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सांस्कृतिक धरोहर से लेकर राजनीतिक अखाड़े तक: जानिए श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा का सियासी समीकरण

भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा धार्मिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है. यमुना किनारे बसी यह उपजाऊ भूमि पेड़े, डेयरी उद्योग और 'मथुरा रिफाइनरी' के लिए विश्व प्रसिद्ध है. यहां श्रीकृष्ण जन्मभूमि और बांके बिहारी मंदिर प्रमुख पर्यटन केंद्र हैं. सियासत की बात करें तो 2022 के चुनावों में भाजपा ने जिले की पांचों विधानसभा सीटों (छाता, मांट, गोवर्धन, मथुरा सदर और बलदेव) पर क्लीन स्वीप करते हुए परचम लहराया था.

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मथुरा जिले का सियासी हाल (Photo- ITG)
मथुरा जिले का सियासी हाल (Photo- ITG)

मथुरा... देश ही नहीं पूरे विश्व में विख्यात है. क्योंकि, यह भूमि भगवान श्रीकृष्ण की नगरी है. मथुरा एक प्रमुख सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और राजनीतिक केंद्र है. यहां आपको पौराणिक गरिमा और आधुनिक राजनीति का अनूठा उदाहरण देखने को मिलता है. मथुरा का इतिहास द्वापर युग और भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़ा है. कंस की जेल में कृष्ण जन्म, गोकुल, वृंदावन, गोवर्धन और बरसाना में उनकी बाल लीलाएं इस भूमि को अपने आप में बेहद खास बनाती हैं. इसके बाद मौर्य, शुंग और कुषाण साम्राज्य के दौरान मथुरा कला और व्यापार का बहुत बड़ा केंद्र रहा. फिर, मुगल काल और मराठा काल से गुजरते हुए मथुरा ने कई दौर देखे. ब्रिटिश काल में 1803 में यह ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में आया. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में यहां के स्थानीय लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ भाग लिया.

यमुना नदी के किनारे स्थित होने के कारण यहां की मिट्टी काफी उपजाऊ है. क्षेत्र में गेहूं, सरसों, बाजरा, मक्का और आलू मुख्य रूप से उगाई जाती हैं. वहीं, 'माखन-मिश्री' और दूध की नगरी होने के कारण यहां पशुपालन और डेयरी उद्योग भी काफी बड़ा है. यहां का पेड़ा पूरी दुनिया में मशहूर है. मथुरा में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) की प्रसिद्ध 'मथुरा रिफाइनरी' भी है.

पर्यटन की नजर से मथुरा में तमाम ऐसी जगहें हैं, जहां उत्तर प्रदेश के अलावा देश-विदेश से भारी संख्या में लोग आते हैं. सबसे खास है- श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर यानी कि भगवान कृष्ण का जन्म स्थान, जो दुनियाभर के श्रद्धालुओं की आस्था का मुख्य केंद्र है. इसके बाद बांके बिहारी मंदिर (वृंदावन) भी विश्व प्रसिद्ध है. इस्कॉन मंदिर, गोवर्धन पर्वत (परिक्रमा मार्ग), बरसाना एवं नंदगांव, विश्राम घाट आदि ऐसे स्थान हैं जहां सालभर टूरिस्टों का आना लगा रहता है.

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बात सियासत की 

मथुरा में 5 विधानसभा सीटें हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पांचों सीटों पर जीत परचम लहराया था. आइए सिलसिलेवार ढंग से जानते हैं मथुरा की सभी विधानसभा सीटों का हाल...

छाता विधानसभा- 

इस सीट पर वर्तमान में बीजेपी के चौधरी लक्ष्मी नारायण विधायक हैं. 2017 और 2022 में चौधरी लक्ष्मी नारायण ने लगातार भारी मतों से यहां से जीत हासिल की. यह सीट जाट बहुल मानी जाती है. इसके अलावा ब्राह्मण, ठाकुर, यादव और दलित (जाटव) मतदाता भी अच्छी-खासी संख्या में हैं. छाता में लंबे समय से लक्ष्मी नारायण और RLD के तेजपाल सिंह के बीच चुनावी मुकाबला देखने को मिलता रहा है.

मांट विधानसभा- 

इस सीट पर वर्तमान में बीजेपी के राजेश चौधरी विधायक हैं. ब्राह्मण और जाट मतदाताओं का यहां वर्चस्व है. ठाकुर और बघेल समाज के वोटर भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं. मांट सीट से पंडित श्याम सुंदर शर्मा (BSP/निर्दलीय) लगातार 8 बार विधायक चुने गए थे. लेकिन 2022 के चुनाव में बीजेपी के राजेश चौधरी ने श्याम सुंदर शर्मा को हराकर इस सीट पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की और नया इतिहास रचा. 

गोवर्धन विधानसभा-

इस सीट पर वर्तमान में बीजेपी के मेघश्याम सिंह विधायक हैं. जाट, ब्राह्मण, गुर्जर और सैनी/सिसोदिया समाज के वोटर यहां बहुसंख्यक हैं. इस सीट पर समय-समय पर बहुजन समाज पार्टी (BSP), आरएलडी और बीजेपी का प्रभाव रहा है. 2017 में बीजेपी के कारिंदा सिंह जीते थे, जबकि 2022 के चुनाव में बीजेपी के मेघश्याम सिंह ने बसपा प्रत्याशी राजकुमार रावत को हराकर सीट पर कब्जा बनाए रखा. 

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मथुरा सदर विधानसभा- 

इस सीट पर वर्तमान में बीजेपी के श्रीकांत शर्मा विधायक हैं. इस शहरी सीट पर ब्राह्मण, वैश्य (गुप्ता/अग्रवाल), पंजाबी, ठाकुर और मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी आबादी है. कभी यह सीट कांग्रेस के प्रदीप माथुर का गढ़ मानी जाती थी (वे 4 बार विधायक रहे). लेकिन 2017 में बीजेपी के श्रीकांत शर्मा ने प्रदीप माथुर को बड़े अंतर से हराया और 2022 के चुनाव में रिकॉर्ड 1 लाख से अधिक वोटों के अंतर से दोबारा ऐतिहासिक जीत दर्ज की. 

बलदेव विधानसभा- 

इस सीट पर वर्तमान में बीजेपी के पूरन प्रकाश विधायक हैं. यह सीट अनुसूचित जाति (जाटव/धोबी) के लिए सुरक्षित है. हालांकि, चुनाव का रुख तय करने में जाट, बघेल, जाटव और गुर्जर मतदाताओं का गठजोड़ सबसे अहम होता है. परिसीमन के बाद बनी इस सीट पर 2012 में पूरन प्रकाश आरएलडी के टिकट पर जीते थे. बाद में वे बीजेपी में शामिल हुए और 2017 तथा 2022 दोनों चुनावों में लगातार बीजेपी के टिकट पर विधायक चुने गए. 2022 में उन्होंने RLD की बबीता देवी को हराया.

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