बिहार की हाई प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बीजेपी को 19 हजार से ज्यादा वोटों से हराया है. बीजेपी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. आठ महीने पहले बांकीपुर सीट पर नितिन नवीन ने 98 हजार यानी 62 फीसदी से अधिक वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी, लेकिन उनके इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट पर बीजेपी के उम्मीदवार नीरज कुमार को 45 हजार वोट पाने में पसीने छूट गए.
बांकीपुर सीट बीजेपी की सबसे मजबूत सीटों में से एक थी. तीन दशक से बीजेपी का कब्जा था. पांच बार नितिन नवीन विधायक रह चुके हैं तो चार बार उनके पिता जीते हैं. इसके बाद भी बीजेपी बांकीपुर सीट पर प्रशांत किशोर से करारी मात खानी पड़ी है.
पटना जिले की बांकीपुर सीट पर 31 राउंड की मतगणना हुई, जिसमें सिर्फ एक राउंड में ही बीजेपी के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को प्रशांत किशोर से ज्यादा वोट मिला. इसके अलावा बाकी के सभी राउंड की गिनती में हार का मूंह देखा पड़ा है. नितिन नवीन की परंपरागत सीट माने जाने वाली बांकीपुर सीट पर बीजेपी को अपने तमाम दिग्गज नेताओं के बूथ पर भी मात खानी पड़ी है.
नितिन नवीन के बूथ पर भी बीजेपी हारी
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन बांकीपुर सीट से अपनी राजनीतिक पारी का आगाज किया था. पांच बार इस सीट से विधायक थे और उनसे पहले उनके पिता नवीन किशोर सिन्हा चार बार विधायक रहे. 1995 के चुनाव से लगातार तीन दशक तक परचम लहराने वाली बीजेपी को उपचुनाव में 45 हजार वोट नहीं मिल सके.
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर को 64151 वोट मिले तो बीजेपी के नीरज कुमार को महज 44827 वोट मिल सके. इस तरह प्रशांत किशोर ने 19324 मतों से जीत हासिल की. नितिन नवीन ने बांकीपुर सीट पर पार्टी उम्मीदवार नीरज कुमार को जिताने के लिए पूरी ताकत लगा थी, उसके बाद भी प्रशांत किशोर की जीत को रोक नहीं सके. इतना ही नहीं नितिन नवीन के बूथ पर भी बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है.
बीजेपी के नितिन नवीन का बचपन पटना के जिस कदमकुआं पीरमुहानी इलाके में बीता है, उस बूथ पर बीजेपी को सिर्फ 88 वोट ही मिल सके और जन सुराज को 152 वोट मिले. इस तरह प्रशांत किशोर को नितिन नवीन के बूथ पर बीजेपी से दोगुना ज्यादा वोट मिला है. उपचुनाव प्रचार खत्म होने से ठीक पहले नितिन नवीन ने इसी कदमकुआं के बरनवाल भवन में मन की बात सुनी थी और जनसंपर्क अभियान चलाया था, उसके बाद ही बीजेपी को अपने बूथ पर नहीं जिता सके.
रविशंकर प्रसाद के बूथ पर भी बीजेपी हारी
बीजेपी के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद पटना साहिब सीट से सांसद हैं. पटना जिले में बांकीपुर विधानसभा सीट आती है. रविशंकर प्रसाद ने बांकीपुर सीट के जिस बूथ पर डाला वोट, वहां पर बीजेपी पिछड़ गई. रविशंकर प्रसाद ने पटना वीमेंस कॉलेज स्थित बूथ संख्या-91 पर मतदान किया. इस बूथ पर बीजेपी प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा को 89 वोट मिले और जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार प्रशांत किशोर को 91 वोट मिले. इस तरह से बीजेपी उम्मीदवार के दो वोट ज्यादा पीके को मिला. रविशंकर प्रसाद के बूथ पर भी बीजेपी उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा है.
रामकृपाल यादव के बूथ पर बीजेपी हारी
बिहार सरकार में मंत्री और बीजेपी के दिग्गज नेता रामकृपाल यादव के बूथ पर भी बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है. रामकृपाल यादव ने बांकीपुर सीट पर जिस बूथ पर वोट डाला, वहां पर बीजेपी को 89 और जन सुराज को 91 वोट मिले. इस तरह रामकृपाल यादव के बूथ पर भी बीजेपी जीत नहीं सकी. बीजेपी के बड़ा सियासी झटका माना जा रहा है.
बीजेपी के दिग्गजों नेताओं के बूथ पर हारी
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में मिली हार बीजेपी के लिए बड़ा झटका है. बीजेपी बिहार की सत्ता में है और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी है. सत्ता में रहते हुए उपचुनाव हारना किसी के झटके से कम नहीं है. बीजेपी की हार में नीरज कुमार सिन्हा की उम्मीदवारी पर भले ही सवाल उठे, लेकिन पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन से लेकर सीएम सम्राट चौधरी, सांसद रविशंकर प्रसाद और मंत्री रामकृपाल यादव पर भी सवाल उठेंगे.
नितिन नवीन और सम्राट चौधरी दोनों के लिए पद ग्रहण करने के बाद यह पहला चुनाव था और वह उसी में हार गए, इसके साथ ही यह बात भी चर्चा में रहेगी कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद भारतीय जनता पार्टी पहले ही चुनावी इम्तिहान में फेल कर गई.
प्रशांत किशोर 2025 के विधानसभा चुनाव में खुद तो उम्मीदवार नहीं बने थे लेकिन उनके सभी उम्मीदवार बुरी तरह पराजित हुए थे और विधानसभा में उनकी पार्टी का खाता भी नहीं खुला था. प्रशांत किशोर ने जब इस सीट पर उपचुनाव लड़ने की घोषणा की तो लोग उन्हें सबसे मज़बूत उम्मीदवार तो मान रहे थे.
हालांकि, इस बात को लेकर शक था कि क्या वह बीजेपी के रणनीति के आगे टिक पाएंगे, फिलहाल इस सवाल का जवाब हां में मिला है. इसकी वजह यह थी कि बीजेपी का उम्मीदवार भले ही कमजोर था लेकिन पार्टी के तौर पर वह सबसे मज़बूत थी और आरएसएस का समर्थन भी उसके साथ रहता ही है. इसके बाद भी बीजेपी जीत नहीं सकी.