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झांसी में 'मिनी बंगाल' का अहसास: 1861 से चली आ रही बांदव समिति की अनूठी दुर्गा पूजा परंपरा, देखें- PHOTOS

झांसी में बांदव समिति द्वारा 166वीं पारंपरिक बंगाली दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन किया जा रहा है, जिसमें धार्मिक अनुष्ठानों के साथ जल और पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश दिया जा रहा है. इसे देखने के लिए दूर-दराज से लोग आ रहे हैं.

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झांसी में दुर्गा पूजा (PHOTO- ITG)
झांसी में दुर्गा पूजा (PHOTO- ITG)

यूपी के झांसी में बांदव समिति वर्ष 1861 से चली आ रही अपनी समृद्ध परंपरा के तहत षष्ठी से दशमी तक 166वीं बंगाली दुर्गा पूजा आयोजित कर रही है. बंगाली समाज द्वारा पारंपरिक रीति-रिवाजों, चंडी पाठ, आगमनी गान और धुची नृत्य के जरिए मां दुर्गा की आराधना की जा रही है. बुंदेलखंड क्षेत्र के श्रद्धालु इस धार्मिक अनुष्ठान में भाग ले रहे हैं. समिति धार्मिक आस्था निभाने के साथ ही परिसर के कुंड में विसर्जन और विभिन्न पर्यावरण अनुकूल थीम के माध्यम से जल एवं प्रकृति संरक्षण का महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश दे रही है.

1861 से जारी पारंपरिक बंगाली पूजा

बांदव समिति से जुड़े अरिंदम घोष ने बताया कि वर्ष 1861 से यहां बंगाली रीति-रिवाजों से पूजा हो रही है. इस बार 166वीं दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है. पूजा की शुरुआत षष्ठी को सुबह पांच बजे चंडी पाठ और आगमनी गान से होती है. शाम को मां दुर्गा का आह्वान व अधिवासन किया जाता है. सप्तमी, अष्टमी, नवमी को विधि-विधान से पूजन के बाद दशमी को सिंदूर दान कर प्रतिमा विसर्जन किया जाता है.

ढाक की थाप और धुची नृत्य का आकर्षण

आरती के दौरान ढाक की गूंजती थाप पर महिला-पुरुष हाथों में धुची लेकर नृत्य करते हैं, जो भक्तों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है. मधुमिता घोष ने बताया कि धुची नृत्य बंगाली दुर्गा पूजा की खास परंपरा है, जिसके जरिए मां के प्रति समर्पण व्यक्त किया जाता है. इस बार रायपुर से आई कुचिपुड़ी टीम ने भी अपनी प्रस्तुतियां दीं.

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महिषासुर वध की पौराणिक कथा से जुड़ा पर्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महिषासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए देवी-देवताओं ने मां दुर्गा को अपनी शक्तियां और अस्त्र प्रदान किए थे, जिसके बाद उन्होंने महिषासुर का वध किया. मधुमिता घोष के मुताबिक, यह पर्व अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है. षष्ठी से दशमी तक चलने वाले अनुष्ठानों से बंगाली समाज की धार्मिक आस्था स्पष्ट झलकती है.

परिसर के कुंड में होता है प्रतिमा विसर्जन

पर्यावरण संरक्षण के लिए समिति ने 12 वर्ष पहले पंडाल के सामने बने कुंड में क्रेन की मदद से प्रतिमा विसर्जित करने की व्यवस्था शुरू की थी. अरिंदम घोष ने बताया कि इसका उद्देश्य प्राकृतिक जलस्रोतों के प्रदूषण को कम करना है. विसर्जन के बाद मिट्टी और पानी का दोबारा उपयोग करने का प्रयास किया जाता है.

'जल ही जीवन है' और पर्यावरण संरक्षण का संदेश

समिति इस वर्ष ‘जल ही जीवन है’, ‘वॉटर कंजर्वेशन’, ‘गो ग्रीन’ और ‘गो BLUE’ जैसी थीम पर काम कर रही है. मधुमिता घोष ने कहा कि समिति पिछले दस वर्षों से लोगों को जागरूक कर रही है. धार्मिक परंपराओं को निभाने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना भी बहुत जरूरी है.

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