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राम मंदिर के बाद अब मथुरा-काशी और संभल की चर्चा, संतों ने बताया अगला एजेंडा

‘पंचायत आजतक’ में आचार्य प्रमोद कृष्णम, आचार्य बद्रीश जी महाराज और स्वामी चक्रपाणि महाराज ने मंदिरों के इतिहास, सनातन आस्था और धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों पर अपनी राय रखी.

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पंचायत आजतक में संतों की मांग (Photo-ITG)
पंचायत आजतक में संतों की मांग (Photo-ITG)

‘पंचायत आजतक’ के विशेष सत्र ‘संभल, मथुरा, काशी: हिंदुत्व की झांकी’ में पीठाधीश्वर श्री कल्कि धाम, संभल के आचार्य प्रमोद कृष्णम, हिंदू महासभा के अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि महाराज और भागवत भ्रमर एवं कथावाचक आचार्य बद्रीश जी महाराज शामिल हुए. सत्र के दौरान देश में सनातन आस्था के बढ़ते प्रभाव, राम मंदिर निर्माण और संभल, मथुरा व काशी से जुड़े ऐतिहासिक मुद्दों पर चर्चा हुई.

आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि भारत करीब एक हजार साल तक गुलामी में रहा, इस दौरान लगभग 800 साल अफगान, मुगल और अन्य मुस्लिम शासकों के अधीन और करीब 200 साल अंग्रेजों के शासन में बीते, जो भारत के गौरवशाली इतिहास का कठिन दौर रहा.

उन्होंने कहा, “यह वह भारत है जहां भगवान राम का अवतार हुआ, जहां भगवान कृष्ण आए, जिसे बुद्ध और महावीर की धरती कहा जाता है, यह छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप और गुरु गोविंद सिंह जी महाराज की धरती है. यही वह भारत है जहां भगवान का अंतिम अवतार श्री कल्कि के रूप में संभल में होगा.

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आचार्य प्रमोद कृष्णम ने भारत की गुलामी के कारणों पर भी अपनी बात रखी, उन्होंने कहा कि भारत इसलिए गुलाम नहीं हुआ क्योंकि विदेशी आक्रांता बहुत बहादुर थे, बल्कि इसके पीछे आंतरिक कमजोरियां और गद्दारी भी एक बड़ी वजह थीं, उन्होंने जयचंद का उदाहरण देते हुए कहा कि इतिहास में ऐसे लोग मौजूद रहे, जिन्होंने देश को कमजोर किया. उन्होंने कहा कि आज की नई पीढ़ी जब इतिहास के इन पन्नों को पढ़ती है तो उसके भीतर अपने अतीत को लेकर एक भाव पैदा होता है, उन्होंने कहा कि अतीत की गलतियों से सीख लेकर उन्हें सुधारने की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है.

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राम मंदिर आंदोलन का जिक्र करते हुए आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि अयोध्या में भगवान राम की जन्मस्थली को लेकर सदियों तक विवाद और कानूनी लड़ाई चली. अंततः मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ और करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई. उन्होंने कहा कि जिस तरह अयोध्या ने अपना दर्द सहा, उसी तरह काशी और मथुरा ने भी ऐतिहासिक घटनाओं का सामना किया, इसी संदर्भ में उन्होंने संभल के इतिहास का भी उल्लेख किया. आचार्य प्रमोद कृष्णम ने दावा किया कि बाबर 1527 में संभल आया था और संभल से जुड़ी घटनाएं इतिहास में दर्ज हैं. उन्होंने कहा कि अयोध्या, काशी और मथुरा में मंदिरों को नुकसान पहुंचाए जाने के साथ ही संभल में भी मंदिरों को तोड़े जाने का इतिहास रहा है.

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि उद्देश्य केवल मस्जिदों का निर्माण करना था तो उसके लिए जमीन की कमी नहीं थी, उनके मुताबिक, मंदिरों को तोड़ने के पीछे केवल निर्माण का उद्देश्य नहीं, बल्कि हिंदुओं की आस्था को चोट पहुंचाने का मकसद भी था, आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि अयोध्या में भगवान राम के जन्म से जुड़ी आस्था, मथुरा में भगवान कृष्ण की जन्मभूमि और संभल में भगवान कल्कि के अवतार की मान्यता इन तीनों को लेकर आज देश में चर्चा हो रही है. उनके मुताबिक, यही कारण है कि संभल, मथुरा और काशी जैसे विषय आज राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में हैं.

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इस मौके पर आचार्य बद्रीश जी महाराज ने कहा कि राम मंदिर के निर्माण के बाद सनातन समाज में आस्था और उत्साह की एक नई भावना जागृत हुई है, उन्होंने कहा कि अब ब्रजवासियों की इच्छा है कि भगवान बालकृष्ण लाल भी जल्द से जल्द दिव्य और भव्य मंदिर में विराजमान हों. “राम मंदिर के बनते ही मन में बार-बार उत्साह जागृत होता है, उत्कंठा जागृत होती है और भाव जागृत होता है कि अब जल्दी से जल्दी हमारे बालकृष्ण लाल भी दिव्य और भव्य मंदिर में विराजमान हों.”

आचार्य बद्रीश जी महाराज ने मथुरा की ईदगाह का जिक्र करते हुए कहा कि जिस तरह अयोध्या में बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ, उसी तरह मथुरा में भी ईदगाह को लेकर विवाद का समाधान होना चाहिए, उन्होंने इसे ‘कलंक’ बताते हुए वहां भगवान श्रीकृष्ण के भव्य मंदिर के निर्माण की इच्छा जताई. उन्होंने कहा कि राम मंदिर आंदोलन के दौर में परिस्थितियां काफी चुनौतीपूर्ण थीं और उस समय का राजनीतिक एवं सामाजिक वातावरण भी अलग था, उनके मुताबिक, समय के साथ परिस्थितियां बदली हैं और अब उन्हें उम्मीद है कि न्यायालय तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय देगा.

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उन्होंने दावा किया कि मथुरा में विपक्ष के पास अपने दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज नहीं हैं, उन्होंने नगरपालिका, जल विभाग और बिजली विभाग से जुड़े दस्तावेजों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे साक्ष्यों के अभाव में न्यायालय तथ्यों के आधार पर फैसला करेगा. उन्होंने कहा कि ब्रजवासियों और संत समाज की इच्छा है कि भगवान बालकृष्ण लाल को उनके जन्मभूमि स्थल पर भव्य मंदिर में विराजमान किया जाए.

इसके साथ ही उन्होंने ऐतिहासिक मंदिरों को तोड़े जाने और धार्मिक स्थलों के निर्माण से जुड़े दावों का भी उल्लेख किया. उन्होंने आरोप लगाया कि अतीत में मंदिरों और मूर्तियों को नुकसान पहुंचाकर उन्हीं स्थानों पर दूसरे धार्मिक स्थल बनाए गए. उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में यदि कोई निर्माण अवैध है तो उसकी जांच होनी चाहिए और कानून के मुताबिक कार्रवाई की जानी चाहिए.

स्वामी चक्रपाणि जी महाराज ने कहा कि जब भी मंदिरों के पुनर्निर्माण या पुनर्स्थापना की बात आती है तो संत समाज की ओर से प्रयास किए जाते हैं, लेकिन आम लोगों के सहयोग और राजनीतिक नेतृत्व की भागीदारी के बिना ऐसे प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो सकते, उन्होंने कहा कि राम मंदिर का निर्माण भी लंबे संघर्ष और कानूनी लड़ाई के बाद संभव हुआ. स्वामी चक्रपाणि ने कहा कि 1528 में मीर बाकी द्वारा राम मंदिर तोड़े जाने के बाद भक्ति की भावना पैदा नहीं हुई थी, बल्कि सनातन परंपरा में यह आस्था पहले से ही मौजूद थी, उनके मुताबिक, इतिहास में एक ऐसा दौर आया जब लुटेरों और आक्रमणकारियों ने मंदिरों को निशाना बनाया.

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स्वामी चक्रपाणि ने कहा कि सनातन धर्म विध्वंस नहीं, बल्कि निर्माण और सृजन की विचारधारा है, उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना सिखाती है और पूरी दुनिया को परिवार मानती है, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संत-महात्मा, आचार्य और विभिन्न संस्थाएं आज सनातन मूल्यों और संस्कारों के प्रसार के लिए काम कर रही हैं, उन्होंने गुरुकुलों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां बच्चों को देश और दुनिया के लिए अच्छे कार्य करने की प्रेरणा दी जाती है, उनके मुताबिक, समाज में नफरत के बजाय सनातन के मूल्यों, संस्कारों और सह-अस्तित्व की भावना को मजबूत करने की जरूरत है.

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