रक्षाबंधन पर कानपुर में एक भावुक कर देने वाली कहानी सामने आई. एक गरीब छात्रा अपनी मां के साथ कानपुर के डीएम को राखी बांधने पहुंची थी. डीएम ने राखी बंधवाई, फिर घर-परिवार के बारे में पूछा. छात्रा के पिता नहीं हैं, मां घरों में बर्तन मांजती हैं. भाई है, लेकिन कोई मदद नहीं करता. इस पर डीएम ने जो किया, वो दिल छू लेने वाला है. उन्होंने स्कूल की छह महीने की फीस भरी, और बच्ची को साइकिल दिलाई. इसी के साथ यह भी कहा कि वे कहीं भी रहें, जब भी जरूरत हो, उन्हें कॉल कर सकती हो.
बच्ची की मां ने कहा कि मेरी बेटी की 6 महीने से फीस नहीं जमा है. घरों में बर्तन धोकर खर्च चलाती हूं. पति की मौत हो चुकी है. राखी के पवित्र बंधन में डीएम जितेंद्र कुमार सिंह को छात्रा में अपनी बेटी याद आ गई. छात्रा कुछ बोल नहीं रही थी, बस इतना ही कहा कि मैं पढ़ना चाहती हूं, पर पैसे से मजबूर हूं. इ्स पर डीएम ने तुरंत स्कूल प्रशासन से बात कर उसकी आधी फीस माफ करवाई, और आधी खुद अपने पास से जमा कर दी.
इसके साथ डीएम साहब ने बच्ची से पूछा कि बेटी, तुम स्कूल कैसे जाती हो, छात्रा ने कहा कि मेरा स्कूल दूर है, किराए के पैसे नहीं होते हैं तो पैदल ही जाती हूं. इस पर डीएम ने अपने पास से पैसे देकर बच्ची को स्कूल जाने के लिए साइकिल भी दिलवाई. डीएम ने बच्ची से कहा कि जब भी कोई जरूरत हो, मैं कहीं भी रहूं, मुझसे बात करके अपनी परेशानी बता सकती हो.

कानपुर के हंसपुरम की रहने वाली ईशू इंटर की छात्रा है. उसके पिता प्रागीलाल यादव की 9 साल पहले मौत हो गई थी. मां ललिता यादव घरों में बर्तन मांजती हैं. ईशू अपनी मां के साथ कानपुर के डीएम जितेंद्र प्रताप सिंह को राखी बांधने पहुंची थी. डीएम ने राखी बंधवाने के बाद उसकी पढ़ाई लिखाई और घर के बारे में पूछा.
इस पर ललिता देवी ने बताया कि पति की 2017 में मौत हो गई थी. मैं घर में बर्तन मांजती हूं. बेटी इंटर कॉलेज में 12वीं की छात्रा है. उसकी कई महीने से फीस नहीं जमा है. स्कूल ने 29000 रुपये फीस की स्लिप भेजी है.
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इस पर डीएम ने तुरंत स्कूल के प्रधानाचार्य से बात की. उसके बाद आधी फीस स्कूल की तरफ से माफ करवाई. वहीं बाकी फीस खुद अपनी जेब से अदा की. बच्ची जब जाने लगी तो उन्होंने पूछा कि स्कूल कितनी दूर है. कैसे जाती हो. इस पर बच्ची ने कहा कि सर इतना पैसा नहीं है कि किराए से जाऊं तो पैदल ही चली जाती हूं. स्कूल दूर है. फिर भी कोई बात नहीं, पढ़ना है तो चली जाऊंगी. मैं पढ़ना चाहती हूं. उसके हौसले को देखकर डीएम ने तुरंत अपनी जेब से पैसे देकर बच्ची के लिए साइकिल मंगवा दी.
जब बच्ची से बात की तो उसने कहा कि मैंने डीएम साहब के बारे में बहुत सुना था कि कोई बच्ची पढ़ना चाहती है तो उसकी सहायता करते हैं. मेरे भाई हैं, लेकिन वह मेरी कोई सहायता नहीं करते. मां की सहायता नहीं करते. ऐसे में सोचा कि चलो हमारे डीएम साहब हैं, उनको ही अपना भाई बना लेते हैं.
डीएम साहब भाई के साथ पिता का फर्ज भी निभा देंगे, इसका एहसास नहीं था. अब मैं उनको कुछ बनकर दिखाऊंगी. उन्होंने मुझसे कहा है कि पढ़ लिखकर मेरे जैसा तुम भी बन सकती हो. डीएम जितेंद्र प्रताप सिंह ने बस इतना कहा कि बच्ची जब मेरे हाथ में राखी बांध रही थी, उसकी परेशानी और मासूमियत देखकर मुझे अपने बच्चे नजर आ गए.