नेपाल और तिब्बत की सीमा पर हुई भीषण बाढ़ ने सैकड़ों लोगों की जान ले ली और हजारों को लापता बना दिया. इस त्रासदी ने पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए एक बड़े और बढ़ते खतरे की याद दिलाई है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह आपदा ग्लेशियर के ढहने और उससे बनी झील के फटने से हुई. इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड या संक्षेप में GLOF कहा जाता है.
यह एक अचानक आने वाली बाढ़ होती है जो ग्लेशियल झील के बांध के टूटने से पैदा होती है. क्लाइमेट चेंज के कारण तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और ऐसी झीलें बढ़ रही हैं. पिछले एक सदी में इन बाढ़ों का खतरा छह गुना बढ़ चुका है. दुनिया भर में लगभग 1.5 करोड़ लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां GLOF का सीधा खतरा है.
यह भी पढ़ें: धरती पर 'सूरज' बनाने की रेस में भारत! PRAGYA ने पहली बार बनाया प्लाज्मा
ग्लेशियर लंबे समय से पीछे खिसक रहे हैं लेकिन हाल के दशकों में यह प्रक्रिया बहुत तेज हो गई है. 1950 के बाद से ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं और 1990 के बाद यह सिकुड़न और तेज हो गई. पिछले चार साल रिकॉर्ड किए गए सबसे ज्यादा नुकसान वाले वर्षों में शामिल हैं. 21वीं सदी के पहले 25 वर्षों में ग्लेशियरों के पीछे हटने की दर पिछले 25 वर्षों की तुलना में दोगुनी हो गई है. हिमालय भी इससे अछूता नहीं है.
यह दुनिया के उन क्षेत्रों में से एक है जहां बर्फ का नुकसान सबसे तेजी से हो रहा है. यह बदलाव स्थानीय कारणों से नहीं बल्कि मानव जनित जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान वृद्धि से हो रहा है. ग्लेशियरों का पिघलना जलवायु प्रणाली और ईकोसिस्टम पर कई असर डालता है लेकिन सबसे खतरनाक नतीजा ग्लेशियल झीलों का बढ़ना है.
ग्लेशियल झीलें कैसे बनती हैं और क्यों खतरनाक हैं
ग्लेशियर के पिघलने से पानी जमा होकर झीलें बनाता है. 1990 के दशक से इन झीलों की संख्या और क्षेत्रफल में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. ये झीलें मानव निर्मित मजबूत बांधों से नहीं बल्कि मोरेन नामक बर्फ और तलछट की पहाड़ियों या बर्फ के ब्लॉकों से घिरी होती हैं. ये प्राकृतिक बांध बेहद अस्थिर होते हैं. किसी भी कारण से जैसे ग्लेशियर के हिस्से का गिरना, भूकंप या भारी बारिश से अस्थिर हो सकते हैं.
जब बांध टूटता है तो अचानक विशाल मात्रा में पानी घाटी में उतर आता है और विनाशकारी बाढ़ पैदा करता है. पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ती आबादी के दबाव ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है. लाखों लोग अब उन घाटियों में रहते हैं जहां कभी ये बाढ़ें आ सकती हैं.
यह भी पढ़ें: भारत में नहीं मिलते ओरंगुटान, फिर ओडिशा के जंगल में कैसे पहुंचे 5 बच्चे? 4000 KM दूर है इनका असली घर
2023 में नेचर कम्युनिकेशंस पत्रिका में प्रकाशित पहली वैश्विक जोखिम मानचित्र ने स्पष्ट किया कि सबसे ज्यादा संवेदनशील क्षेत्र मध्य एशिया हैं. चीन, नेपाल, भारत और पाकिस्तान हिमालय और आसपास की पर्वत श्रृंखलाओं को साझा करते हैं. एंडीज पर्वतमाला में पेरू, बोलीविया, चिली और अर्जेंटीना भी जोखिम में हैं. आल्प्स में स्विट्जरलैंड, इटली, फ्रांस और ऑस्ट्रिया शामिल हैं.
उत्तर पश्चिमी उत्तरी अमेरिका, आइसलैंड और स्कैंडिनेविया में भी खतरा है लेकिन वहां संभावित नुकसान अपेक्षाकृत कम है. अनुमान है कि इन क्षेत्रों में करीब 1.5 करोड़ लोग रहते हैं. इनमें से आधे लोग पेरू, भारत, पाकिस्तान और चीन के पर्वतीय इलाकों में केंद्रित हैं.
हिमालय और अन्य ऊंची एशियाई पर्वत श्रृंखलाओं में दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी ग्लेशियर संबंधित जोखिमों के संपर्क में है. एंडीज में भी चुनौती बड़ी है खासकर पेरू में जहां 20वीं सदी में कई दुर्घटनाएं हुईं लेकिन वहां जोखिम कम करने के उपायों पर निवेश किया गया जिससे मौतों की संख्या घटी.
इतिहास में दर्ज हजारों घटनाएं और बढ़ती आवृत्ति
विएना विश्वविद्यालय द्वारा संकलित ऐतिहासिक डेटाबेस के अनुसार साल 850 से 2022 के बीच 27 देशों में 3151 ग्लेशियल झील बाढ़ की घटनाएं दर्ज की गईं. सबसे ज्यादा घटनाएं उत्तरी अमेरिका में 833, मध्य एशिया में 569, आल्प्स में 443 और एंडीज में 337 हुईं. कुछ दूरदराज के क्षेत्रों जैसे एंडीज और हिमालय में उपग्रह छवियों के आने से पहले इन घटनाओं को रिकॉर्ड करना मुश्किल था.
तिब्बत में हुई हालिया घटना में भी अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि कौन सी ग्लेशियल झील फटी. कई घटनाएं निर्जन क्षेत्रों में होती हैं इसलिए जानमाल का नुकसान नहीं होता. फिर भी अध्ययन में पाया गया कि 44 ग्लेशियल बाढ़ों ने कम से कम 3636 लोगों की जान ली. इसमें पिछले चार वर्षों की घटनाएं शामिल नहीं हैं.
यह भी पढ़ें: ग्लेशियर को लगी गर्मी! स्विट्जरलैंड में वैज्ञानिकों ने बर्फ को ओढ़ाया कंबल
सबसे घातक घटनाओं में से एक 1941 में पेरू में हुई जब ग्लेशियर का एक हिस्सा झील में गिरा. इससे उत्पन्न लहर ने प्राकृतिक बांध तोड़ दिया और बाढ़ ने हुआराज शहर को तबाह कर दिया. उस घटना में 1800 से ज्यादा लोग मारे गए. हाल ही में पेरू के राष्ट्रीय संस्थान ने चेतावनी दी है कि एंडीज में कम से कम 58 झीलें बहुत उच्च जोखिम वाली श्रेणी में हैं.
20वीं सदी की शुरुआत से 2010 के दशक तक दर्ज GLOF की वार्षिक औसत संख्या लगभग छह गुना बढ़ गई. सदी के पहले दशक में प्रति वर्ष 7.6 घटनाएं थीं जो 2010 के दशक में बढ़कर 43.7 हो गईं. एक तरफ दुनिया की आबादी बढ़ी है. दूरदराज की घटनाओं के वीडियो उपलब्ध होने की संभावना बढ़ी है.
दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन से तापमान बढ़ रहा है जिससे ग्लेशियरों से ज्यादा बर्फ पिघलकर झीलों में जा रही है. इससे प्राकृतिक बांध अस्थिर हो सकते हैं. बड़े पैमाने पर भूस्खलन या अचानक बाढ़ आ सकती है.
निगरानी और बचाव के उपाय कैसे संभव हैं
भविष्य की आपदाओं को रोकने के लिए निरंतर निगरानी सबसे प्रभावी तरीका है. स्विट्जरलैंड ने पिछले साल ब्लैटन गांव में इसका उदाहरण पेश किया. उन्होंने ग्लेशियर और ढलानों पर सेंसर तथा भूकंपीय उपकरण लगाकर निगरानी की. बड़े पैमाने पर विस्थापन का पता चलते ही गांव को दो दिन पहले खाली करा लिया गया. इसके बाद विशाल बाढ़ आई लेकिन जानमाल का नुकसान नहीं हुआ.
आल्प्स जैसे क्षेत्रों में संसाधन उपलब्ध हैं इसलिए ग्लेशियरों और अस्थिर बर्फ द्रव्यमानों की बारीकी से निगरानी संभव है. लेकिन नेपाल, भारत और पाकिस्तान जैसे विकासशील देशों में चुनौती कहीं ज्यादा बड़ी है. यहां संभावित खतरनाक क्षेत्र अधिक हैं और ढलानें बहुत खड़ी हैं. सभी पहाड़ों की निगरानी करना मुश्किल है.
फिर भी कम से कम संवेदनशील क्षेत्रों और उन घाटियों का मानचित्रण जरूरी है जहां बाढ़ पहुंच सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों की निगरानी आसान नहीं है खासकर विकासशील देशों में लेकिन यह जान बचाती है. उपग्रह तकनीक, स्थानीय सेंसर नेटवर्क और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की जरूरत है.
यह भी पढ़ें: यहां गर्मी से बचने की जगह नहीं... ऊपर सूरज, नीचे 1000°C का भट्ठा और बीच में मजदूर
जोखिम वाले क्षेत्रों में आबादी के विस्तार को नियंत्रित करना और सुरक्षित स्थानों पर बसावट को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण है. जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को धीमा करने के वैश्विक प्रयास के बिना यह खतरा और बढ़ता रहेगा क्योंकि ग्लेशियरों का पिघलना जारी रहेगा और झीलें और बड़ी होती जाएंगी.
नेपाल की हालिया त्रासदी एक चेतावनी है कि पर्वतीय क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कितने घातक हो सकते हैं. ग्लेशियल झीलें अब सिर्फ सुंदर पर्यटन स्थल नहीं बल्कि संभावित आपदा का स्रोत बन गई हैं. हिमालय जैसे क्षेत्रों में जहां करोड़ों लोग रहते हैं वहां जोखिम प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी.
वैज्ञानिक निगरानी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ही भविष्य की आपदाओं को कम किया जा सकता है. अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो ऐसी त्रासदियां और आम हो सकती हैं. ग्लेशियरों की सुरक्षा और पर्वतीय समुदायों की सुरक्षा अब एक दूसरे से जुड़ी हुई चुनौतियां हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
ऋचीक मिश्रा