एक महिला को 38 हफ्ते की गर्भवती बताकर अस्पताल लाया गया. इसको देखते हुए डिलीवरी के लिए ऑपरेशन की तैयारी की गई, लेकिन सर्जरी के दौरान डॉक्टरों को पता चला कि महिला के पेट में बच्चा है ही नहीं. दूसरी तरफ, परिजनों का आरोप है कि प्रेग्नेंसी करीब नौ महीने की हो चुकी थी और उनके पास मौजूद अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में भी यह जानकारी दर्ज थी. इसी वजह से महिला को अस्पताल लाया गया था.
BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला पाकिस्तान के कराची का है. जहां एक अस्पताल में महिला 27 अगस्त को पहुंची . परिवार डिलीवरी की उम्मीद कर रहा था. अस्पताल में मौजूद डॉक्टरों को महिला की ओर से एक अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट दिखाई गई, जिसमें 38 सप्ताह की गर्भावस्था बताई गई थी. इसको देखकर डॉक्टर महिला को डिलीवरी के लिए लेकर गए. इस दौरान ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने महिला की मेडिकल जांच और अन्य जरूरी टेस्ट किए, इसके बाद ऑपरेशन करने का फैसला लिया गया.लेकिन ऑपरेशन के दौरान जब देखा गया तो पेट में बच्चा था ही नहीं.
परिवार ने अस्पताल पर लगाया गंभीर आरोप
ऑपरेशन के बाद जब परिवार को इस बारे में जानकारी मिली तो अस्पताल में विवाद शुरू हो गया. परिवार ने आरोप लगाया कि अगर महिला गर्भवती थी और अल्ट्रासाउंड में बच्चा दिखाई दे रहा था, तो अस्पताल में पहुंचने के बाद बच्चा कहां गया? परिजनों ने अस्पताल पर बच्चा गायब करने का आरोप भी लगाया. ऐसे में मामला काफी बढ़ गया तो पुलिस को बुलाया गया.
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पुलिस जांच में क्या सामने आया?
पुलिस की शुरुआती जांच के बाद पूरा मामला साफ हो गया. जिसमें पता चला कि बच्चा गायब नहीं किया गया था. महिला ने कथित तौर पर अपनी प्रेग्नेंसी के बारे में परिवार से झूठ बोला था.महिला की शादी को करीब तीन साल हुए हैं और परिवार की ओर से बच्चे को लेकर उस पर दबाव था. इसी प्रेशर के कारण उसने खुद को प्रेग्नेंट बताकर एक झूठी रिपोर्ट तैयार कराई थी.
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अल्ट्रासाउंड की दोबारा पुष्टि क्यों नहीं हुई?
इस घटना ने अस्पताल की प्रक्रिया को लेकर भी एक अहम सवाल खड़ा किया है. अगर किसी महिला को डिलीवरी के लिए ऑपरेशन में ले जाया जा रहा है, तो आमतौर पर डॉक्टर उसका दोबारा भी अल्ट्रासाउंड करते हैं. इस मामले में अस्पताल का कहना है कि महिला द्वारा दिखाई गई अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट के आधार पर मेडिकल जांच और अन्य टेस्ट के बाद ऑपरेशन का फैसला लिया गया था.