अमेरिका दुनिया में सबसे शक्तिशाली देश है. अमेरिकी नीतियां पूरी दुनिया को प्रभावित करती हैं. इसी कड़ी में अब अमेरिकी बॉन्ड यील्ड (US Bond Yields) में लगातार उछाल से वैश्विक अर्थव्यवस्था हिलती नजर आ रही है.
दरअसल, जब अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो उसकी धमक भारतीय शेयर बाजार से लेकर भारतीय रुपया तक में सुनाई देती है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि ये बॉन्ड यील्ड का क्या मसला है? भारत जैसे देशों पर कैसे सीधा असर पड़ रहा है?
सरल शब्दों में कहें तो बॉन्ड सरकार द्वारा जनता या निवेशकों से लिया गया एक प्रकार का कर्ज है. जब अमेरिकी सरकार को पैसे की जरूरत होती है, तो वह सरकारी कागज जारी करती है, जिसे 'बॉन्ड' कहा जाता है. इसे मापने के दो पैमाने हैं- कूपन रेट और बॉन्ड यील्ड. कूपन रेट बॉन्ड पर मिलने वाला तय ब्याज है, जबकि बॉन्ड पर मिलने वाला वास्तविक रिटर्न को बॉन्ड यील्ड कहा जाता है.
नियम के मुताबिक बॉन्ड की कीमत और उसकी यील्ड (रिटर्न) हमेशा उल्टी दिशा में चलती हैं. जब बाजार में बॉन्ड की कीमत गिरती है, तो उसकी यील्ड बढ़ जाती है. अमेरिकी बॉन्ड को दुनिया का सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है, क्योंकि इसके पीछे अमेरिकी सरकार की गारंटी होती है. जब इस सुरक्षित जगह पर यील्ड बढ़ती है, तो दुनियाभर का पैसा अपनी जगह छोड़कर अमेरिका की तरफ भागने लगता है.
10 साल, 20 साल और 30 साल के बॉन्ड यील्ड का क्या मतलब?
यील्ड के साथ जुड़ा टेन्योर यह बताता है कि सरकार कितने समय के लिए कर्ज ले रही है.
10-साल की बॉन्ड यील्ड: यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का ग्लोबल बेंचमार्क है. होम लोन, कार लोन और दुनियाभर के कॉर्पोरेट कर्ज की ब्याज दरें इसी 10-साल की यील्ड से तय होती हैं.
20-साल और 30-साल की बॉन्ड यील्ड: ये लंबी अवधि के कर्ज को दर्शाती हैं. इनका इस्तेमाल पेंशन फंड, इंश्योरेंस कंपनियां और बुनियादी ढांचे में दीर्घकालिक निवेश के जोखिम को मापने के लिए किया जाता है. जब 30-साल की यील्ड तेजी से बढ़ती है, तो इसका मतलब है कि निवेशकों को लगता है कि लंबे समय तक महंगाई और ब्याज दरें ऊंची बनी रहेंगी.
इस बीच 1 अक्टूबर 2026 तक अमेरिकी बॉन्ड बाजार में यील्ड्स पिछले दो दशकों के उच्चतम स्तरों के आसपास बनी हुई हैं.
10-साल की यील्ड: 5.30%
20-साल की यील्ड: 5.50%
30-साल की यील्ड: 5.62%
दरअसल, पिछले कुछ महीनों के दौरान अमेरिकी बॉन्ड यील्ड तेजी से बढ़ी है. पिछले 3 महीनों के दौरान यील्ड्स में लगभग 50 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. जबकि बीते एक साल में अमेरिकी बॉन्ड यील्ड्स में 60 से 90 बेसिस पॉइंट्स तक की बड़ी तेजी आई है.
आंकड़ों को देखें तो 10-साल की यील्ड 5.30% तक पहुंच चुकी है. यह स्तर आखिरी बार 2007 और 2002 के दौरान देखा गया था. वहीं 30-साल की यील्ड 5.60% से ऊपर निकलकर 21वीं सदी के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है.
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के कारण
अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें बॉन्ड यील्ड में इजाफे का सबसे बड़ा कारण हैं. अमेरिकी फेडरल रिजर्व महंगाई को काबू में रखने के लिए लंबे समय से ब्याज दरों को उच्च स्तर पर बनाए रखे हुए है. अमेरिकी सरकार पर भारी कर्ज दूसरा बड़ा कारण है, जिससे अमेरिकी बजट घाटा बहुत बढ़ गया है. रिपोर्ट बताती है कि कर्ज चुकाने और खर्च चलाने के लिए सरकार रिकॉर्ड मात्रा में नए बॉन्ड जारी कर रही है. यही नहीं, जब बाजार में बॉन्ड की सप्लाई बहुत ज्यादा होती है और खरीदार कम होते हैं, जिससे बॉन्ड की कीमतें गिर जाती हैं और यील्ड अपने आप बढ़ जाती है.
भारत पर इसका क्या असर?
अमेरिका में यील्ड बढ़ने का सीधा झटका भारत जैसे उभरते बाजारों (Emerging Markets) को लगता है. इसका सबसे बड़ा भारतीय शेयर बाजार पर देखने को मिल रहा है. विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकालकर अमेरिकी बॉन्ड में लगा रहे हैं, क्योंकि वहां बिना किसी जोखिम के बेहतर रिटर्न मिल रहा है. डॉलर की मांग बढ़ने से भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है. फिर रुपया कमजोर होने से भारत का क्रूड ऑयल और अन्य आयात महंगे हो जाते हैं, जिससे घरेलू स्तर पर महंगाई और लोन की EMI बढ़ सकती है.
इस वैश्विक उथल-पुथल से बचने के लिए भारत और अन्य उभरते देशों को मुख्य रूप से तीन रणनीतियों पर काम करना होगा.
पहला- आरबीआई अपने फॉरेक्स रिजर्व का इस्तेमाल करके रुपये में होने वाली अत्यधिक गिरावट को रोक सकता है.
दूसरा- विदेशी फंड्स (FII) की निर्भरता कम करने के लिए घरेलू म्यूचुअल फंड्स और खुदरा निवेशकों को मजबूत करना जरूरी है, जो भारतीय शेयर बाजार को स्थिरता देते हैं.
तीसरा- अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए अन्य देशों के साथ भारतीय रुपये में सीधे व्यापार को बढ़ावा देना होगा.
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का बढ़ना एक वैश्विक वित्तीय लहर की तरह है. लेकिन मजबूत आर्थिक बुनियाद और सतर्क मौद्रिक नीतियों के दम पर भारत इस उथल-पुथल को झेलने की क्षमता रखता है.
भारतीय बॉन्ड यील्ड की क्या स्थिति है?
भारत का बॉन्ड बाजार तुलनात्मक रूप से स्थिर और मजबूत स्थिति में है. 10-साल का भारतीय बेंचमार्क बॉन्ड 7.16% के आसपास कारोबार कर रहा है. 30-साल का भारतीय बॉन्ड 7.65% के स्तर पर बना हुआ है. भारत सरकार और राज्य सरकारें अपनी वित्तीय जरूरतों और बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए नियमित रूप से सरकारी बॉन्ड (G-Secs और SDLs) जारी करती हैं. RBI सरकार के मर्चेंट बैंकर के रूप में इन बॉन्ड की नीलामी का मैनजमेंट संभालता है. बॉन्ड जारी करते समय सरकार उस पर एक निश्चित ब्याज तय करती है.
बॉन्ड यील्ड की वजह से भारतीय शेयर बाजार में भूचाल!
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में आई भारी बढ़ोतरी भारतीय शेयर बाजार में जारी गिरावट के सबसे प्रमुख कारणों में से एक है. जब 10-साल की अमेरिकी बॉन्ड यील्ड उछलकर 5.30% के स्तर पर पहुंच जाती है, तो इसका सीधा झटका भारतीय इक्विटी मार्केट को लगता है.
विदेशी संस्थागत निवेशक जोखिम भरे भारतीय शेयरों से अपना पैसा निकालकर अमेरिकी बॉन्ड बाजार में लगाने लगते हैं. जब उन्हें अमेरिका में बिना किसी रिस्क के 5% से अधिक का सुरक्षित रिटर्न मिल रहा हो, तो वे भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स में रिस्क लेना कम कर देते हैं. अमेरिकी यील्ड बढ़ने से कंपनियों का 'कॉस्ट ऑफ कैपिटल' बढ़ जाता है, जिससे भारतीय शेयर बाजार के हाई वैल्युएशन पर दबाव बनता है.
हालांकि, बॉन्ड यील्ड एक बड़ा ट्रिगर है. लेकिन भारतीय शेयर बाजार की गिरावट केवल इस एक कारण से नहीं है. पश्चिम एशिया में तनाव और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल $100 प्रति बैरल से ऊपर चला गया है. जबकि भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक तेल आयात करता है, जिससे महंगे कच्चे तेल का सीधा असर भारत की महंगाई और कॉर्पोरेट मुनाफे पर पड़ता है.