Ladakh Thiksey Monastery Festival: कोलकाता और गुजरात के अलावा अगर आप कोई नई जगह एक्सप्लोर करना चाहते है तो लद्दाख की ट्रिप आप प्लान कर सकते हैं. लद्दाख का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों के मन में ऊंचे पहाड़, बर्फ से ढकी चोटियां, खूबसूरत झीलें और बौद्ध मठों की तस्वीर उभरने लगती है. लेकिन यहां की संस्कृति भी उतनी ही खास है, जितने यहां के प्राकृतिक नजारे. अगर आप लद्दाख जाने की प्लानिंग कर रहे हैं तो आप वहां पर 28 और 29 अक्टूबर को होने वाले पारंपरिक त्योहार का मजा ले सकते हैं.
लद्दाख में एक ऐसा पारंपरिक त्योहार मनाया जाता है, जब शांत रहने वाले बौद्ध मठ ढोल-नगाड़ों, लंबे तुरही जैसे वाद्ययंत्रों और रंग-बिरंगे मुखौटों से गूंज उठते हैं. इस त्योहार का नाम है थिकसे गुस्टर, जो लद्दाख के थिकसे मठ में मनाया जाता है. इस उत्सव में बौद्ध भिक्षु खास तरह के मुखौटे पहनकर ट्रेडिशनल डांस करते हैं, जिसे 'छम' कहा जाता है.
थिकसे गुस्टर क्यों है खास?
थिकसे गुस्टर सिर्फ एंटरटेन के लिए नहीं किया जाता है, बल्कि बौद्ध धर्म की मान्यताओं, आध्यात्मिक परंपराओं और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. इस दौरान स्थानीय लोग पारंपरिक कपड़े पहनकर उत्सव देखने पहुंचते हैं, मठ का पूरा परिसर धार्मिक गतिविधियों और सांस्कृतिक रंगों से भर जाता है.
कहां मनाया जाता है थिकसे गुस्टर?
थिकसे गुस्टर को लद्दाख के लेह शहर के पास समुद्र तल से लगभग 3,600 मीटर यानी 11,800 फीट की ऊंचाई पर स्थित थिकसे मठ में होता है. सिंधु घाटी के पास एक पहाड़ी पर बना यह मठ अपनी खास वास्तुकला के लिए जाना जाता है. इसकी सफेद और लाल कलर की बिल्डिंग पहाड़ी की ढलान पर कई लेवलों में बनी हैं. दूर से देखने पर इसकी शेप तिब्बत के फेमस पोताला पैलेस जैसी दिखाई देती है, थिकसे मठ को लद्दाख के प्रमुख बौद्ध मठों में गिना जाता है.
यहां कई मंदिर, प्रार्थना स्थल और बौद्ध धर्म से जुड़े आर्टवर्क देखने को मिलते हैं. मठ का मैत्रेय मंदिर भी खास है, जहां भगवान बुद्ध के भविष्य के स्वरूप माने जाने वाले मैत्रेय बुद्ध की लगभग 49 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित है, जो दो मंजिलों को कवर करती है. आमतौर पर यहां का माहौल शांत रहता है. प्रार्थना चक्रों की आवाज, मक्खन के दीपक और बौद्ध भिक्षुओं के मंत्रोच्चार के बीच श्रद्धालु आध्यात्मिक शांति का एक्सपीरियंस करते हैं. लेकिन गुस्टर त्योहार के दौरान इसी मठ का आंगन एक बड़े सांस्कृतिक आयोजन का केंद्र बन जाता है.
क्या है थिकसे गुस्टर त्योहार की खासियत?
थिकसे गुस्टर तिब्बती बौद्ध परंपरा से जुड़ा एक त्योहार है, इसका आयोजन तिब्बती चंद्र कैलेंडर के 11वें महीने में किया जाता है. यह आमतौर पर दो दिनों तक चलता है. इस त्योहार की सबसे बड़ी खासियत छम डांस है. इसमें बौद्ध भिक्षु बड़े-बड़े और डरावने दिखने वाले मुखौटे पहनकर खास कपड़ों में डांस करते हैं. उनके कपड़ों में लंबे चोगे, चौड़ी आस्तीन, केप और ट्रेडिशनल जूलरी शामिल होते हैं.
कुछ मुखौटे जानवरों के चेहरों जैसे दिखाई देते हैं, जबकि कुछ बौद्ध परंपरा के रक्षक देवताओं और अन्य पौराणिक पात्रों को दर्शाते हैं. नृत्य के दौरान ढोल, झांझ और लंबे सींग जैसे म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बजाए जाते हैं. इनकी गूंज पूरे मठ में सुनाई देती है.
मुखौटों के पीछे छिपा है धार्मिक संदेश
थिकसे गुस्टर में पहने जाने वाले मुखौटे केवल सजावट का हिस्सा नहीं होते. वे बौद्ध धर्म की धार्मिक कथाओं, आध्यात्मिक शक्तियों और धर्म की रक्षा करने वाले पात्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं. इस परंपरा में नकारात्मक शक्तियों पर विजय और अज्ञान से मुक्ति का संदेश दिया जाता है. वज्रयान बौद्ध परंपरा में धर्म के रक्षक देवताओं का विशेष महत्व है. छम नृत्य के दौरान इनसे जुड़ी कथाओं को दिखाया जाता है.
इस उत्सव के आखिरी दिन एक खास अनुष्ठान किया जाता है, जिसमें आटे से बनी आकृति यानी तोर्मा या प्रतीकात्मक पुतले को खत्म किया जाता है. कुछ अनुष्ठानों में इसे जलाया भी जाता है. यह बुराई, नकारात्मकता और अशुभ शक्तियों के अंत का प्रतीक माना जाता है. इस तरह त्योहार लोगों को यह संदेश देता है कि अंत में सत्य, धर्म और अच्छाई की जीत होती है.
स्थानीय संस्कृति को करीब से जानने का मौका
थिकसे गुस्टर केवल धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि लद्दाख की सांस्कृतिक विरासत को करीब से देखने का भी अवसर है. इस दौरान स्थानीय लोग पारंपरिक कपड़ों में मठ पहुंचते हैं. मठ की सीढ़ियों, खुले आंगन और आसपास की जगहों पर लोगों की भीड़ दिखाई देती है. पर्यटक भी इस अनूठे आयोजन को देखने के लिए यहां पहुंचते हैं. त्योहार के आसपास स्थानीय मेलों और खरीदारी की गतिविधियों से भी रौनक बढ़ सकती है. यहां आने वाले पर्यटकों को लद्दाख की परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और सामुदायिक जीवन को समझने का अवसर मिलता है.