scorecardresearch
 

आत्मनिर्भर भारत ही असली रक्षा कवच बनेगा- सुरक्षा सभा में बोले एक्सपर्ट

सुरक्षा सभा में अंशुमन त्रिपाठी, ब्रिगेडियर देवाशीष चौधरी और विवेक मिश्रा ने भविष्य की युद्धनीति पर चर्चा की. आत्मनिर्भरता, स्वदेशी आरएंडडी, एआई, ड्रोन और इकोसिस्टम की जरूरत पर जोर दिया. मेक इन इंडिया को जीत की कुंजी बताया.

Advertisement
X
बाएं से - अंशुमन त्रिपाठी, ब्रिगेडियर देवाशीष चौधरी और विवेक मिश्रा.
बाएं से - अंशुमन त्रिपाठी, ब्रिगेडियर देवाशीष चौधरी और विवेक मिश्रा.

आजतक की सुरक्षा सभा में 'भविष्य की युद्धनीति' सेशन के दौरान तीन महत्वपूर्ण आवाजें एक मंच पर आईं. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के पूर्व सदस्य अंशुमन त्रिपाठी, जिन्होंने देश की रणनीतिक चुनौतियों, साइबर सुरक्षा और उभरते खतरों का गहराई से विश्लेषण किया है. 

ब्रिगेडियर देवाशीष चौधरी, जिन्होंने तीन दशकों से अधिक सैन्य सेवा दी और पहली स्वदेशी पिनाका रेजिमेंट को खड़ा किया. राफे एमफाइबर के संस्थापक और सीईओ विवेक मिश्रा, जिनकी कंपनी सेना और सुरक्षा बलों के लिए अत्याधुनिक ड्रोन, अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स और एयरोस्पेस कंपोजिट बना रही है. 

इन तीनों के संवाद से साफ हुआ कि भविष्य का युद्ध सिर्फ हथियारों का नहीं बल्कि आत्मनिर्भरता, तेजी से बदलती तकनीक और मजबूत इकोसिस्टम का होगा. भारत जैसे देश के लिए जहां चुनौतियां हर कोण से खड़ी हैं, मेक इन इंडिया और इंडिजिनस डिजाइन डेवलपमेंट एंड मैन्युफैक्चरिंग यानी आईडीडीएम अब विकल्प नहीं बल्कि मजबूरी बन चुका है.  

यह भी पढ़ें: 'ऑपरेशन सिंदूर हमने स्वदेशी हथियारों के दम पर किया...', एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र ने खोले कई राज

दो-ढाई मोर्चों की लड़ाई और आत्मनिर्भरता की जरूरत

Advertisement

विवेक मिश्रा ने साफ कहा कि भारत एक ऐसा देश है जिसके पास चुनौतियों का भंडार है. हर दिशा में खतरा दिखता है. एनएसए साहब भी कह चुके हैं कि हम दो-ढाई मोर्चों की लड़ाई लड़ते हैं जिसमें आधा मोर्चा घर के अंदर ही है. ऐसे में अगर पड़ोसी देशों का समर्थन बंद हो जाए तो हम कैसे लड़ पाएंगे? 

Bhavishya ki Yuddhaniti

इसलिए आत्मनिर्भरता सबसे बड़ी जरूरत है. ब्रिगेडियर चौधरी ने यूक्रेन युद्ध का उदाहरण दिया. वहां लड़ाई निरंतर नहीं चलती बल्कि सीखते हुए, विकसित करते हुए और बीच में सुधार करते हुए आगे बढ़ती है. पहली अटैक संभालना महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि सौवीं अटैक संभालने की क्षमता रखना जरूरी है. इसके लिए अपनी खुद की रिसर्च एंड डेवलपमेंट होनी चाहिए. 

बाहर से तकनीक लेकर आप दुश्मन से बेहतर नहीं हो सकते. जीतने के लिए आपको बेहतर बनना होगा और बेहतर तभी बनेंगे जब खुद डिजाइन, विकास और निर्माण करेंगे. तकनीक हर दो महीने में बदल रही है. अगर अपना आरएंडडी नहीं होगा तो जवाब नहीं दे पाएंगे. मेक इन इंडिया सिर्फ नारा नहीं, आईडीडीएम के रूप में वास्तविक जरूरत बन चुका है.  

यह भी पढ़ें: 'फ्यूचर में हर लड़ाई ड्रोन वॉर होगी', पूर्व DRDO वैज्ञानिक ने सुनाया अमेरिका के F-16 का चौंकाने वाला किस्सा

Advertisement

बुनियादी विज्ञान और तेजी से विकास का रास्ता

अंशुमन त्रिपाठी ने जोर दिया कि तकनीक में बेहतर होना है तो भौतिकी, गणित, रसायन और सामग्री विज्ञान में बेहतर होना पड़ेगा. तकनीक इन्हीं पर आधारित होती है. तेज विकास तभी संभव है जब कई कंपनियां, विश्वविद्यालय और संस्थान मिलकर न सिर्फ तकनीक बल्कि विनिर्माण तकनीक पर भी रिसर्च करें. आलोचक कहते हैं कि भारत में रिसर्च का माहौल नहीं है. 

Bhavishya ki Yuddhaniti

त्रिपाठी ने छात्रों से पूछा कि परीक्षा के लिए कितने खुद किताब से पढ़ते हैं और कितने सिर्फ शिक्षक के नोट्स से काम चलाते हैं. ज्यादातर ने खुद मेहनत करने की बात कही. उन्होंने कहा कि हमारे देश में अर्जुन और एकलव्य दोनों हैं. छात्र खुद पढ़ते हैं. पहले फोकस आईएएस या फौजी बनने पर था, शिक्षक बनने पर कम. अब शिक्षा और रिसर्च पर ध्यान बढ़ रहा है इसलिए माहौल बदल रहा है. पहले कमी थी लेकिन अब प्रगति दिख रही है.  

इकोसिस्टम की जरूरत: छोटी से छोटी चीज भी महत्वपूर्ण

विवेक मिश्रा ने बताया कि अमेरिका और यूरोप एआई की बात आसानी से कर सकते हैं क्योंकि उनके पास मजबूत इकोसिस्टम है. कार्बन फाइबर, जटिल चिप्स, सामग्री सब वहां उपलब्ध है. भारत पीछे है. हमें दो मोर्चों पर लड़ना है- एक तो हार्डवेयर, सामग्री, इलेक्ट्रॉनिक्स में पकड़ बनाना और दूसरा समानांतर रूप से एल्गोरिदम और एआई पर काम करना. ताकि पांच-दस साल बाद आने वाले वैज्ञानिक विश्व स्तर पर तैयार हों. स्क्रू जैसी छोटी चीज भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि वह धातु विज्ञान की नींव रखती है.

Advertisement

यह भी पढ़ें: कर्नल भरवान बोले- आज की जेनरेशन को रील नहीं, रियल सच सुनाने की जरूरत

बचपन की कविता याद दिलाई गई- एक कील की कमी से साम्राज्य चला गया. हर छोटी चीज बड़ी सफलता की ओर ले जाती है. सेमीकंडक्टर और एआई भविष्य के युद्ध के दो बड़े स्तंभ होंगे. पुराने जमाने में बड़ा बम फोड़कर तबाही मचाना लक्ष्य होता था. आज कोलेटरल डैमेज कम करके सटीक निशाना लगाना है. इसके लिए पिनपॉइंट एक्यूरेसी चाहिए जो सेमीकंडक्टर और एआई से ही संभव है. 

एआई दोधारी तलवार और प्रशिक्षण की अहमियत

एआई उपभोक्ता बाजार में अच्छा है. पंखा बंद हो जाए तो सिर्फ गर्मी लगेगी. लेकिन विमान या मिसाइल के टारगेटिंग सिस्टम में गलती हो और अपने जवानों पर गिर जाए तो कीमत बहुत भारी होगी. इसलिए रक्षा और एयरोस्पेस में एआई की क्षमताओं और सीमाओं को वैज्ञानिक अध्ययन से समझकर ही रणनीति में शामिल करना होगा. ब्रिगेडियर चौधरी ने मशीन और मन दोनों की ट्रेनिंग पर जोर दिया. 

Bhavishya ki Yuddhaniti

पुराने समय में कंप्यूटर के लिए कतार लगती थी. गिगो सिद्धांत था- गलत इनपुट तो गलत आउटपुट. आज एआई वही परिणाम बेहतर पैकेज में और ज्यादा आत्मविश्वास से देता है लेकिन गलतियां मशीन की रफ्तार से होती हैं. समस्या एल्गोरिदम में नहीं बल्कि ट्रेनिंग में है. मशीन को ट्रेन करो ताकि गलतियां कम हों. मन को ट्रेन करो ताकि वह मशीन को नकारे नहीं या अंधाधुंध स्वीकार न करे. 

Advertisement

लाइव ट्रेनिंग प्रभावी लेकिन महंगी है. सिमुलेटर ट्रेनिंग जरूरत बन गई है. टेर्री रिपोर्ट भी कहती है कि सिमुलेटेड ट्रेनिंग लागत और जनशक्ति दोनों में प्रभावी है. मिसाइल दागकर ट्रेनिंग नहीं हो सकती. सिम्युलेटर से सिम टू रियल ट्रेनिंग आज कॉम्बैट सपोर्ट है.  

मानसिकता में बदलाव और स्वदेशी पर भरोसा

लंबे समय तक विदेशी चीजों के प्रति हीन भावना रही. परफ्यूम से लेकर हथियार तक विदेशी बेहतर लगते थे. ब्रिगेडियर चौधरी ने कहा कि जब वे सेना में थे तो वैज्ञानिकों पर भरोसा था. कठिनाइयां अक्षमता की वजह से नहीं बल्कि बुनियादी ढांचे और सरकारी समर्थन की कमी की वजह से थीं. वे खुद पहली पिनाका रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर रहे. डीआरडीओ और टाटा ने दिन-रात मेहनत की. 

यह भी पढ़ें: 'युद्ध जीतने के लिए मल्टी डोमेन स्ट्रैटजी जरूरी', CDS ने गिनाई वॉर फ्रंट की चुनौतियां

इजरायली उद्योगों ने कहा कि डीआरडीओ ने जैसा पिनाका विकसित किया वे नहीं कर सकते थे. अब बुनियादी ढांचा और समर्थन दोनों हैं. मानसिकता तेजी से बदल रही है. मेड इन इंडिया स्वीकार हो रहा है. विवेक मिश्रा ड्रोन बनाते हैं, ब्रिगेडियर की कंपनी ड्रोन गिराती है. दोनों मिलकर सशक्त भारत बना रहे हैं. यह अलगाव में नहीं बल्कि ग्रिड या मेश के रूप में काम कर रहा है.  

Advertisement

विशिष्ट जरूरतों का समाधान और रक्षा कूटनीति

विदेशी उत्पाद हमेशा भारतीय जरूरतों के अनुरूप नहीं होते. अपाचे हमला हेलीकॉप्टर दुनिया में अच्छा माना जाता है लेकिन सियाचिन जैसी ऊंचाई पर सर्विस सीलिंग की जरूरत थी जो अपाचे पूरी नहीं कर पाता. इसलिए प्रचंड बनाया गया जिसकी सर्विस सीलिंग दुनिया में सबसे ऊंची है. 

अमेरिका बना सकता था लेकिन उसे सियाचिन नहीं है इसलिए जरूरत नहीं पड़ी. चार पीस बनाने से वॉल्यूम नहीं आता. स्केल नहीं बनता तो सुधार के मौके नहीं मिलते. इसलिए रक्षा मंत्री ने रक्षा कूटनीति फ्रेमवर्क जारी किया ताकि दूसरे देशों के साथ असेंबली और बातचीत हो, निर्यात बढ़े, वॉल्यूम आए और उत्पाद बेहतर हों.  

निजी क्षेत्र, स्टार्टअप और डीआरडीओ की भूमिका

रक्षा और एयरोस्पेस अब निजी उद्योग के लिए खुले हैं. स्टार्टअप तेजी से काम कर सकते हैं लेकिन फंडिंग संस्कृति में कठिनाई है. गहरी जेब की जरूरत होती है. सरकारी एजेंसियों, उपयोगकर्ताओं, डीआरडीओ और पीएसयू का समर्थन जरूरी है. मेक इन इंडिया अद्भुत पहल थी जिससे विनिर्माण शुरू हुआ. अब जोर आईडीडीएम पर है क्योंकि असली राजस्व बौद्धिक संपदा से आता है. 

यह भी पढ़ें: कैसे बदली सैन्य सेवाओं में महिलाओं की भूमिका, आरती सरीन ने बताया

बोइंग-एयरबस का मार्जिन एयरलाइंस से ज्यादा इसलिए क्योंकि उनके पास डिजाइन और विकास है. अगले दस-पंद्रह साल बहुत महत्वपूर्ण हैं. अगर दो-तीन गुना जोर मिला तो विश्व स्तर पार कर जाएंगे. पहले संवेदनशील क्षेत्र में निजी खिलाड़ियों पर भरोसे का मुद्दा था लेकिन अब विश्वास बढ़ रहा है.  

Advertisement

पैनल ने सहमति जताई कि तकनीक तेजी से आ रही है. AI से टारगेटिंग सटीक हो रही है. सेमीकंडक्टर बड़ी भूमिका निभाएंगे. हिंदुस्तान ने ऑपरेशन को परिपक्वता से संभाला- शुरुआत और अंत दोनों सर्जिकल थे. ट्रेनिंग अब सहायक नहीं बल्कि संचालन के साथ चलने वाला कॉम्बैट सपोर्ट है. 

मशीन, मन और सैनिक को ट्रेन नहीं किया तो सिर्फ टिप्पणी रह जाएगी. DRDO बड़े भाई की भूमिका निभा सकता है. निजीकरण शुरू हुआ है, इकोसिस्टम अभी दिल्ली से दूर है लेकिन निरंतर जोर मिला तो स्टेट-ऑफ-द-आर्ट पार कर जाएंगे. यह निर्णायक समय है. छात्रों की एकलव्य वाली मेहनत, वैज्ञानिकों का विश्वास, उद्यमियों की गति और नीति निर्माताओं का समर्थन मिलकर भविष्य की युद्धनीति को आकार देंगे. आत्मनिर्भर भारत ही असली रक्षा कवच बनेगा.  

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement