सेबी ने अपनी 2025-26 की सालाना रिपोर्ट में पीएसयू की स्वैच्छिक डीलिस्टिंग के लिए विशेष फ्रेमवर्क की जानकारी दी है. इसका उद्देश्य डीलिस्टिंग की प्रक्रिया को आसान बनाना और शेयर की कीमत तय करने के पुराने तरीके से पैदा होने वाली दिक्कतों को दूर करना है. ऐसे में छोटे निवेशकों के लिए सबसे अहम सवाल यह होगा कि शेयर बेचने पर उन्हें कितनी कीमत मिलेगी और डीलिस्टिंग के बाद एग्जिट का विकल्प कैसे काम करेगा.
सेबी के नए फ्रेमवर्क के तहत सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ कंपनियों (PSUs) के लिए फिक्स्ड-प्राइस डीलिस्टिंग का रास्ता तैयार किया गया है. कुछ सरकारी कंपनियों की डीलिस्टिंग में छोटे शेयरधारकों को फ्लोर प्राइस से कम से कम 15% ऊपर का एग्जिट ऑफर मिल सकता है.
किन सरकारी कंपनियों पर लागू होगा नियम?
डीलिस्टिंग का मतलब है कि किसी कंपनी के शेयर स्टॉक एक्सचेंज से हटा दिए जाएं. इसके बाद शेयरों की सामान्य तरीके से एक्सचेंज पर खरीद-बिक्री नहीं हो सकेगी. यह फ्रेमवर्क हर सरकारी कंपनी पर लागू नहीं होगा. इसके दायरे में वे पीएसयू आएंगे जो बैंक, एनबीएफसी या बीमा कंपनियां नहीं हैं. साथ ही, भारत सरकार और दूसरे पीएसयू के पास मिलाकर कंपनी के जारी शेयरों का कम से कम 90% हिस्सा होना जरूरी होगा.
नियम बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?
सेबी के मुताबिक, सरकारी कंपनियों को बाजार में सरकार समर्थित और अपेक्षाकृत कम जोखिम वाली इकाइयों के तौर पर देखा जाता है. इसका असर उनके शेयरों की मार्केट प्राइस पर पड़ता है और कई बार शेयर का भाव उसकी बुक वैल्यू से काफी ऊपर चला जाता है. पुराने सिस्टम में फ्लोर प्राइस तय करने के लिए 60 दिनों के वॉल्यूम-वेटेड एवरेज मार्केट प्राइस पर काफी निर्भरता थी. इससे कई मामलों में फ्लोर प्राइस ज्यादा निकलता था. नतीजतन, सरकार या प्रमोटर के लिए सार्वजनिक शेयरधारकों के बाकी शेयर खरीदना महंगा हो जाता था और डीलिस्टिंग प्रक्रिया मुश्किल बनती थी.
अब फ्लोर प्राइस कैसे तय होगा?
नए फ्रेमवर्क में पात्र पीएसयू के लिए फिक्स्ड-प्राइस डीलिस्टिंग का विकल्प दिया गया है. फ्लोर प्राइस तय करने के लिए तीन आधारों पर विचार किया जाएगा.
पहला आधार: पिछले 52 हफ्तों में अधिग्रहणकर्ता की ओर से चुकाई गई या चुकाई जाने वाली वॉल्यूम-वेटेड एवरेज कीमत.
दूसरा आधार: पिछले 26 हफ्तों में किसी अधिग्रहण के लिए चुकाई गई सबसे ऊंची कीमत.
तीसरा आधार: दो स्वतंत्र और रजिस्टर्ड वैल्यूअर्स की संयुक्त वैल्यूएशन रिपोर्ट.
इन तीनों में से जो कीमत सबसे ज्यादा होगी, वही फ्लोर प्राइस मानी जाएगी. इससे केवल शेयर के बाजार भाव पर निर्भरता कम होगी और कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति को भी कीमत तय करने में शामिल किया जाएगा.
फ्लोर प्राइस से 15% ऊपर होगा ऑफर?
इस विशेष फ्रेमवर्क की सबसे अहम बात फिक्स्ड ऑफर प्राइस को लेकर है. पात्र पीएसयू के मामले में ऑफर प्राइस फ्लोर प्राइस से कम से कम 15% अधिक रखना होगा. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर निवेशक को अपनी खरीद कीमत से 15% या उससे ज्यादा मुनाफा मिलेगा. अंतिम फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि निवेशक ने शेयर किस कीमत पर खरीदा था और डीलिस्टिंग में तय ऑफर प्राइस क्या है. इसलिए छोटे शेयरधारकों को डीलिस्टिंग की घोषणा के बाद तीन चीजों पर खास नजर रखनी होगी- फ्लोर प्राइस, फिक्स्ड ऑफर प्राइस और एग्जिट विंडो.
शेयर नहीं बेचने पर क्या होगा?
डीलिस्टिंग के बाद हर शेयरधारक के लिए तुरंत शेयर बेचना जरूरी नहीं होगा. हालांकि, एक साल की अवधि के बाद शेयर एक्सचेंज पर ट्रेडिंग के लिए लिस्टेड नहीं रहेंगे. अगर एक साल की अवधि खत्म होने के 30 दिनों के भीतर पात्र पीएसयू डीलिस्ट हो जाता है, तो बकाया रकम नामित स्टॉक एक्सचेंज के खाते में ट्रांसफर की जाएगी. एक्सचेंज इस रकम को सात साल तक रखेगा, ताकि संबंधित निवेशक अपना दावा कर सकें.
सात साल की अवधि में दावा नहीं किए जाने पर रकम संबंधित कानून के तहत आगे ट्रांसफर की जाएगी. कंपनीज एक्ट, 2013 के तहत आने वाली कंपनियों के मामले में रकम आईईपीएफ में जा सकती है, जबकि अन्य मामलों में लागू नियमों के मुताबिक यह सेबी के इन्वेस्टर प्रोटेक्शन एंड एजुकेशन फंड (IPEF) में ट्रांसफर की जा सकती है.
इसके बाद भी निवेशक निर्धारित प्रक्रिया के तहत नामित स्टॉक एक्सचेंज के पास अपना दावा कर सकते हैं. एक्सचेंज संबंधित फंड से रकम वापस लेकर निवेशक को भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है.
छोटे निवेशकों के लिए क्या मायने?
नए नियम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि पात्र पीएसयू की डीलिस्टिंग में छोटे शेयरधारकों के लिए एक स्पष्ट एग्जिट मैकेनिज्म और न्यूनतम प्राइस प्रीमियम तय किया गया है. लेकिन इसे मुनाफे की गारंटी नहीं माना जा सकता. निवेशकों को यह देखना होगा कि फ्लोर प्राइस कितना तय होता है, फिक्स्ड ऑफर प्राइस क्या है और उन्होंने शेयर किस कीमत पर खरीदा था. आखिरकार डीलिस्टिंग में निवेशक को मिलने वाला वास्तविक फायदा इन्हीं बातों पर निर्भर करेगा.