महाराष्ट्र के चंद्रपुर में नामी विश्वविद्यालयों की फर्जी डिग्री, मार्कशीट और माइग्रेशन सर्टिफिकेट तैयार कर लाखों रुपये में बेचने वाले गिरोह के मास्टर माइंड को पुलिस ने नागपुर से गिरफ्तार कर दिया है. दरअसल, फर्जी डिग्री रैकेट का दुर्गापुर पुलिस ने पर्दाफाश किया था. इस मामले में कथित मास्टरमाइंड परिमल गौरकर (32) को उसके नागपुर निवासी कथित साथी अक्षय खोब्रागड़े (30) के साथ गिरफ्तार किया गया है. इस मामले में पुलिस ने अब तक कुल तीन आरोपियों को हिरासत में लिया है.
जांच में सबसे बड़ा खुलासा
जांच में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ है कि दूसरों के लिए फर्जी डिग्रियां तैयार करने वाले परिमल गौरकर की अपनी LLB की डिग्री और मार्कशीट भी फर्जी होने का संदेह है. पुलिस के अनुसार, परिमल ने लगातार चार वर्षों तक LLB की परीक्षा में असफल होने के बाद कथित तौर पर अपनी ही फर्जी डिग्री और मार्कशीट तैयार की. इसके बाद इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर बार काउंसिल की सनद हासिल कर नागपुर हाईकोर्ट में वकालत करने की जानकारी सामने आई है.
हालांकि, पुलिस ने साफ किया है कि उसकी LLB डिग्री और वकालत की सनद से जुड़े तथ्यों की आधिकारिक पुष्टि के लिए संबंधित विश्वविद्यालय, बार काउंसिल और अन्य विभागों से जानकारी जुटाई जा रही है. दुर्गापुर पुलिस ने शुक्रवार सुबह नागपुर के एक होटल में कार्रवाई करते हुए परिमल गौरकर और अक्षय खोब्रागड़े को हिरासत में लिया. पूछताछ के बाद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया.
करोड़ों का ट्रांजैक्शन
इस कार्रवाई के साथ ही फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र रैकेट मामले में गिरफ्तार आरोपियों की संख्या तीन हो गई है. इससे पहले पुलिस ने परिमल के रिश्तेदार और कथित एजेंट वैभव सोनुले को पहले ही गिरफ्तार किया था. आरोपियों के पास से कई सारे बनावटी डिग्रियां और मार्कशीट बरामद की गई साथ ही इस्तेमाल किए जाने वाले लग्जरी कार भी बरामद की गई, पुलिस के मुताबिक आरोपी के अकाउंट में करोड़ों के ट्रांजैक्शन पाए गए हैं.
शिकायत के बाद जांच
बता दें कि चंद्रपुर निवासी वैभव माशीरकर की शिकायत के बाद दुर्गापुर पुलिस ने मामले की जांच शुरू की थी. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि परिमल गौरकर फर्जी डिग्री, मार्कशीट और माइग्रेशन सर्टिफिकेट तैयार कर उनकी बिक्री करता है. ग्राहक ढूंढते थे एजेंट, जरूरत के मुताबिक बनती थी फर्जी डिग्री , पुलिस जांच के मुताबिक, गिरोह में वैभव सोनुले समेत कुछ लोग ग्राहकों की तलाश करते थे. इसके बाद उन्हें परिमल गौरकर के पास पहुंचाया जाता था. ग्राहक को जिस तरह के दस्तावेज की जरूरत होती, उसी के अनुसार फर्जी डिग्री, मार्कशीट या माइग्रेशन सर्टिफिकेट तैयार कर दिया जाता था.
5 से 10 लाख में बेचे जाते थे...
इन फर्जी दस्तावेजों की कीमत कथित तौर पर 5 से 10 लाख रुपये तक वसूली जाती थी. पुलिस को आशंका है कि इन प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल केवल शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए नहीं, बल्कि सरकारी नौकरी हासिल करने और नौकरी में पदोन्नति पाने के लिए भी किया जाता था. पुलिस के अनुसार, परिमल गौरकर पर राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय और गोंडवाना विश्वविद्यालय समेत महाराष्ट्र के कोल्हापुर और सोलापुर तथा राजस्थान और कर्नाटक के विभिन्न विश्वविद्यालयों के नाम से फर्जी डिग्री और मार्कशीट तैयार करने का आरोप है. अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि यह पूरा नेटवर्क कितने समय से सक्रिय था, इसमें कितने लोग शामिल हैं और अब तक कितने लोगों को फर्जी प्रमाणपत्र बेचे गए हैं. फर्जी डिग्री के इस नेटवर्क में और भी बड़े नाम सामने आने की संभावना से जांच तेज कर दी गई है.