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ऑनलाइन श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण पर रोक, काशी के पिशाचमोचन तीर्थ पर बड़ा फैसला, जानें क्या बोले महंत

Online Shraddh Ban: काशी के प्रसिद्ध पिशाचमोचन तीर्थ पर ऑनलाइन श्राद्ध और पिंडदान पर रोक. महंत बोले- ऑनलाइन पूजा से नहीं मिलती पितरों को मुक्ति. पढ़ें पूरी खबर...

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पिशाचमोचन कुण्ड पर अब ऑनलाइन पूजा पूरी तरह वर्जित.(Photo:ITG)
पिशाचमोचन कुण्ड पर अब ऑनलाइन पूजा पूरी तरह वर्जित.(Photo:ITG)

आज से पितृपक्ष की शुरुआत हो गई है, लेकिन देश में एक ऐसा महत्वपूर्ण श्राद्ध और पिंडदान का तीर्थ भी है, जहां ऑनलाइन श्राद्ध और पिंडदान को वर्जित कर दिया गया है. आइए जानते हैं कि ऐसा निर्णय क्यों और कहां के लिए लिया गया है.

पिंडदान और श्राद्ध के लिए देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक वाराणसी का पिशाचमोचन तीर्थ भी है और देश का यह एकमात्र विमल तीर्थ भी है. इसको लेकर मान्यता है कि अकाल मृत्यु के शिकार आत्माएं, जो प्रेत योनि में भटकती हैं, उन्हें इसी पिशाचमोचन तीर्थ पर त्रिपिंडी श्राद्ध के बाद मुक्ति मिलती है. यह तीर्थ पृथ्वी पर गंगा के आने से पहले का भी माना जाता है.

इतने महत्वपूर्ण स्थान को लेकर यहां के महंत ने ऑनलाइन श्राद्ध और पिंडदान का पूरा विरोध किया है और अपने पिशाचमोचन तीर्थ पर इसे वर्जित भी कर दिया है. इसके पीछे दावा किया गया है कि ऑनलाइन श्राद्ध और पिंडदान से लाभ नहीं होता है.

धर्म और आध्यात्म की नगरी काशी वैसे तो मोक्ष की नगरी के नाम से जानी जाती है. कहा जाता है कि यहां प्राण त्यागने वाले हर इंसान को भगवान शंकर खुद मोक्ष प्रदान करते हैं. मगर जो लोग काशी से बाहर या काशी में अकाल प्राण त्यागते हैं, उनके मोक्ष की कामना से काशी के पिशाचमोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है, जो पूरी दुनिया में पिशाचमोचन तीर्थ पर ही होता है.

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काशी के अति प्राचीन पिशाचमोचन कुंड पर होने वाले त्रिपिंडी श्राद्ध की मान्यताएं हैं कि पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद होने वाली व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है. इसी लिए पितृपक्ष के दिनों तीर्थस्थली पिशाचमोचन पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है. लेकिन इस बार इस तीर्थ पर ऑनलाइन श्राद्ध और पिंडदान को पूरी तरह से वर्जित कर दिया गया है.

'जैसे ऑनलाइन खाना नहीं खा सकते, वैसे पूजा कैसे?'

वाराणसी के पिशाचमोचन तीर्थ के महंत नीरज पांडेय ने बताया कि पिशाचमोचन पर श्राद्ध, तर्पण, त्रिपिंडी श्राद्ध, पिंडदान और नारायण बलि श्राद्ध का विशेष महत्व है. इसका मतलब होता है कि हम अपने पितरों को भोजन और पानी दे रहे हैं और उनका आह्वान भी कर रहे हैं कि पितृपक्ष के ये 15 दिन हमारे पितृ हमारे साथ रहें और हमें आशीर्वाद दें.

उन्होंने बताया कि उनके इस तीर्थ पर न तो ऑनलाइन श्राद्ध होता है और न ही किसी प्रकार की ऑनलाइन पूजा होती है. जब से ऑनलाइन का चलन बढ़ा है, उनकी ओर से इसका विरोध ही किया गया है. यह तो वैसा ही हो गया कि मैं आपको ऑनलाइन भोजन भेज रहा हूं और उसे आप ऑनलाइन कर लीजिए. जबकि श्राद्ध अपने हाथों से ही किया जाता है.

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महंत ने बताया कि पूरे पिशाचमोचन तीर्थ पर ऑनलाइन श्राद्ध को वर्जित किया गया है, लेकिन कभी-कभी कुछ पुजारी छुपकर ऑनलाइन पूजा करा देते हैं. श्रद्धालुओं को ऑनलाइन श्राद्ध कराने के लिए दबाव बनाना ही नहीं चाहिए, जिसकी वजह से पुजारी भी ऐसा नहीं कर पाएंगे.

श्रद्धालुओं ने भी फैसले का किया समर्थन

पितृपक्ष के अवसर पर पिशाचमोचन तीर्थ पहुंचे श्रद्धालुओं ने भी ऑनलाइन श्राद्ध पर लगाई गई रोक को पूरी तरह न्यायसंगत और उचित ठहराया.

यशपाल सिंह (आजमगढ़): "जो काम इंसान अपने हाथों से धार्मिक विधि-विधान से करता है, उससे ही आत्मिक शांति मिलती है. ऑनलाइन पूजा से कभी मानसिक संतुष्टि नहीं हो सकती."

पवन सिंह (आजमगढ़): "पिंडदान में प्रत्यक्ष उपस्थिति अनिवार्य है. ऑनलाइन माध्यम से श्राद्ध कराना असंतोषजनक और मर्यादा के विपरीत है."

मंगल सिंह (चंदौली): "हमारी सनातन और पुरातन परंपराओं के अनुसार ही पूजन प्रक्रिया चलनी चाहिए. आधुनिकता के नाम पर ऑनलाइन श्राद्ध जैसी प्रथाएं अनुचित हैं."

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