
ऑनलाइन शॉपिंग का कोई पार्सल खोलिए और उसके अंदर बबल रैप न मिले, ऐसा बहुत कम होता है. नाजुक सामान को सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल होने वाली छोटी-छोटी हवा भरी बुलबुलों वाली यह प्लास्टिक शीट आज पैकेजिंग का अहम हिस्सा बन चुकी है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि बबल रैप को मूल रूप से पार्सल या कांच जैसी नाजुक चीजों को सुरक्षित रखने के लिए बनाया ही नहीं गया था?
दरअसल, बबल रैप की शुरुआत एक नए तरह के वॉलपेपर बनाने के आइडिया से हुई थी. हालांकि यह प्रयोग सफल नहीं हुआ. इसके बाद इसे ग्रीनहाउस में इंसुलेशन के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश की गई, लेकिन वहां भी यह ज्यादा कामयाब नहीं हो सका. आखिरकार इसी असफल प्रयोग ने पैकेजिंग की दुनिया को एक ऐसा प्रोडक्ट दिया, जिसका इस्तेमाल आज दुनियाभर में होता है.
पहले वॉलपेपर बनाने की कोशिश हुई
साल 1957 में इंजीनियर अल्फ्रेड डब्ल्यू. फील्डिंग और आविष्कारक मार्क शावान एक नए तरह के वॉल कवरिंग बनाने पर काम कर रहे थे. दोनों ने प्लास्टिक की दो शीट को इस तरह जोड़ा कि उनके बीच हवा फंस गई और पूरी सतह पर छोटे-छोटे उभरे हुए बुलबुले बन गए.
इससे एक अलग तरह की 3डी टेक्सचर वाली शीट तैयार हुई. दोनों को उम्मीद थी कि लोग इसे दीवारों पर वॉलपेपर की तरह इस्तेमाल करेंगे. लेकिन उनका यह आइडिया ज्यादा नहीं चला.
हालांकि, इस असफल प्रयोग से तैयार हुए मटेरियल में कुछ खास खूबियां थीं. यह हल्का था, आसानी से मुड़ सकता था और इसके अंदर हजारों छोटे-छोटे एयर पॉकेट्स थे. ऐसे में दोनों ने सोचना शुरू किया कि इसका इस्तेमाल किसी और काम में किया जा सकता है.
फिर ग्रीनहाउस में इस्तेमाल करने की कोशिश हुई
इसके बाद बबल रैप जैसे इस मटेरियल को ग्रीनहाउस में इंसुलेशन के तौर पर इस्तेमाल करने का विचार आया. प्लास्टिक के अंदर फंसी हवा गर्मी को रोकने में मदद कर सकती थी. यह आइडिया तकनीकी रूप से ठीक था, लेकिन बाजार में इसे खास सफलता नहीं मिली.
दो बार अलग-अलग इस्तेमाल के लिए आजमाए जाने के बावजूद यह मटेरियल किसी बड़ी सफलता का हिस्सा नहीं बन पाया था. लेकिन इसके अंदर फंसी हवा में एक और खासियत थी.
जब इस पर दबाव पड़ता था तो इसके छोटे-छोटे बुलबुले एक कुशन की तरह काम कर सकते थे. यहीं से इसे पैकेजिंग में इस्तेमाल करने का विचार आया.

फिर कंप्यूटर ने बदल दी किस्मत
साल 1960 में फील्डिंग और शावान ने सील्ड एयर कॉरपोरेशन की स्थापना की. बाद में उन्होंने तेजी से बढ़ते कंप्यूटर उद्योग की जरूरतों पर ध्यान दिया.
उस दौर में आईबीएम अपना 1401 कंप्यूटर पेश कर रही थी. इतने बड़े और नाजुक उपकरणों को एक जगह से दूसरी जगह सुरक्षित पहुंचाना एक बड़ी चुनौती थी. उन्हें ट्रांसपोर्ट के दौरान झटकों से बचाने के लिए हल्के लेकिन प्रभावी कुशनिंग मटेरियल की जरूरत थी.
यहीं बबल रैप काम आया. इसके अंदर मौजूद हवा भरे छोटे-छोटे बुलबुले कंप्यूटर को झटकों से बचाने में मदद कर सकते थे. आईबीएम ने अपने 1401 कंप्यूटर की पैकेजिंग के लिए इसका इस्तेमाल शुरू किया और यहीं से बबल रैप को उसकी असली पहचान मिली.
आविष्कार वही रहा, बदल गया उसका काम
बबल रैप की कहानी इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि इसके डिजाइन में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ. वही मटेरियल, जो कभी वॉलपेपर के रूप में असफल रहा था और बाद में ग्रीनहाउस के लिए भी ज्यादा सफल नहीं हो पाया, आखिरकार पैकेजिंग की दुनिया में हिट हो गया.
बस उसका इस्तेमाल बदल गया. दीवार पर लगाने के बजाय जब इसे किसी नाजुक सामान के चारों ओर लपेटा गया तो इसके अंदर की हवा सुरक्षा कवच बन गई.
आज बबल रैप दुनिया भर में नाजुक सामान की पैकिंग के लिए इस्तेमाल होता है. और इसके छोटे-छोटे बुलबुले फोड़ने का मजा तो शायद हर किसी ने कभी न कभी लिया ही होगा.
तो अगली बार जब किसी पार्सल में बबल रैप मिले, तो याद रखिएगा कि इसकी कहानी किसी डिब्बे से नहीं, बल्कि एक दीवार से शुरू हुई थी.