
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे के बीच व्हाइट हाउस के बाहर उनके विरोध में प्रदर्शन हुआ. प्रदर्शनकारियों ने 'फ्री हॉन्ग-कॉन्ग', 'फ्री तिब्बत', 'CCP, आपका यहां स्वागत नहीं है' और 'शी जिनपिंग, आपका यहां स्वागत नहीं' जैसे नारे लगाए. प्रदर्शनकारियों ने राजनीतिक कैदियों और हॉन्ग-कॉन्ग के जेल में बंद मीडिया कारोबारी और लोकतंत्र समर्थक जिमी लाई की रिहाई की भी मांग की.
यह प्रदर्शन तिब्बती, उइगर, हॉन्ग-कॉन्ग, ताइवान, दक्षिणी मंगोलिया और चीनी लोकतंत्र समर्थक संगठनों की तपफ से जिनपिंग के दौरे के दौरान आयोजित कई प्रदर्शनों का हिस्सा था. इन संगठनों ने चीनी दूतावास के बाहर प्रदर्शन, वॉशिंगटन में मार्च, अमेरिकी कैपिटल के बाहर रैली और फ्रैंकलिन पार्क में कैंडललाइट विजिल की योजना बनाई थी.
यह भी पढ़ें: 'अमेरिका-चीन के बीच रेस हो, रेसलिंग नहीं...', व्हाइट हाउस में ट्रंप से बोले राष्ट्रपति जिनपिंग
चीनी दूतावास तक नहीं पहुंच पाए प्रदर्शनकारी
तिब्बती संगठनों ने आरोप लगाया कि सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को चीनी दूतावास के बाहर प्रदर्शन करने के लिए इंटरनेशनल ड्राइव तक पहुंचने से रोक दिया गया. उनका कहना है कि प्रदर्शन के लिए जरूरी परमिट होने के बावजूद भारी सुरक्षा और सड़क पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण उन्हें वैन नेस स्ट्रीट पर रोक दिया गया.

तिब्बतन यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष त्सेरिंग चॉम्पेल ने कहा कि संगठन ने सभी जरूरी परमिट लिए थे और उनकी सभा शांतिपूर्ण थी. उन्होंने कहा कि अमेरिका में तिब्बतियों को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का मौलिक अधिकार है और उन्हें उसी जगह प्रदर्शन करने की अनुमति मिलनी चाहिए, जिसके लिए परमिट लिया गया था.
यह भी पढ़ें: ट्रंप-जिनपिंग की दोस्ती तो दिखी, पर क्या कोई नतीजा निकला? जानें महा-मुलाकात के 5 बड़े Takeaways
चीनी सरकार पर निगरानी का आरोप
इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत ने कहा कि व्हाइट हाउस के बाहर दूसरे समूहों को प्रदर्शन की अनुमति मिली, जबकि चीनी दूतावास के पास तिब्बती प्रदर्शनकारियों पर प्रतिबंध लगाए गए. संगठन के कार्यकारी निदेशक रयान फियोरेसी ने आरोप लगाया कि कुछ चीनी लोग प्रदर्शन कर रहे तिब्बतियों की रिकॉर्डिंग कर रहे थे.

प्रदर्शनकारियों ने 11वें पंचेन लामा और अन्य तिब्बती राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग की. उन्होंने चीनी अधिकारियों और तिब्बती प्रतिनिधियों के बीच बातचीत फिर शुरू करने और तिब्बत की धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को कमजोर करने वाली नीतियों को खत्म करने की भी मांग की.