सरकार ने हाथ तक नहीं लगाया.

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ये कानून है- Jammu and Kashmir Preservation of Specified Trees Act, 1969. यानी वही कानून जो सदियों पुराने चिनार के पेड़ों को बिना सरकारी अनुमति काटने या नुकसान पहुंचाने से रोकता है. जम्मू-कश्मीर के राज्य से केंद्र शासित प्रदेश में बदल जाने के बावजूद ये कानून ज्यों का त्यों रहा. 

आखिर चिनार की ऐसी क्या अहमियत है कि नई व्यवस्था में भी उसकी कानूनी सुरक्षा जस की तस बनी रही? 

वजह साफ थी. यह कानून किसी विशेष संवैधानिक दर्जे या राजनीतिक व्यवस्था से नहीं, बल्कि कश्मीर की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा से जुड़ा है. चिनार जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश का राजकीय वृक्ष है. 

अनुच्छेद 370 मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति, भूमि अधिकार, नागरिकता और कुछ केंद्रीय कानूनों के लागू न होने से जुड़ा था. Preservation of Specified Trees Act इनमें से कोई नहीं था, यह एक स्थानीय पर्यावरण और सांस्कृतिक संरक्षण कानून है, जो सार्वजनिक हित में बनाया गया था. पुनर्गठन के बाद भी कई उपयोगी राज्य कानूनों को विशेषकर पर्यावरण, वन, शिक्षा और स्थानीय प्रशासन से जुड़े नियमों को जारी रखा गया, ताकि प्रशासनिक निरंतरता बनी रहे.

कश्मीर की कल्पना हमेशा से एक बड़े बगीचे के तौर पर की जाती है, जो ताज़े फूलों और फलों की खुशबू से महकता है. चिनार इस बगीचे के सबसे खूबसूरत दरख्तों में से एक है. चिनार की सुनहरी पत्ती कश्मीर का प्रतीक है. यहां के हर गांव में कम से कम एक चिनार का पेड़ ज़रूर होता है.

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कश्मीर का चिनार पेड़ (Photo: ITG)

चिनार सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि घाटी की पहचान है. उसकी संख्या लगातार घट रही थी. इसलिए सरकार के सामने इसे खत्म करने का कोई तर्क नहीं था. इस कानून का मकसद चिनार के पेड़ों को अंधाधुंध कटाई और नुकसान से बचाना है. इसके तहत बिना सरकारी अनुमति किसी चिनार को काटना, उसकी शाखाएं नुकसान पहुंचाना या उसे नष्ट करना अपराध माना गया है. 

चिनार और कश्मीर...

चिनार को निहारना एक रॉयल एहसास है. लेकिन इससे आगे इसकी पत्तियों को पतझड़ के मौसम में लाल,पीले और एम्बर रंग में बदलने देखना सचमुच का प्रिविलेज. 

इस पेड़ की एक खास बात इसकी पत्तियों का बदलता रंग हैं. गर्मियों में चिनार के पेड़ की पत्तियां गहरे हरे रंग की होती हैं, लेकिन पतझड़ आते ही इनमें सुर्खी आने लगती है. फिर इनका रंग बदलकर हो जाता है. खूबसूरत गहरा लाल, एम्बर और पीला. 

चिनार के पत्तों की इसी लालिमा को देख उस कश्मीरी ने कहा था- "चे-नार अस्त?" यानी "ये कैसी ज्वाला है." इसे अंग्रेजी में 'ओरिएंटल प्लेन' कहते हैं, इसका बायलॉजिकल नेम 'प्लाटेनस ओरिएंटलिस' कहा जाता है. स्थानीय भाषा में इसे 'बूयन' (Booyn) या 'बुएन' (Buen) कहा जाता है.

इसकी पत्तियां काफी हद तक 'मेपल' के पेड़ जैसी दिखती हैं, इसलिए इसे कई जगह 'पूर्व का मेपल' भी कह दिया जाता है. कनाडा के झंडे पर दिखने दिखने वाला पत्ता मैपल का पत्ता ही है. 

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वर्ष 2000 में आई फिल्म 'मोहब्बतें' में दिखाया गया लाल चिनार का पत्ता प्रेम, पुरानी यादों और रोमांस का प्रतीक बन गया था. 

जानकारों का कहना है कि चिनार को अपनी पूरी ऊंचाई तक पहुंचने में 30 से 50 साल और अपनी पूरी मज़बूती और आकार पाने में लगभग 100-150 साल लगते हैं. एक चिनार का पेड़ 30 मीटर या उससे भी ज़्यादा ऊंचा हो सकता है और उसका घेरा 150 मीटर से ज़्यादा हो सकता है. इसकी लंबी उम्र इसकी एक खासियत है.

मुगल, चिनार और इतिहास

कश्मीर के इतिहास में चिनार और मुगल सल्तनत साथ साथ चलते हैं. मुगलों ने कश्मीर को जन्नत कहा और चिनार को इस जन्नत का ताज बना दिया. जम्मू-कश्मीर वन विभाग के अनुसार अकबर ने हज़रतबल में डल झील के किनारे नसीम बाग़ नाम की जगह पर 1100 से ज़्यादा चिनार के पेड़ लगवाए. 

माना जाता है कि यह पेड़ मुगलों के आने से पहले भी घाटी में मौजूद था. लेकिन न सिर्फ़ इसे इतना सुंदर नाम देने का क्रेडिट बल्कि इसे एक आकर्षक लैंडस्केप में जोड़ने का क्रेडिट भी मुगलों को जाता है. 

शालीमार के फव्वारों के किनारे, निशात की ढलानों पर, डल के चार चिनार द्वीप पर. ये पेड़ मुगलों की तफरीह का गवाह बने. 

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अबू-अल-फजल की 'अकबरनामा' में कहा गया है, "28 तारीख को वे शहाबुद्दीन पोरा (शादीपुर) गए. वहां चिनार के पेड़ आसमान को छूते नज़र आते हैं और वहां की हरियाली आंखों को बहुत भाती है."

पतझड़ के मौसम में चिनार के पत्ते लाल हो जाते हैं. (Photo: Getty)

जब अकबर श्रीनगर पहुंचा तो इस घटना का भी अकबरनामा जिक्र है, "राजधानी श्रीनगर उनके आगमन से जगमगा उठी, रास्ते में जो सैनिक पहले ही पहुंच गए थे, उन्होंने उन्हें सम्मानपूर्वक सलामी दी. आदेश के अनुसार 34 लोग चिनार के पेड़ के तने के अंदर गए, जो बरसों से खोखला था. अगर वे और पास-पास बैठते, तो शायद कुछ और लोग भी उसमें समा सकते थे."

बादशाह जहांगीर ने डल झील के बीचों बीच स्थित जमीन के एक टुकड़े पर चिनार के चार पेड़ लगवाए. द्वीप जैसा दिखने वाला ये जमीन का ये टुकड़ा बहुत खूबसूरत है. जहांगीर ने इन चार पेड़ों को इस तरह से लगवाया था कि द्वीप पर हमेशा इनकी छाया बनी रहे. 

मुगलों ने ये पेड़ कश्मीर के मशहूर बाग़ों, जैसे नसीम बाग़, निशात बाग़, शालीमार बाग़, हरवान और बिजबेहरा, बड़गाम, कोकरनाग  और अनंतनाग में भी लगवाए. 

हजरतबल हो या खीर भवानी... चिनार हर जगह है

समय के साथ चिनार ने प्रेम से धर्म की यात्रा तय की. इसलिए इसे धार्मिक स्थलों के पास लगाया जाता था. आज भी कश्मीर में हिंदू और मुस्लिम दोनों तरह के धार्मिक स्थलों चाहे वह श्रीनगर में हज़रतबल दरगाह हो या तुल्ला मुल्ला में खीर भवानी मंदिर. वहां चिनार के लहलहाते पेड़ देखे जा सकते हैं. 

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14वीं सदी से ही सूफी संतों ने 'वाख', 'श्रुक', कविताओं और धार्मिक चर्चाओं के ज़रिए चिनार की तारीफ़ की है. कश्मीर की सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपरा में 'वाख' और 'श्रुक' दो बेहद महत्वपूर्ण काव्य विधाएं हैं.

कश्मीर की वाख और श्रुक परंपरा में चिनार सिर्फ़ एक पेड़ नहीं, बल्कि जीवन, विरह, आध्यात्मिकता और प्रकृति का प्रतीक बनकर उभरता है. 

कश्मीर के दो बड़े धार्मिक स्थल सुल्तान-उल-आरिफ़ीन और हज़रतबल में जायरीन इबादत करते देखे जा सकते हैं. 

हिंदू जनमानस में भी चिनार पवित्रता के भाव के साथ बसा हुआ है. ये पेड़ कश्मीर में देवी भवानी के मंदिरों में पाए जाते हैं. जिनमें गांदरबल का खीर-भवानी मंदिर भी शामिल है. कई हिंदुओं का मानना ​​है कि चिनार का कश्मीरी नाम 'बुएन' देवी भवानी के नाम से आया है. 

आतिश-ए-चिनार

चिनार ने नेताओं के दिलो-दिमाग पर भी दस्तक दी है. जम्मू-कश्मीर के पूर्व प्रधानमंत्री शेख मुहम्मद अब्दुल्ला ने अपनी आत्मकथा का नाम ‘आतिश-ए-चिनार’ रखा है, मतलब "चिनार की लपटें." कांग्रेस के एक प्रमुख नेता माखन लाल फोतेदार जो कश्मीर से ही थे ने अपने संस्मरण का नाम ‘द चिनार लीव्स’ रखा है.  

चिनार के आतिश भरे आकर्षण से फिल्म नगरी भला कैसे दूर रह सकता था. 1965 की फिल्म आरजू के गाने 'बेदर्दी बालमा...' में गीतकार हसरत जयपुरी ने चिनार के पत्तों से विरह की वेदना व्यक्त की है. वे लिखते हैं,  "कभी हम साथ गुजरे थे जिन सजीली राहगुजारों से, फिजा के भेष में गिरते हैं अब पत्ते चनारों से."

जम्मू-श्रीनगर में तैनात और कश्मीर घाटी में सुरक्षा, एंटी टेरर ऑपरेशन और LoC की रक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाली इंडियन आर्मी की यूनिट का नाम भी चिनार कॉर्प्स ही है.

अभी अगस्त की बरसात में चिनार के हरे हरे पत्ते ऊर्जा का संकेत दे रहे हैं. पतझड़ में जब चिनार के पत्ते लाल होकर झरने लगेंगे तो वे सिर्फ मौसम का नहीं, इतिहास का भी रंग बिखेरेंगे. 

सरकारें बदलीं, संविधान में बड़े बदलाव हुए, लेकिन कश्मीर की इस पहचान की हिफाजत करने वाला कानून आज भी जस का तस रहा. शायद इसलिए कि कुछ चीजें राजनीति से बड़ी होती हैं, वे एक सभ्यता की स्मृति होती हैं.

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