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वो सीमेंट, जिसकी दरारें अपने-आप भर जाएंगी, वैज्ञानिकों ने खोज निकाला प्राचीन इमारतों का जादू

प्राचीन स्मारक घूमते हुए आपने भी कभी न कभी सोचा होगा कि कैसे ये सैकड़ों सालों से जस के तस हैं, जबकि आपका नया बना घर एक बारिश में सीलन से भर गया. रोम में पेन्थिऑन 128 ईसवी में बने वे मंदिर हैं, जिनमें हल्की टूटफूट के अलावा वक्त का कोई निशान नहीं. अब जाकर वैज्ञानिकों को पता लग सका कि ये इमारतें सेल्फ-हीलिंग कंक्रीट से बनी हैं.

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नई इमारतों में टूट-फूट की रफ्तार काफी तेज दिख रही है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)
नई इमारतों में टूट-फूट की रफ्तार काफी तेज दिख रही है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

साइंस-फिक्शन में देखा होगा कि किसी के पास ऐसी जादुई ताकत होती है जो जख्म अपने-आप भर जाएं. यही सेल्फ-हीलिंग है, यानी अपने आप ठीक होना. प्राचीन काल में बने स्मारक, महलों में भी इसी सेल्फ-हीलिंग प्रॉपर्टी की मौजूदगी की बात की जा रही है. लेकिन ये कोई जादू नहीं, बल्कि शुद्ध साइंस है, जो सैकड़ों सालों पहले के लोगों ने समझ लिया था. 

रोमन इमारतों पर था फोकस
मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के साथ इटली और स्विटजरलैंड की लैब्स ने मिलकर एक स्टडी की, जिसके तहत सैकड़ों साल पुरानी इमारतों को जांचा गया. इसमें रोम के स्मारतों पर खास फोकस था क्योंकि हिस्ट्री की मानें तो फिलहाल वहीं सबसे पुराने स्ट्रक्चर अब भी खड़े हैं. स्टडी के नतीजे साइंस एडवांसेज जर्नल में इसी साल की शुरुआत में छपे. 

होता था इस तकनीक का उपयोग
अध्ययन के दौरान पता लगा कि प्राचीन रोम के आर्किटेक्स इमारतें बनवाते हुए हॉट मिक्सिंग तकनीक का इस्तेमाल करते थे, जिससे सीमेंट में वो गुण आ जाता कि हल्की दरारें पड़ते ही वो अपने-आप भर जाएं. इससे दरारें फैलकर बढ़ने नहीं पाती थीं. हॉट मिक्सिंग के दौरान इस्तेमाल होने वाला बिल्डिंग मटेरियल सामान्य नहीं, बल्कि उसमें कैल्शियम कार्बोनेट की कई किस्में होती थीं, और ये काफी गर्म तापमान पर मिक्स की जातीं ताकि एक्जोथर्मिक रिएक्शन पैदा हो, यानी अपने-आप गर्मी बने. यही गर्मी सीमेंट में कैद हो जाती और सेल्फ-हीलिंग के गुण लाती. 

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प्राचीन स्मारकों की इस खूबी को जांचने के लिए रिसर्च टीम ने सीमेंट की हॉट-मिक्सिंग की, जिसके बाद उसे जबरन नुकसान पहुंचाया और फिर दरारों में पानी डालकर छोड़ दिया. दो हफ्तों में वे दरारें अपने-आप भर गई थीं और पानी सूखा हुआ था. 

self healing concrete technique for sustainable building
प्राचीन रोमन स्ट्रक्चर आज भी अपनी मजबूती के लिए जाने जाते हैं. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

ज्वालामुखी की राख और चूने का मिश्रण
इससे पहले लंबे समय तक यही सोचा जाता रहा कि पुरानी बिल्डिंग्स में तब के लोग अलग तरह का मटेरियल इस्तेमाल करते रहे होंगे. किसी हद तक ऐसा था भी. खासकर रोम की बात करें तो अपनी सभ्यता-संस्कृति के साथ ही सबसे आधुनिक माने जाते इस एंपायर में इमारतें, सड़कें, नालियां और पुल जैसे स्ट्रक्चर बनाने के लिए वॉल्केनिक मटेरियल, जैसे उसकी राख और चूने का भी इस्तेमाल होता था. राख को चूने के साथ हॉट मिक्सिंग की जाती, साथ में सिरेमिक और रेत भी मिलाते. इस तैयार मटेरियल से आगे का काम होता. 

क्या बैक्टीरिया करेंगे मरम्मत?
ये तो हुई प्राचीन तकनीक, लेकिन अब आधुनिक ढंग की सेल्फ-हीलिंग कंक्रीट बनाने पर भी काम चल निकला है. इसमें इस तरह के बैक्टीरिया होंगे जो इमारत में किसी तरह की टूट-फूट को भरने का काम कर सकेंगे. इसमें सिविल इंजीनियरिंग के साथ-साथ मरीन बायोलॉजी का उपयोग भी होगा, यानी ये समुद्री बैक्टीरिया होंगे, जो आपके फ्लैट या बंगले की जिंदगी बढ़ाएंगे.

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इस तरह होगा काम
नीदरलैंड की डेल्फ्ट यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी इसपर काम शुरू भी कर चुकी. प्रोसेस के दौरान समुद्री बैक्टीरिया की एक खास किस्म बेसिलस स्यूडोफर्मस को सीमेंट के घोल में मिलाया जाएगा. ये बैक्टीरिया लंबे समय तक सुप्तावास्था में पड़े रह सकते हैं. जैसे ही इस कंक्रीट पर नमी आएगी, बैक्टीरिया लाइस्टोन बनाने लगेंगे, जिससे दरारें भरने लगेंगी. 

हालांकि ये प्रोसेस फिलहाल टेस्टिंग की अवस्था में ही है और एक दिक्कत इसकी लागत है. हीलकॉन नाम से इसी तकनीक पर चल रहे प्रोजेक्ट के मुताबिक इससे घरेलू इमारतों का बनना फिलहाल नामुमकिन है, जबकि सार्वजनिक इमारत, या पुल-सुरंग बनाने में इसकी लागत काफी ज्यादा होगी. 

 

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