भारत में नहीं मिलते ओरंगुटान, फिर ओडिशा के जंगल में कैसे पहुंचे 5 बच्चे? 4000 KM दूर है इनका असली घर

पांच ओरंगुटान अचानक ओडिशा के जंगल में मिले. न भारत इनका घर है, न ये इतनी लंबी दूरी खुद तय कर सकते हैं. तो फिर इन पांचों को बालासोर तक कौन लेकर आया? रेस्क्यू के बाद अब सबसे बड़ा सवाल इन्हें बचाने का नहीं, इनके यहां पहुंचने का है.

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ये है बोर्नियो ओरंगुटान, जो भारत नहीं बल्कि सुमात्रा में पाया जाता है. (File Photo: Getty) ये है बोर्नियो ओरंगुटान, जो भारत नहीं बल्कि सुमात्रा में पाया जाता है. (File Photo: Getty)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 09 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 4:25 PM IST

ओडिशा के बालासोर जिले के बिचित्रपुर जंगल में पांच छोटे ओरंगुटान मिलने से वन विभाग भी हैरान है. ये पांचों 8 सितंबर को बदापई गांव के पास जंगल में मिले. लोगों ने इन्हें जंगल में देखा तो वन विभाग को इसकी जानकारी दी. इसके बाद टीम ने सभी पांचों ओरंगुटान को सुरक्षित पकड़ लिया और उनकी जांच की. फिलहाल इन्हें निगरानी में रखा गया है.

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अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि ये पांचों ओरंगुटान बालासोर पहुंचे कैसे? ओरंगुटान भारत के जंगलों में नहीं पाए जाते. इनका घर दक्षिण-पूर्व एशिया के बोर्नियो और सुमात्रा द्वीपों के जंगल हैं. ये जगह बालासोर से करीब 4000 किलोमीटर दूर है. इसलिए यह माना जा रहा है कि ये खुद चलकर यहां नहीं पहुंचे होंगे. 

वन विभाग इस बात की जांच कर रहा है कि इन्हें कहीं बाहर से लाकर जंगल में तो नहीं छोड़ा गया. अवैध तरीके से जानवरों की तस्करी का शक भी देखा जा रहा है, लेकिन अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है.

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ओरंगुटान दुनिया में कहां पाए जाते हैं?

ओरंगुटान अब जंगल में सिर्फ बोर्नियो और सुमात्रा द्वीपों पर पाए जाते हैं. इनकी तीन किस्में हैं- बोर्नियन, सुमात्रन और तपानुली ओरंगुटान. आंकड़ों के मुताबिक जंगल में करीब 1.19 लाख ओरंगुटान बचे हैं. इनमें करीब 1,04,700 बोर्नियन, 13,846 सुमात्रन और 800 से भी कम तपानुली ओरंगुटान हैं. यानी तपानुली ओरंगुटान सबसे कम संख्या में बचे हैं.

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क्या ओरंगुटान विलुप्त हो चुके हैं?

ओरंगुटान अभी खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन इनकी तीनों किस्में खतरे में हैं. इन्हें क्रिटिकली एंडेंजर्ड यानी बहुत ज्यादा खतरे में माना जाता है. इनकी संख्या कम होने की सबसे बड़ी वजह जंगलों का कटना है. खेती और पाम ऑयल के लिए बड़े इलाकों में जंगल काटे जाते हैं. इसके अलावा अवैध शिकार और जानवरों की तस्करी भी इनके लिए खतरा है. जंगल कम होने से ओरंगुटान के रहने और खाने की जगह भी कम होती जा रही है.

जंगल की आग से भी हुआ बड़ा नुकसान

ओरंगुटान के लिए जंगल की आग भी बड़ी परेशानी है. खासकर 1997-98 में इंडोनेशिया में लगी बड़ी जंगल की आग से इन्हें भारी नुकसान हुआ था. एक अनुमान के मुताबिक उस दौरान करीब 8,000 ओरंगुटान मारे गए. बोर्नियन ओरंगुटान की संख्या भी उस दौरान करीब 33 फीसदी तक कम हो गई थी. लेकिन यह आंकड़ा 1997-98 की आग का है. इसे आज की जंगल की आग में ओरंगुटान की मौत का प्रतिशत नहीं माना जा सकता. 

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2026 में भी इंडोनेशिया के कई हिस्सों में जंगल और जमीन में आग लगी. जनवरी से जुलाई के बीच करीब 2.02 लाख हेक्टेयर जमीन जलने की रिपोर्ट आई. आग और धुएं से ओरंगुटान को भी नुकसान पहुंचा और एक ओरंगुटान को आग वाले इलाके से रेस्क्यू किया गया.

फिर बालासोर कैसे पहुंचे ये ओरंगुटान?

ओरंगुटान हजारों किलोमीटर दूर से खुद चलकर या तैरकर भारत नहीं आ सकते. इनका घर बोर्नियो और सुमात्रा के जंगल हैं और ये ज्यादातर पेड़ों पर रहते हैं. ऐसे में बालासोर के जंगल में पांच ओरंगुटान का एक साथ मिलना कई सवाल खड़े करता है.

वन विभाग इस बात की जांच कर रहा है कि क्या इन्हें किसी ने बाहर से भारत लाकर यहां छोड़ दिया. अवैध जानवरों की खरीद-बिक्री और तस्करी का एंगल भी जांच में शामिल है. हालांकि अभी यह साफ नहीं हुआ है कि ये पांचों ओरंगुटान भारत कैसे पहुंचे और इन्हें बालासोर तक कौन लाया.

फिलहाल पांचों ओरंगुटान सुरक्षित हैं और उनकी देखभाल की जा रही है. जांच पूरी होने के बाद ही पता चलेगा कि हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले ये दुर्लभ जानवर आखिर बालासोर के जंगल तक कैसे पहुंचे. रिपोर्टः साक्षी प्रजापति

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