यमन का गृहयुद्ध 2014 में शुरू हुआ जब हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार को बाहर धकेल दिया गया. 2015 में सऊदी अरब ने यमनी सरकार का समर्थन करते हुए सैन्य हस्तक्षेप शुरू किया. सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने हवाई हमले शुरू किए. मकसद हूतियों को रोकना और ईरान के प्रभाव को कम करना था. हूतियों पर ईरान का समर्थन होने का आरोप लगता है.
सऊदी की दक्षिणी सीमा यमन से लगती है. हूतियों के मिसाइल और ड्रोन हमले सऊदी शहरों और तेल सुविधाओं तक पहुंचने लगे. सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव के लिए सऊदी शामिल हुआ. 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ लेकिन 2026 में तनाव फिर बढ़ गया.
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हूतियों ने तटीय क्षेत्रों में बढ़त बनाई और सऊदी पर हमले तेज किए. सऊदी ने जवाबी हवाई हमले किए. अमेरिकी खुफिया समर्थन भी मिल रहा है. यह संघर्ष अब सिर्फ यमन तक सीमित नहीं. लाल सागर शिपिंग और क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित हो रही है. सऊदी शांति चाहता है लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए कार्रवाई कर रहा है.

सऊदी अरब, यमन और हूतियों की सैन्य शक्ति
सऊदी अरब
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यमन (आधिकारिक सरकारी बल)
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हूती आंदोलन (अंसार अल्लाह)
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तीनों की तुलना
सऊदी पारंपरिक सैन्य शक्ति में बहुत आगे है. आधुनिक जेट्स, टैंक और मिसाइल डिफेंस. लेकिन यमन जैसे युद्ध में जमीनी नियंत्रण मुश्किल. हूती सस्ते और प्रभावी ड्रोन-मिसाइल से हमला करते हैं. लड़ाकों की एकजुटता और इलाके का फायदा उठाते हैं.
यमनी सरकार सऊदी बिना कमजोर है. अनुभव बढ़ा है लेकिन एकजुटता कम. हूती संगठित और प्रेरित दिखते हैं. ईरानी समर्थन उनकी मिसाइल क्षमता बढ़ाता है.
संघर्ष लंबा चल सकता है. सऊदी हवाई श्रेष्ठता से दबाव बना सकता है लेकिन पूरी जीत हासिल करना बेहद कठिन. हूती हमले जारी रखकर बातचीत का दबाव बनाते हैं. क्षेत्रीय प्रभाव और तेल सुरक्षा दांव पर है. दोनों पक्षों को नुकसान हो रहा है. शांति के प्रयास जारी रखने होंगे वरना मानवीय संकट बढ़ेगा.
यह तुलना दिखाती है कि आधुनिक युद्ध में सिर्फ संख्या नहीं बल्कि तकनीक, रणनीति और समर्थन मायने रखते हैं. सऊदी की ताकत रक्षात्मक है जबकि हूती आक्रामक असमान तरीके अपनाते हैं.