देश में डॉग-बाइट के मामले लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं. खासकर पिटबुल और रॉटविलर जैसी ताकतवर नस्लों के हमलों की खबरें सामने आने के बाद इन कुत्तों को पालने के नियमों पर बहस तेज हो जाती है. हालांकि पूरे देश में इन नस्लों पर एक जैसा राष्ट्रीय प्रतिबंध लागू नहीं है. साल 2024 में केंद्र सरकार ने कुछ खतरनाक नस्लों की बिक्री, प्रजनन और रखने पर रोक लगाने की कोशिश की थी, लेकिन कोर्ट की दखल के बाद यह मामला कानूनी पेंच में फंस गया.
पटियाला में हाल ही में सामने आई पिटबुल अटैक की घटना ने इस बहस को फिर चर्चा में ला दिया है. किराए का घर देखने पहुंचे एक दंपति ने जैसे ही घर की घंटी बजाई, वहां मौजूद पिटबुल बाहर आ गया और दोनों पर हमला कर दिया. उन्हें बचाने की कोशिश की गई, लेकिन कुत्ते के हमले में शरीर के अलग-अलग हिस्सों में गंभीर चोटें आईं. इसके बाद दोनों को इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा.
यह घटना ऐसे वक्त में सामने आई है, जब देश में हर साल बड़ी संख्या में लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं. केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2019 में देश में 72.77 लाख डॉग-बाइट केस दर्ज हुए थे. इसके बाद 2022 में 21.80 लाख और 2023 में अक्टूबर तक 24.77 लाख मामले दर्ज किए गए. इन आंकड़ों के बीच पिटबुल जैसी ताकतवर नस्लों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन्हें पालने और सार्वजनिक जगहों पर ले जाने के लिए कितनी सख्ती होनी चाहिए.
विशेषज्ञों और पशु कल्याण संगठनों का एक वर्ग मानता है कि समस्या सिर्फ किसी खास नस्ल को जिम्मेदार ठहराने से हल नहीं होगी. कुत्ते की ट्रेनिंग, सोशलाइजेशन, व्यवहार और मालिक की जिम्मेदारी भी बेहद अहम है. ताकतवर नस्ल के कुत्ते को पालने वाले व्यक्ति के लिए जरूरी है कि वह उसे सही तरीके से प्रशिक्षित करे और सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा के नियमों का पालन करे. लापरवाही की स्थिति में ऐसी नस्लों की ताकत किसी के लिए गंभीर खतरा बन सकती है.
कहां-कहां पिटबुल पर रोक?
भारत में पिटबुल को लेकर फिलहाल कोई एक समान राष्ट्रीय कानून नहीं है. अलग-अलग राज्य, शहर और नगर निकाय अपने स्तर पर इन नस्लों को लेकर प्रतिबंध या सख्त नियम लागू करते रहे हैं. गाजियाबाद में बढ़ते डॉग-अटैक के मामलों को देखते हुए पिटबुल और कुछ अन्य खतरनाक ब्रीड पर रोक लगाई गई थी. पंचकूला में भी पिटबुल और रॉटवाइलर पर प्रतिबंध से जुड़े स्थानीय नियम लागू किए गए हैं.
इसके अलावा लखनऊ, कानपुर, चंडीगढ़ और झारखंड में भी पिटबुल समेत कुछ आक्रामक नस्लों को लेकर अलग-अलग स्तर पर प्रतिबंध या सख्त नियम बनाए गए हैं. इन स्थानीय फैसलों के पीछे मुख्य वजह सार्वजनिक सुरक्षा और कुत्तों के हमलों की घटनाएं रही हैं. हालांकि अलग-अलग जगहों पर नियम अलग होने के कारण आम लोगों के बीच यह सवाल बना रहता है कि आखिर देश में इन नस्लों को लेकर एक समान नीति क्यों नहीं है.
ये भी पढ़ें- पटियाला में घर देखने पहुंचे कपल पर पिटबुल का हमला, महिला गंभीर रूप से घायल
कोर्ट तक पहुंचा बैन का मामला, फिर क्यों अटका?
मार्च 2024 में केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से पिटबुल समेत करीब 23/24 नस्लों की बिक्री, प्रजनन और रखने पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने को कहा था. इस पहल के बाद देश में खतरनाक मानी जाने वाली नस्लों पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध की उम्मीद जगी थी. लेकिन केंद्र के इस सर्कुलर को कोर्ट में चुनौती दी गई. इसके बाद पूरे मामले की कानूनी स्थिति बदल गई और राष्ट्रीय स्तर पर एक समान बैन की कोशिश आगे नहीं बढ़ सकी.
अप्रैल 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र के सर्कुलर को रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि इस तरह का फैसला लेने से पहले संबंधित पक्षों की आपत्तियों और उनके पक्ष पर विचार किया जाना चाहिए. इसके बाद कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी केंद्र के सर्कुलर को रद्द करते हुए उचित प्रक्रिया और सक्षम समिति की सिफारिश की जरूरत पर जोर दिया. अदालतों के इन फैसलों के बाद पूरे देश में पिटबुल समेत अन्य नस्लों पर एक समान प्रतिबंध लागू करने का मामला फिर अटक गया.
क्या कहते हैं डॉग लवर्स?
पिटबुल जैसी नस्लों पर पूर्ण प्रतिबंध का विरोध करने वाले कई डॉग ओनर्स और एक्टिविस्ट्स का तर्क है कि पूरी नस्ल को खतरनाक बताना सही तरीका नहीं है. उनका कहना है कि असली समस्या गैरकानूनी ब्रीडिंग, कुत्तों को लड़ाई के लिए तैयार करना, गलत ट्रेनिंग और मालिकों की लापरवाही हो सकती है. 2024 में कई डॉग ओनर्स ने केंद्र से भी अपील की थी कि नस्ल पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय अवैध ब्रीडिंग और कुत्तों को जानबूझकर आक्रामक बनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए.
ऐसे में पटियाला की घटना एक बड़ा सवाल छोड़ती है. जब ताकतवर नस्लों को लेकर हमलों का खतरा और नियमों पर लगातार बहस जारी है, तो बिना पर्याप्त ट्रेनिंग, नियंत्रण और जिम्मेदारी के ऐसे कुत्तों को पालने पर नियम कितने सख्त होने चाहिए? पालतू जानवर रखना किसी का शौक हो सकता है, लेकिन पिटबुल जैसी ताकतवर नस्ल को पालना सिर्फ शौक नहीं बल्कि बड़ी जिम्मेदारी भी है. मालिक की लापरवाही से किसी दूसरे व्यक्ति की जान और सुरक्षा खतरे में न पड़े, यह सुनिश्चित करना सबसे जरूरी है.