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जानिए कौन सी हैं वो 12 मुस्लिम जातियां? जो शुभेंदु की OBC आरक्षण लिस्ट में बची रह गईं

पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण को लेकर शुभेंदु अधिकारी के अगुवाई वाली सरकार ने बड़ा बदलाव किया है. सरकार ने ओबीसी की लिस्ट से उन सभी जातियों को बाहर कर दिया है, जिसे 2010 में लेफ्ट की सरकार और 2012 में ममता बनर्जी की सरकार ने शामिल किया था.

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बंगाल की ओबीसी लिस्ट पर शुभेंदु अधिकारी का एक्शन (Photo-ITG)
बंगाल की ओबीसी लिस्ट पर शुभेंदु अधिकारी का एक्शन (Photo-ITG)

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद से शुभेंदु अधिकारी के अगुवाई वाली बीजेपी सरकार तबड़तोड़ फैसले ले रही है. ममता बनर्जी की सरकार में लिए गए फैसले को सीएम शुभेंदु एक के एक पलट रहे हैं. इसी कड़ी में सोमवार को शुभेंदु सरकार ने ओबीसी लिस्ट का पुर्नागठन किया गया और कई जातियों को बाहर कर दिया गया है और साथ ही ओबीसी आरक्षण का कोटा भी 17 फीसदी से घटाकर 7 फीसदी कर दिया है. 

राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग (संशोधन) विधेयक, 2026 और पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को छोड़कर) सरकारी नौकरियों और पदों में आरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2026. इस तरह से पिछड़ा वर्ग आयोग पर लागू 1993 के कानून में विधानसभा के जरिए संशोधन किया गया है. 

ओबीसी श्रेणियों का पुनर्गठन किए जाने से बंगाल में मुस्लिमों की तमाम जातियां अब ओबीसी सूची से बाहर हो गई हैं. संशोधन के बाद अब 66 जातियां ही ओबीसी की लिस्ट में बची हैं, जिनमें 54 हिंदू समुदाय और 12 मुस्लिम समुदाय की जातियां शामिल है. ऐसे में मुस्लिमों की कौन-कौन सी जातियां ओबीसी में रह गई हैं? 

मंडल कमीशन के बाद ओबीसी को आरक्षण 
देश में मंडल कमीशन लागू किए जाने के बाद देशभर में ओबीसी समुदाय की तमाम जातियों को आरक्षण के दायरे में लगाया गया. इस कड़ी में पश्चिम बंगाल में भी ओबीसी जातियों को आरक्षण देने का फैसला तत्कालीन ज्योति बसु के नेतृत्व वाली सरकार ने किया. मंडल आयोग ने बंगाल में कहीं अधिक जातियों की पहचान की थी, लेकिन वाममोर्चा सरकार ने कुछ सीमित जातियों को ही पिछड़ा माना. इसके तहत 66 जातियों को ही ओबीसी की श्रेणी में रखा गया. 

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2010 में तत्कालीन सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वामपंथी सरकार ने राज्य की नौकरियों में ओबीसी के आरक्षण को बढ़ाने का फैसला लिया. इसके साथ ही पश्चिम बंगाल की ओबीसी सूची में कुल 42 नई जातियों को जोड़ा, जिससे  कुल ओबीसी जातियों की संख्या बढ़कर 108 हो गई थी. साथ ही रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए भट्टाचार्य सरकार ने फरवरी 2010 में मुस्लिम समुदाय के पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण की घोषणा की थी. 

बंगाल में ओबीसी सूची को दो श्रेणियों (OBC-A और OBC-B) में विभाजित किया था, ओबीसी के ए-श्रेणी में आने वाली जातियों को 10 फीसदी और ओबीसी की बी-श्रेणी में आने वाली जातियों को 7 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया. ओबीसी की (ए और बी) लिस्ट में शामिल 108 समुदायों में से 53 जातियां मुस्लिम थी.

ममता बनर्जी ने बढ़ाया ओबीसी आरक्षण
गाल में सत्ता बदली और ममता बनर्जी के नेतृत्व में सरकार बनने के एक साल के बाद ओबीसी आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला किया. ममता की अगुवाई वाली सरकार ने 2012 में ओबीसी की लिस्ट में 35 और जातियां को जोड़ने का काम किया गया. तरह लेफ्ट और ममता बनर्जी सरकारों ने मिलकर कुल 77 नई जातियां ओबीसी सूची में शामिल किया था. 

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ममता बनर्जी सरकार ने राज्य की ओबीसी सूची में कुल 113 उप-जातियों (सब-ग्रुप्स) को शामिल किया था, जिनमें से 77 मुस्लिम समुदाय से थीं और 36 हिंदू समुदाय से थीं. इस बड़े बदलाव के बाद पश्चिम बंगाल की कुल ओबीसी सूची ( ए और बी श्रेणी मिलाकर) में मुस्लिम समुदायों का प्रतिनिधित्व लगभग 86 फीसदी से 90 फीसदी तक पहुंच गया था. एक तरह से ओबीसी में मुस्लिम जातियों का दबदबा हो गया था, 

कोर्ट के फैसले पर सरकार का बदलाव
पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण में शामिल मुस्लिम जातियों के प्रतिनिधित्व को लेकर कोर्ट में याचिका लगाई गई. अदालत ने मई 2024 में इस पर फैसला सुनाते हुए ममता बनर्जी और लेफ्ट की सरकार में ओबीसी की सूची में शामिल की गई 77 जातियों की मान्यता को रद्द कर दिया, जो 2010 और 2012 में जोड़ी गई थी. कोर्ट ने इनके शामिल किए जाने को गैर-कानूनी और असंवैधानिक करार दिया था. 

हाईकोर्ट के फैसले से 2010 के बाद जारी किए गए लगभग 12 लाख OBC सर्टिफिकेट रद्द हो गए, लेकिन उन लोगों की नौकरी सुरक्षित रही जिन्होंने पहले ही कोटे के तहत नौकरी पा ली थी. कोर्ट ने आदेश दिया कि 2010 से पहले जारी किए गए सर्टिफिकेट वैध रहेंगे. कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा मई 2024 में दिए गए फैसले ओबीसी सूचियों में शामिल जातियों का हटाने का था.  बंगाल में सत्ता बदलते ही शुभेंदु सरकार ने ओबीसी आरक्षण की सूची से लेकर आरक्षण की लिमिट में बदलाव किया है. 

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विधानसभा में पारित हुए नए संशोधन विधेयकों के तहत पश्चिम बंगाल सरकार ने ओबीसी की सूची और आरक्षण की व्यवस्था में व्यापक बदलाव करते हुए पुरानी मूल सूची (2010 सूची) को बहाल किया है. ओबीसी के 17 फीसदी आरक्षण को खत्म कर 7 फीसदी आरक्षण रख दिया गया है तो साथ ही ममता बनर्जी और लेफ्ट सरकार में शामिल की गई ओबीसी जातियों को बाहर कर दिया गया है.  पहले की तरह से ही 66 जातियां ही ओबीसी की श्रेणी में शामिल रहेंगी. 

ओबीसी में अब कौन-कौन सी मुस्लिम जातियां शामिल
विधानसभा से संशोधन और ओबीसी श्रेणियों का पुनर्गठन किए जाने से बंगाल में मुस्लिमों की तमाम जातियां अब ओबीसी सूची से बाहर हो गई हैं. संशोधन के बाद ओबीसी में 66 जातियां बची हैं, जिसमें 54 हिंदू जातियां और 12 मुस्लिम जातियां है. इस संशोधन और री-ऑर्गनाइजेशन के बाद अब 12 मुस्लिम समुदाय की जातियां ही राज्य की ओबीसी सूची में सुरक्षित बची हैं, जिन्हें पूरी तरह वैध माना गया है. 

बंगाल की ओबीसी लिस्ट में मुस्लिम जातियों में जोला या जुलाहा, जो बुनकर का काम करते हैं. फकीर या साईं, जो सूफी परंपरा से जुड़े हैं और भिक्षा मांगने का काम करते हैं. शाह या शाहजी, जो पारंपरिक तौर पर घूम-घूम कर लोक गायन का काम करते हैं.  राइन या कुंजड़ा,   जो सब्जी बेचने और खेती-किसानी से जुड़े हैं. शेरशाहबादिया, जो मालदा और मुर्शिदाबाद के इलाके में पाए जाते हैं. 

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नई या हज्जाम, जो बाल काटने का काम करते हैं. चौदुली मुस्लिम, पहाड़िया मुस्लिम , धुनिया या मंसूरी ये रजाई भरने और कपड़ा बिनने का काम करते. कसाई या कुरैशी जातियां, जो मांस बेचने और जानवर के कारोबार से जड़े हैं. ये जातियां सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हैं. इन जातियों को 1993 से ओबीसी आरक्षण के दायरे में रखा गया है, जो राज्य के साथ केंद्र की ओबीसी सूची में भी शामिल हैं. 

ओबीसी से बाहर बोने वाली मुस्लिम जातियां
वहीं, पश्चिम बंगाल की ओबीसी सूची से हटाए गए 77 समुदायों में मुस्लिम नेहरिया,मुस्लिम हलदर, मुस्लिम सानपुई, मुस्लिम माली, घोसी (मुस्लिम), मुस्लिम दर्जी, ओस्तागर, इदरीसी, मुस्लिम राजमिस्त्री, मुस्लिम बटियारा, मुस्लिम मोल्ला, धाली (मुस्लिम) और कई अन्य शामिल हैं. 

हालांकि, उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार और मध्य प्रदेश की ओबीसी लिस्ट में मुस्लिमों की ये जातियां ओबीसी की श्रेणी में शामिल हैं. लेफ्ट और ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सरकार ने इन जातियों को ओबीसी में शामिल करने से पहले कोई सर्वे नहीं कराया है, जिसके चलते ही कोर्ट में फैसला फैसला पलटा और अब शुभेंदु सरकार ने उसे पूरी तरह संशोधन कर 2010 से पहले वाली व्यवस्था बना दी है. 

बंगाल में 45 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था
सुभेंदु सरकार के इस संशोधन से पहले पश्चिम बंगाल में आरक्षण अनुसूचित जाति (एससी) के लिए 22 फीसदी, अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 6 फीसदी , ओबीसी-ए श्रेणी के लिए 10 फीसदी, ओबीसी-बी के लिए 7 फीसदी और विकलांग व्यक्तियों के लिए 3 फीसदी आरक्षण. 

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हालांकि,16 जनवरी, 2014 को राज्य द्वारा पारित एक आदेश के अनुसार, कुल आरक्षण को 45 फीसदी तक सीमित कर दिया गया था. ओबीसी के लिए कोटा में संशोधन के बाद कुल आरक्षण में 10 फीसदी की कमी आई है, क्योंकि ओबीसी के 10 फीसदी आरक्षण को खत्म कर दिया है. ये आदेश शुभेंदु के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा मई में जारी किए गए थे और कोर्ट के फैसला पर लिया है. 

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