भारतीय सेना के आर्टिलरी रेजिमेंट यानी तोपखाने ने 200 साल का लंबा सफर तय किया है. पहाड़ी इलाकों में खींचकर ले जाए जाने वाले छोटे तोपों से लेकर आज ड्रोन, निगरानी सिस्टम और डेटा नेटवर्क से जुड़े सटीक फायरपावर तक यह काफी बदल चुका है. 28 सितंबर 2026 को रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी के 200 साल पूरे होने पर यह सिर्फ पुरानी विरासत को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह सेना के एक प्रमुख अंग में हो रहे बड़े बदलाव का प्रतीक भी है.
पहाड़ी तोपों से लेकर निर्णायक हथियार तक
आधुनिक रेजिमेंट की शुरुआत 28 सितंबर 1827 को हुई जब 5 (बॉम्बे) माउंटेन बैटरी को 2.5 इंच की तोपों के साथ स्थापित किया गया. यह इकाई आज भी रेजिमेंट का हिस्सा है. 28 सितंबर को गनर्स डे के रूप में मनाया जाता है. लेकिन भारत में आर्टिलरी का इतिहास इससे भी पुराना है. 14वीं सदी से ही तोपों का इस्तेमाल दर्ज है.
मुगल, मराठा, हैदर अली, टीपू सुल्तान और महाराजा रणजीत सिंह के समय में भी आर्टिलरी महत्वपूर्ण रही. आजादी के बाद गनर्स ने 1947-48, 1962, 1965, 1971 और 1999 के प्रमुख युद्धों के साथ आतंकवाद विरोधी अभियानों और विदेश मिशनों में हिस्सा लिया. कारगिल युद्ध 1999 इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.
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On the occasion of #GunnersDay, #GeneralDhirajSeth, #COAS and All Ranks of #IndianArmy extend warm greetings and best wishes to All Ranks, #Veterans and Families of the #RegimentofArtillery. With precision, firepower and an unwavering commitment to mission accomplishment, the Gunners remain a formidable force on the battlefield, serving with pride and upholding the motto of Sarvatra Izzat-O-Iqbal. #GunnersDay @DefenceMinIndia @SpokespersonMoD
— ADG PI - INDIAN ARMY (@adgpi) September 28, 2026
ऊंचे पहाड़ों में पाकिस्तानी ठिकानों को कमजोर करने में तोपखाने की भूमिका निर्णायक रही. बोफोर्स तोपें ऑपरेशन विजय का प्रतीक बन गईं. सेना ने बाद में द्रास के पॉइंट 5140 को 2022 में गन हिल का नाम दिया. रक्षा मंत्रालय के अनुसार सटीक और घातक तोपखाने की गोलाबारी ने दुश्मन सैनिकों और डिफेंस सिस्टम पर गहरा असर डाला.
ऑपरेशन सिंदूर और दो मोर्चों पर तैनाती
मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर में भी आर्टिलरी की भूमिका साफ दिखी. पाकिस्तान समर्थित आतंकी ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई और नियंत्रण रेखा पर तनाव के दौरान तोपखाने को तैनात किया गया. पाकिस्तान ने कुपवाड़ा, बारामूला, उरी, पूंछ, मेंढर और राजौरी समेत कई क्षेत्रों में मोर्टार और भारी तोपों से फायरिंग की. भारतीय बलों ने जवाब देकर फायरिंग रोक दी.

इस ऑपरेशन ने दिखाया कि आर्टिलरी अब अकेले काम नहीं करती. ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन, निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और परतदार वायु रक्षा के साथ यह एक बड़े सटीक फायर सिस्टम का हिस्सा बन चुकी है. नियंत्रण रेखा और वास्तविक नियंत्रण रेखा दोनों पर आर्टिलरी की तैनाती महत्वपूर्ण है. पश्चिम में यह फायर सपोर्ट का अहम हिस्सा है जबकि ऊंचाई वाले उत्तरी क्षेत्रों में एम777 और के9 वज्र-टी जैसी प्रणालियां कठिन इलाके में फायरपावर देने के विकल्प बढ़ा रही हैं.
पुरानी तोपों की जगह सटीकता और गतिशीलता
आज का तोपखाना पुराने युद्धों वाले बल से काफी अलग है. यह 155 मिमी सिस्टम, ज्यादा गतिशीलता, लंबी रेंज, बेहतर सटीकता और तेजी से लक्ष्य भेदने की ओर बढ़ रहा है. एम777 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर, के9 वज्र-टी और धनुष जैसी प्रणालियों के आने से गन फ्लीट बदल रही है.
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एम777 को हेलीकॉप्टर से कठिन इलाके में ले जाया जा सकता है. के9 वज्र-टी ट्रैक्ड और सेल्फ प्रोपेल्ड होने के साथ ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी काम करती है. अगला बड़ा कदम 155 मिमी/52 कैलिबर एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (एटीएजीएस) है. मार्च 2025 में रक्षा मंत्रालय ने एटीएजीएस और 6x6 हाई मोबिलिटी वाहनों के लिए करीब 6900 करोड़ रुपये के अनुबंध किए. यह पुरानी छोटी कैलिबर तोपों की जगह लेगा.
यह बदलाव घरेलू रक्षा उद्योग से भी जुड़ा है. एटीएजीएस अनुबंध निजी क्षेत्र से तोपों की पहली बड़ी खरीद है. भारत फोर्ज गन सिस्टम और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स हाई मोबिलिटी वाहन बनाएंगे. दिसंबर 2024 में लारसन एंड टुब्रो के साथ के9 वज्र-टी के अतिरिक्त सिस्टम के लिए 7628.70 करोड़ रुपये का अनुबंध हुआ. यह सभी इलाकों में गहरी और सटीक फायरपावर बढ़ाएगा.

युद्ध का मैदान बदल रहा है, गनर भी
सबसे बड़ा बदलाव सिर्फ एक तोप की जगह दूसरी तोप लाने का नहीं है. आर्टिलरी अब सेंसर-टू-शूटर नेटवर्क का हिस्सा बन रही है. लक्ष्य का पता लगाना, पहचानना और तेजी से निशाना लगाना उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी तोप की रेंज. सेना सर्विलांस एंड टारगेट एक्विजिशन (साटा) क्षमताओं का विस्तार कर रही है.
रडार, यूएवी, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम और अन्य सेंसर शामिल किए जा रहे हैं. सेना ने 2026 को नेटवर्किंग एंड डेटा सेंट्रिसिटी का वर्ष घोषित किया है. संगठन के अंदर भी बदलाव हो रहे हैं. जुलाई 2025 में सेना ने शक्तिबान आर्टिलरी रेजिमेंट और दिव्यास्त्र बैटरियों की बात कही. लॉइटरिंग म्यूनिशन, ड्रोन, निगरानी और काउंटर-ड्रोन क्षमताओं के साथ पारंपरिक तोपों की परिभाषा बदल रही है.
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दिसंबर 2025 में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने आर्टिलरी रेजिमेंट के लिए लॉइटर म्यूनिशन सिस्टम और पिनाका के लिए लंबी रेंज गाइडेड रॉकेट गोला-बारूद की मंजूरी दी. अगस्त 2026 में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और नीबे के साथ करीब 1577 करोड़ रुपये के अनुबंध हुए.
देखो, तय करो और मारो
पुराने गनर मुख्य रूप से प्रक्षेप पथ की गणना, तोपों की तैनाती और सामूहिक गोलाबारी पर ध्यान देते थे. भविष्य का गनर सेंसर, ड्रोन, डिजिटल संचार, लक्ष्य प्राप्ति, सटीक गोला-बारूद और रियल-टाइम जानकारी के बड़े ढांचे में काम करेगा. सेना यूएएस, लॉइटरिंग म्यूनिशन, काउंटर-यूएएस, प्रेसिजन गाइडेड म्यूनिशन और हल्के रडार का परीक्षण कर रही है. 2026 के गणतंत्र दिवस प्रदर्शन में शक्तिबान और दिव्यास्त्र से जुड़े सिस्टम दिखाए गए.
द्विशताब्दी का यह मौका रेजिमेंट के लिए खास है. इसकी जड़ें उन तोपों में हैं जिन्होंने उपमहाद्वीप के युद्धक्षेत्रों में सैनिकों का साथ दिया. कागिल जैसे युद्धों में सटीक गोलाबारी ने जमीनी अभियानों को मजबूत किया. लेकिन भविष्य उन तकनीकों से आकार ले रहा है जो पारंपरिक तोप के इस्तेमाल से पहले ही लक्ष्य ढूंढ लेती हैं. तोप गायब नहीं हो रही. यह सटीक फायर, निगरानी, रॉकेट, मिसाइल, ड्रोन और डिजिटल कमांड सिस्टम के बड़े नेटवर्क का एक हिस्सा बन रही है.
दो सौ साल बाद भी मूल सिद्धांत वही है- जहां जरूरत हो, वहां फायरपावर पहुंचाओ. बदला सिर्फ इतना है कि लक्ष्य कैसे खोजा जाता है, हमला कैसे किया जाता है, फैसला कितनी तेजी से लिया जाता है और असर कितना सटीक होता है. पहाड़ी तोपों से बोफोर्स, बोफोर्स से 155 मिमी स्वदेशी सिस्टम और अब ड्रोन, सेंसर, रॉकेट और सटीक गोला-बारूद के मिश्रण तक आर्टिलरी रेजिमेंट अपने तीसरे शताब्दी में युद्धक्षेत्र की भूमिका को मूल रूप से फिर से डिफाइन कर रही है.
'सर्वत्र इज्जत-ओ-इकबाल' यानी हर जगह सम्मान और गौरव के आदर्श वाक्य के साथ राष्ट्र के गनर्स को सलाम.