सितंबर 1963 से चली आ रही एक्स-मेन की दुनिया में म्यूटेंट बराबरी और स्वीकार्यता की लड़ाई लड़ते हैं. प्रोफेसर चार्ल्स जेवियर चाहते थे कि म्यूटेंट और सामान्य इंसान एक जैसे माने जाएं. वहीं मैग्नेटो का मानना था कि लोग म्यूटेंट को कभी इंसान नहीं मानेंगे. लेकिन टैक्स के एक मामले में मार्वल की टॉय कंपनी ने वही बात अदालत में रखी जो कॉमिक्स में मैग्नेटो कहता था. म्यूटेंट इंसान नहीं हैं.
ये मामला बड़ा मज़ेदार है. क्यूंकि मार्वल के सामने एक सवाल था कि वो अपने हीरोज़ को इंसान बताए या फिर म्यूटेंट? इसका जवाब देना ज़रूरी इसलिए था, क्यूंकि उसका सीधा कनेक्शन पैसों से था.
दरअसल, ये मामला 2003 के उस फैसले से जुड़ा था जिसमें सवाल था कि मार्वल के एक्शन फिगर इंसान माने जाएंगे या गैर-इंसानी जीव. वजह सीधी थी. अमेरिका में इंसानों पर आधारित 'डॉल' पर 12% टैक्स लगता था, जबकि गैर-इंसानी जीवों पर आधारित 'टॉय' पर 6.8% टैक्स. ये फर्क टॉय बिज और अमेरिकी सरकार, दोनों के लिए कई मिलियन डॉलर का था. अगर कम दर लागू होती, तो आगे बचत होती और पहले ज्यादा चुकाए गए टैक्स की वापसी भी मिल सकती थी.
टॉय बनाम डॉल का गेम
1996 में टॉय बिज, जिसमें उस वक्त मार्वल की हिस्सेदारी थी, ने यूएस कस्टम्स के खिलाफ कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में मुकदमा किया. अमेरिकी कस्टम्स सर्विस ने एक्स-मेन फिगरों को पहले 'डॉल' माना था, क्योंकि उनकी परिभाषा में वे ऐसी चीजें थीं जो सिर्फ इंसानों को दिखाती हैं. दूसरी तरफ 'टॉय' में जानवर, रोबोट, मॉन्स्टर और दूसरे गैर-इंसानी जीव आते थे. टॉय बिज, जो मार्वल एंटरटेनमेंट की टॉय सब्सिडियरी थी, 6.8% वाली दर चाहती थी. मार्वल ने भी टॉय बिज के पक्ष में गवाही दी, यानी अपनी ही म्यूटेंट दुनिया के खिलाफ.

मामला करीब एक दशक तक कानूनी सिस्टम में चलता रहा. बहस यहां तक पहुंची कि 'इंसान' मानने के लिए सिर, मुंह, आंख, नाक, बाल, हाथ और धड़ जैसी चीजें देखी जाएंगी. कई एक्स-मेन किरदारों में इनमें से कुछ थे, कुछ नहीं. बीस्ट का मामला भी उठा, जिसे एक्स-मेन का डॉक्टर और कला व विज्ञान में तेज किरदार बताया गया.
टॉय बिज की एक दलील ये थी कि इंसानों की स्किन नीली नहीं होती. कंपनी ने अपने फिगरों के पंजे, कवच, टेंटेकल, पंख, म्यूटेंट फीचर, एलियन फीचर और दूसरी 'बहुत सामान्य मानवीय विशेषताओं' की ओर भी इशारा किया. बात सिर्फ एक्स-मेन तक नहीं रही. स्पाइडर-मैन, डॉक्टर ऑक्टोपस और दूसरे मार्वल फिगर भी इस बहस का हिस्सा बने कि टैरिफ के लिए वे कितने इंसान हैं.
आखिरकार 2003 में अदालत टॉय बिज की दलील से सहमत हो गई. इससे ड्यूटी 12% से घटकर 6.8% हो गई. एक एक्स-मेन फैन साइट चलाने वाले शख्स ने इस फैसले को 'अकल्पनीय' कहा और कहा कि ये सुपरहीरो 'आप या मेरी तरह इंसान' माने जाने चाहिए. 2011 के आखिर तक टॉय और डॉल पर टैरिफ एक जैसा हो गया, लेकिन यह मामला आज भी उस अजीब टैक्स लड़ाई के तौर पर याद किया जाता है जिसमें टैक्स बचाने के लिए म्यूटेंट की इंसानियत ही बहस का मुद्दा बन गई.