छाता, जिसे ऐतिहासिक रूप से 'छत्रवन' के नाम से जाना जाता है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में एक सब-डिविजन हेडक्वार्टर और नगर पंचायत है. भगवान कृष्ण की भूमि ब्रज क्षेत्र से गहराई से जुड़े होने के कारण इसका जिक्र मध्ययुगीन वैष्णव ग्रंथों में ब्रज के पवित्र वनों में से एक के रूप में मिलता है. स्थानीय परंपरा इस शहर को कृष्ण की लीलाओं की कई घटनाओं से जोड़ती है, जिससे इसे धार्मिक महत्व मिलता है. व्यस्त दिल्ली-आगरा हाईवे पर स्थित, छाता आसपास के ग्रामीण इलाकों के लिए एक महत्वपूर्ण औद्योगिक और व्यावसायिक केंद्र के रूप में भी उभरा है.
1951 के परिसीमन आदेश के तहत स्थापित, छाता एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है और मथुरा लोकसभा सीट के पांच हिस्सों में से एक है. इसमें छाता, चौमुहां, नंदगांव और बरसाना नगर पंचायतें, कोसी कलां म्युनिसिपल बोर्ड और छाता, कोसी कलां और पैगांव कानूनगो सर्कल के अंतर्गत आने वाले कई गांव शामिल हैं, जिससे यह मुख्य रूप से एक ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र बन जाता है.
छाता ने आजादी के बाद से उत्तर प्रदेश में हुए सभी 18 विधानसभा चुनावों में हिस्सा लिया है, जिसकी शुरुआत 1952 के पहले चुनाव से हुई थी. इसने एक 'स्विंग निर्वाचन क्षेत्र' के रूप में ख्याति प्राप्त की है, क्योंकि कोई भी पार्टी लगातार दो कार्यकाल से ज्यादा समय तक इस सीट को अपने पास नहीं रख पाई है. बीजेपी ने दो बार यह उपलब्धि हासिल की है, जबकि कांग्रेस और जनता पार्टी ने एक-एक बार लगातार दो कार्यकाल के लिए इस निर्वाचन क्षेत्र को अपने पास रखा है.
कुल मिलाकर, बीजेपी ने पांच बार यह सीट जीती है, जिसमें 1967 में भारतीय जनसंघ की एकमात्र जीत भी शामिल है. कांग्रेस पार्टी ने चार बार जीत हासिल की है, जनता पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल (RLD) ने दो-दो बार, जबकि सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय क्रांति दल, लोक दल, जनता दल और बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने एक-एक बार इस निर्वाचन क्षेत्र में जीत हासिल की है.
तेजपाल सिंह, जिन्होंने पहले जनता दल और RLD के टिकट पर इस निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था, ने 2012 में RLD के लिए यह सीट जीती. उन्होंने BSP उम्मीदवार चौधरी लक्ष्मी नारायण सिंह को 14,594 वोटों से हराया था. उस चुनाव में सिर्फ 3.38% वोट पाकर चौथे स्थान पर रही BJP ने 2015 में लक्ष्मी नारायण सिंह के पार्टी में शामिल होने के बाद जबरदस्त वापसी की. सिंह, जो पहले कांग्रेस और BSP से विधायक रह चुके थे, ने 2017 में BJP को शानदार जीत दिलाई और निर्दलीय उम्मीदवार अतुल सिंह को 63,838 वोटों से हराया. योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने के बाद, उन्होंने 2022 में RLD के तेजपाल सिंह को 48,948 वोटों से हराकर अपनी सीट बरकरार रखी. उन्हें 1,24,414 वोट मिले जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी को 75,466 वोट मिले.
लोकसभा चुनावों में भी BJP का दबदबा साफ दिखा है. 2009 में, उस समय BJP की सहयोगी रही RLD इस विधानसभा क्षेत्र में BSP से 22,368 वोट आगे थी. गठबंधन टूटने के बाद, BJP ने मथुरा संसदीय सीट पर अकेले चुनाव लड़ा और छाता में मजबूत बढ़त बनाई. 2014 में वह RLD से 96,331 वोट और 2019 में 80,111 वोट आगे रही. 2024 में, BJP ने कांग्रेस पर अपनी बढ़त को 74,546 वोटों तक पहुंचाया. हेमा मालिनी को 1,07,946 वोट मिले जबकि मुकेश धनगर को 33,400 वोट मिले.
समय के साथ मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी है. 2012 में छाता में 3,02,037 पंजीकृत मतदाता थे. यह संख्या 2017 में बढ़कर 3,50,277, 2019 में 3,52,252, 2022 में 3,64,870 और 2024 में 3,74,626 हो गई. मतदान का प्रतिशत आम तौर पर अच्छा रहा है, हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव के बीच इसमें 16 प्रतिशत से ज्यादा की भारी गिरावट आई. वोटिंग प्रतिशत 2012 में 69.78%, 2017 में 61.75%, 2019 में 62.01%, 2022 में 65.39% था और 2024 में घटकर 49.22% हो गया.
छाता हिंदू-बहुसंख्यक निर्वाचन क्षेत्र है, जहां जाट समुदाय मुख्य राजनीतिक ताकत है. अनुमान है कि मुस्लिम मतदाता कुल मतदाताओं का लगभग 14% हैं, जबकि अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी लगभग 16.11% है. अन्य प्रभावशाली समुदायों में ब्राह्मण, गुर्जर, वैश्य और सैनी शामिल हैं, और मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से आता है. यह निर्वाचन क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है. यहां के 76.84% मतदाता गांवों में और बाकी 23.16% शहरी इलाकों में रहते हैं.
इस शहर का इतिहास मध्यकाल से भी पहले का है. पुरातात्विक खोजों से पता चलता है कि लौह युग से जुड़ा इस इलाके में 'पेंटेड ग्रे वेयर' (Painted Grey Ware) काल के दौरान इंसानी बस्तियां थीं. वहीं, कुषाण और गुप्त काल के अवशेष यहां लगातार इंसानी बसावट की ओर इशारा करते हैं. छाता की धार्मिक पहचान 'छत्रवन' से जुड़ी है, जो मध्यकालीन वैष्णव साहित्य में वर्णित ब्रज के 12 पवित्र वनों में से एक है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह इलाका सूर्यकुंड और चंद्रकुंड के आसपास कृष्ण की दिव्य लीलाओं से जुड़ा है. मध्यकाल में, दिल्ली-आगरा मार्ग पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में इस शहर को अहमियत मिली. यहां की भव्य सराय, जिसे कभी शेरशाह सूरी से जोड़ा जाता था और बाद में मुगल काल में जिसका विस्तार किया गया, आज भी उत्तर भारत के सबसे व्यस्त व्यापारिक मार्गों में से एक पर छाता के महत्व की याद दिलाती है. बाद में ब्रिटिश रिकॉर्ड्स में छाता को परगना का मुख्यालय बताया गया, जिससे इसका प्रशासनिक महत्व और बढ़ गया.
दिल्ली और आगरा के बीच नेशनल हाईवे 19 पर स्थित छाता में सड़क संपर्क बहुत अच्छा है. यहां की जमीन ज्यादातर समतल और उपजाऊ है और यह ऊपरी गंगा के मैदानी इलाकों का हिस्सा है, जबकि यमुना नदी इस निर्वाचन क्षेत्र के पूर्व में बहती है. खेती यहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जिसमें गेहूं, धान, सरसों और गन्ना मुख्य फसलें हैं. डेयरी फार्मिंग एक महत्वपूर्ण सहायक व्यवसाय है. हाईवे ने गोदामों, ट्रांसपोर्ट के कारोबार, एग्रो-प्रोसेसिंग यूनिट्स, कोल्ड स्टोरेज और छोटे मैन्युफैक्चरिंग उद्योगों के विकास को बढ़ावा दिया है, जबकि पास के कोसी कलां इंडस्ट्रियल बेल्ट ने इलाके की कमर्शियल गतिविधियों को और बढ़ाया है.
छाता सड़क और रेल दोनों से जुड़ा हुआ है. शहर का अपना रेलवे स्टेशन नॉर्थ सेंट्रल रेलवे के दिल्ली-मथुरा सेक्शन पर है, हालांकि यहां बहुत कम पैसेंजर ट्रेनें रुकती हैं. लंबी दूरी की ज्यादातर यात्राओं के लिए, यहां के लोग पास के कोसी कलां रेलवे स्टेशन पर निर्भर रहते हैं, जहां से दिल्ली, आगरा और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों के लिए बेहतर कनेक्टिविटी मिलती है. छाता, कोसी कलां से लगभग 10 किमी, वृंदावन से 45 किमी, मथुरा में जिला मुख्यालय से 50 किमी, हरियाणा में फरीदाबाद (जो दिल्ली की तरफ नेशनल कैपिटल रीजन का पहला बड़ा शहर है) से लगभग 75 किमी, आगरा से लगभग 95 किमी, दिल्ली से लगभग 120 किमी और राज्य की राजधानी लखनऊ से लगभग 420 किमी दूर है.
पिछले दशक में, बीजेपी ने छाता को एक पारंपरिक 'स्विंग निर्वाचन क्षेत्र' से बदलकर अपने मजबूत गढ़ों में से एक बना लिया है. 2014 के बाद से, यहां हुए सभी पांच विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टी ने जीत हासिल की है या बढ़त बनाई है, और हर बार अच्छे अंतर से जीती है. NDA में RLD की वापसी से इस जाट-बहुल निर्वाचन क्षेत्र में गठबंधन की संभावनाओं के और मजबूत होने की उम्मीद है, चाहे अंत में कोई भी सहयोगी पार्टी इस सीट से चुनाव लड़े. समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्ष के लिए चुनौती एक भरोसेमंद उम्मीदवार उतारने और एक व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने की होगी, जो बीजेपी की बढ़त को कम कर सके. 2027 के चुनावों को देखते हुए, BJP को साफ बढ़त मिलती दिख रही है, हालांकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी मुकाबलों में अक्सर यह देखा गया है कि स्थानीय कारक और उम्मीदवार का चयन नतीजों पर असर डाल सकते हैं.
(अजय झा)
Tejpal Singh
RLD
Sonpal
BSP
Lakshminarayan
IND
Poonam Devi
INC
Kulbhanu Kumar
CPI
Nota
NOTA
Tej Singh
IND
Prahalad Singh Chaudhry
AAAP
Rajiv Sharma
IND
Subrati Khan
ASPKR
Karan Singh
IND
Atul
IND
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