उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावको लेकरसियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने पूर्वांचल से लेकर पश्चिम यूपी में एक्टिव हो गए हैं और ताबड़तोड़ रैलियां कर सियासी माहौल बनाना शुरू कर दिया है. मिशन-यूपी का आगाज ओवैसी ने पूर्वांचल के बहराइच की मटेरा सीट किया और अब दूसरी रैली पश्चिमी यूपी के बिजनौर जिले की नजीबाबाद में किया.
असदुद्दीन ओवैसी ने सोमवार को मुस्लिम बहुल नजीबाबाद में जनसभा को संबोधित करते हुए बीजेपी और सपा पर जमकर हमले किए. उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव समाजवाद की नहीं, बल्कि 'यादववाद' की राजनीति करते हैं. मुसलमान अब यूपी में दरी बिछाने की नहीं, बल्कि हिस्सेदारी के लिए काम करेगा.
ओवैसी का यह आक्रामक रुख सीधे तौर पर सपा और अखिलेश यादव के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले वाली राजनीतिक के लिए चुनौती देता नजर आ रहा है. ऐसे में बड़ा सवाल उठता है कि क्या ओवैसी यूपी में अखिलेश यादव के लिए सियासी टेंशन बन रहे हैं?
बहराइच के बाद बिजनौर में ओवैसी की हुंकार
उत्तर प्रदेश की सियासत में असदुद्दीन ओवैसी ने बहराइच और बिजनौर में रैली कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है. ओवैसी के लिए मुस्लिम पॉलिटिक्स का पूरा मैदान ही खाली पड़ा है.सूबे में मुस्लिमों का एकमुश्त वोट लेने वाले अखिलेश यादव अब 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राह पर चल पड़े हैं. ऐसे में ओवैसी ने मुस्लिम परस्त पॉलिटिक्स शुरू कर दी है. इसके लिए ओवैसी ने पहले बहराइच के मटेरा को चुना,जहां गाजी सालार मसूद की दरगाह है.
गाजी मियां की दरगाह जो कभी हिंदू मुस्लिम एकता के प्रतीक के तौर पर जाना जाता था, लेकिन अब राजभर-पासी और मुसलमानों के बीच विवाद की सबसे बड़ी वजह बन गया. इसीलिए ओवैसी ने पहले बहराइच को चुना और उसके बाद अब पश्चिमी यूपी के बिजनौर की नजीबाबाद सीट से हुंकार भरी, जो मुस्लिम बहुल मानी जाती है.
ओवैसी ने नजीबाबाद में भाजपा पर सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि संभल की मस्जिद को शहीद कर दिया गया है. अगर मुसलमान केवल वोटर बनकर रहेंगे, तो उनके बच्चों का भविष्य नहीं सुधरेगा. राजनीतिक दलों ने 70 साल से मुसलमानों को नेतृत्व नहीं दिया.भाजपा मुसलमानों को टिकट नहीं देती, जबकि सपा ने उन्हें गुलाम बनाकर रखा है। मुसलमानों को सिर्फ वोटर बनकर नहीं रहना चाहिए. इस तरह ओवैसी ने मुस्लिमों के दुगती रग पर हाथ रखकर उन्हें साधने का दांव चला.
यूपी की मुस्लिम सियासत पर ओवैसी की नजर
उत्तर प्रदेश की कुल 403 विधानसभा सीटों में से लगभग 143 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं. इनमें से करीब 73 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है, जो मुख्य रूप से पश्चिमी यूपी और पूर्वांचल के जिलों में फैली हुई है. पारंपरिक तौर पर मुस्लिम वोटर बीजेपी को रोकने के लिए समाजवादी पार्टी के पक्ष में लामबंद होते रहे हैं.
अखिलेश यादव ने 'पीडीए' का नारा बुलंद किया है, जिसका मुख्य उद्देश्य मुस्लिम परस्त वाली छवि से बाहर निकलकर अति-पिछड़ों और दलितों को जोड़ना चाहते हैं. ओवैसी इसी रणनीति के बीच में अपनी जगह बनाना चाहते हैं, जिसके लिए सपा को मुस्लिम विरोधी कठघरे में खड़े करने की कवायद में जुट गए हैं. ओवैसी का आरोप है कि सपा मुसलमानों के वोट तो लेती है, लेकिन उन्हें नेतृत्व या उनके हक की बात करने से कतराती है और न उनके मुद्दो को उठाती है.
सपा का क्या सियासी गेम बिगाड़ेंगे ओवैसी
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता सपा का कोर वोटबैंक माना जाता है. 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिमों का 80 फीसदी से भी ज्यादा वोट सपा को मिला है. अखिलेश यादव मानकर चल रहे हैं कि 2027 में जिस तरह से चुनाव दो ध्रुवीय हो रहा है, उसके चलते मुस्लिम मतदाता उनके पक्ष में लामबंद रहेंगे, लेकिन जिस तरह से ओवैसी ने पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी तक अपनी सक्रियता बढ़ा दी है, उसे चलते सपा के लिए चुनाव में सियासी समीकरण गड़बड़ा सकता है.
धार्मिक ध्रुवीकरण के डर से सपा जिस तरह मुसलमानों के मुद्दे और मुस्लिम प्रतिनिधित्व की पर चुप्पी साधे हुए हैं, उसे लेकर मुस्लिमों में बेचैनी है. ऐसे में ओवैसी अब उस असंतोष को भुनाने की कवायद में जुट गए हैं और उनकी नजर मुस्लिम वोटबैंक को अपने पाले में लाने की है. ओवैसी भले ही खुद सीटें न जीत पाएं, लेकिन अगर वे मुस्लिम बहुल सीटों पर 10,000 से 20,000 वोट भी काटने में कामयाब रहे, तो सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है. बिहार विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने आरजेडी को इसी तरह नुकसान पहुंचाया था.
ओवैसी का तीखा और बेबाक भाषण देने का अंदाज मुस्लिम युवाओं के एक हिस्से को आकर्षित करता है, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों की 'सुरक्षित राजनीति' से ऊब चुके हैं. पश्चिमी यूपी और पूर्वांचल में कई सीटें ऐसी हैं जहां हार-जीत का अंतर बहुत कम होता है. ओवैसी का उम्मीदवारों को मैदान में उतारना सपा के समीकरण को पूरी तरह बिगाड़ सकता है.
यूपी में ओवैसी क्या मुस्लिमों का दिल जीत पाएंगे
उत्तर प्रदेश की मुस्लिम बहुल सीटों पर ओवैसी ने चुनाव लड़ने का प्लान बनाया है, जिसके लिए उन्होंने मुस्लिम बहुल सीटों से चुनावी अभियान भी शुरू कर दिए हैं. 2027 में ओवैसी की पार्टी 403 सीटों में से 200 सीटों पर चुनाव लड़ने का दम भर रही है, जहां पर 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम हैं. इन्हीं सीटों को सपा अपनी सबसे सुरक्षित सीटें मानती है, जिस पर अब ओवैसी की नजर है.
असदुद्दीन ओवैसी यूपी में 2017 से किस्मत आजमा रहे हैं, लेकिन अभी तक उनकी पार्टी का खाता तक नहीं खुला. 2017 में AIMIM ने 38 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिसमें से सिर्फ एक सीट पर ही मुख्य मुकाबले थे, वो सीट संभल रही थी, जहां से जियाउर्रहमान बर्क चुनाव लड़े थे. हालांकि, वो भी जीत नहीं सके थे. इसके अलावा सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. 2022 के चुनाव में AIMIM ने करीब 100 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें से एक उम्मीदवार गुड्डू जमाली को छोड़कर सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी.
यूपी की सियासत में मुस्लिमों की पसंद कभी भी ओवैसी नहीं बन सके हैं. 2017 में AIMIM को 0.2 फीसदी और 2022 में 0.43 फीसदी वोट मिला है. ओवैसी का सियासी प्रभाव देश में उन्हीं सीटों पर दिखा है, जहां पर मुस्लिम आबादी 50 फीसदी से ज्यादा है. ऐसे में यूपी के उन्हीं क्षेत्रों में ओवैसी अपनी सियासी जड़े जमाने की कवायद में है, जहां पर मुस्लिम वोटर बड़ी संख्या है. ऐसे में देखना है कि ओवैसी क्या मुस्लिम वोटों को अपने साथ जोड़ पाएंगे या फिर नहीं?