हिमालय में बाढ़ सिर्फ आसमान से बरसने वाले पानी की कहानी नहीं है. कभी बारिश के साथ ग्लेशियल झील टूट जाती है, तो कभी पहाड़ का बर्फ और चट्टानों वाला हिस्सा अचानक नीचे आ जाता है. जून 2013 में केदारनाथ और उत्तराखंड में ऐसी ही बड़ी तबाही हुई थी. 13 साल बाद, 26 अगस्त 2026 को नेपाल के रसुवा जिले में अचानक आई फ्लैश फ्लड ने एक बार फिर हिमालय के इस खतरे की तरफ ध्यान खींचा है.
नेपाल में 1 सितंबर 2026 तक 987 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि 3916 लोग अभी भी लापता हैं. अब तक 11,814 लोगों को बचाया जा चुका है और करीब 93,000 लोग प्रभावित हुए हैं. बचाव अभियान अभी जारी है, इसलिए ये आंकड़े आगे बदल सकते हैं.
2013 की उत्तराखंड आपदा में करीब 4200 गांव और 9 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हुए थे. करीब 9000 किलोमीटर सड़कें भी प्रभावित हुई थीं. बाद के आकलनों में इस आपदा में 4,000 से ज्यादा लोगों की मौत मानी गई. दोनों घटनाओं में पानी और मलबे ने भारी नुकसान किया, लेकिन बाढ़ शुरू होने की वजह अलग थी.
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2013 में केदारनाथ में क्या हुआ?
जून 2013 में उत्तराखंड में लगातार कई दिनों तक बहुत ज्यादा बारिश हुई. 15 से 17 जून के बीच हुई बारिश ने कई जगह बाढ़ और लैंडस्लाइड की स्थिति पैदा कर दी. पहाड़ों पर जमा बर्फ भी पिघली और पानी का बहाव बढ़ गया.
केदारनाथ के ऊपर चोराबारी ग्लेशियर के पास चोराबारी ताल नाम की झील थी. लगातार बारिश और बर्फ पिघलने से झील में पानी बढ़ गया. झील को रोकने वाली प्राकृतिक मिट्टी और पत्थरों की दीवार कमजोर हुई और टूट गई. इसके बाद झील का पानी तेजी से नीचे आया.

पानी अपने साथ बड़ी मात्रा में पत्थर, मिट्टी और मलबा भी लेकर आया. इससे मंदाकिनी नदी का बहाव अचानक बहुत तेज हो गया और केदारनाथ समेत आसपास के इलाकों में भारी नुकसान हुआ. वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक चोराबारी झील से करीब 6.1 लाख क्यूबिक मीटर पानी बाहर आया था. इस पानी के साथ आया मलबा भी तबाही की बड़ी वजह बना.
केदारनाथ में नुकसान ज्यादा क्यों?
केदारनाथ का इलाका पहाड़ों और संकरी घाटियों से घिरा है. अचानक बड़ी मात्रा में पानी और मलबा आने पर उसे फैलने की ज्यादा जगह नहीं मिली. इससे बहाव और तेज हो गया. लगातार बारिश से पहाड़ों की मिट्टी भी कमजोर हो गई थी. जगह-जगह लैंडस्लाइड हुए और नदियों में मिट्टी और पत्थर पहुंचने लगे. इस तरह भारी बारिश, बर्फ पिघलने, झील टूटने और लैंडस्लाइड ने मिलकर नुकसान बढ़ाया.
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2013 में कितना इलाका प्रभावित हुआ?
2013 की आपदा सिर्फ केदारनाथ तक सीमित नहीं थी. उत्तराखंड के सभी 13 जिले प्रभावित हुए थे. करीब 4,200 गांव और 9 लाख से ज्यादा लोग इसकी चपेट में आए. करीब 3,320 घर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हुए और लगभग 995 सार्वजनिक इमारतों को नुकसान पहुंचा.
करीब 9,000 किलोमीटर सड़कें भी प्रभावित हुईं. 2013 में सेना, वायुसेना, ITBP और NDRF समेत कई एजेंसियों ने बड़ा बचाव अभियान चलाया. 1 लाख से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला गया.
2026 में नेपाल में क्या हुआ?
26 अगस्त 2026 को नेपाल के रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी के इलाके में अचानक तेज बाढ़ आई. इसका असर नदी के रास्ते नीचे के कई इलाकों तक पहुंचा. रसुवा के अलावा नुवाकोट, धादिंग और दूसरे जिलों में भी नुकसान हुआ.

बाढ़ में सड़कें और पुल टूटे. कई घरों और इमारतों को नुकसान पहुंचा. हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट भी प्रभावित हुए. कई लोगों के सुरंगों में फंसे होने या लापता होने की आशंका है. 1 सितंबर तक नेपाल में 987 मौतें, 3,916 लोग लापता और 11,814 लोगों के रेस्क्यू की जानकारी सामने आई है. करीब 93,000 लोग प्रभावित हुए हैं.
नेपाल में बाढ़ की वजह क्या थी?
नेपाल की घटना को सिर्फ बारिश से आई सामान्य बाढ़ की कहनी नहीं है. शुरुआती वैज्ञानिक जांच में ऊंचाई वाले इलाके से बर्फ और चट्टान के बड़े हिस्से के अचानक टूटकर नीचे आने की बात सामने आई है.
बर्फ और चट्टानों का यह बड़ा हिस्सा तेजी से नीचे आया और नदी के बहाव को प्रभावित किया. इसके बाद पानी, पत्थर, बर्फ और मिट्टी का तेज बहाव नीचे की तरफ गया. इसी वजह से नदी के आसपास के इलाकों में अचानक बाढ़ जैसी स्थिति बनी.
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वैज्ञानिकों के मुताबिक यह हिस्सा करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से आया और करीब 22 किलोमीटर की दूरी सात मिनट से कुछ ज्यादा समय में तय की. यानी इसकी औसत रफ्तार करीब 167 किलोमीटर प्रति घंटा थी.
क्या नेपाल में ग्लेशियल झील फटी थी?
शुरुआती रिपोर्टों में नेपाल की घटना को ग्लेशियल झील टूटने से भी जोड़ा गया था. लेकिन अभी तक की वैज्ञानिक जांच में बर्फ और चट्टान के अचानक टूटने और उसके बाद आए तेज मलबे वाले बहाव की भूमिका ज्यादा सामने आई है. वैज्ञानिक अभी इस घटना के पूरे क्रम की जांच कर रहे हैं.

दोनों आपदाओं में क्या फर्क था?
2013 में भारी बारिश से हालात बिगड़े और चोराबारी झील टूटने के बाद पानी और मलबा नीचे आया. इसके बाद मंदाकिनी नदी में बहाव बढ़ा और केदारनाथ में तबाही हुई. 2026 में शुरुआती जांच के मुताबिक बर्फ और चट्टान का बड़ा हिस्सा अचानक नीचे आया. इससे नदी का बहाव प्रभावित हुआ और पानी के साथ बड़ी मात्रा में मलबा नीचे की ओर गया. यानी दोनों जगह पानी और मलबे ने नुकसान बढ़ाया, लेकिन आपदा शुरू होने की वजह अलग थी.
क्या क्लाइमेट चेंज भी इसकी वजह है?
हिमालय में तापमान बढ़ रहा है. इससे ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और कुछ ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ और जमीन की स्थिरता भी प्रभावित हो सकती है. ऐसे बदलाव भविष्य में ग्लेशियर, बर्फ और चट्टानों से जुड़ी अचानक होने वाली घटनाओं का खतरा बढ़ा सकते हैं.
2013 केदारनाथ और 2026 नेपाल की घटनाएं बताती हैं कि हिमालय में बाढ़ का खतरा सिर्फ तेज बारिश तक सीमित नहीं है. ग्लेशियल झील, बर्फ, चट्टान, लैंडस्लाइड और नदी का अचानक बढ़ता बहाव भी बड़ी तबाही ला सकता है. इसलिए पहाड़ों में मौसम के साथ ग्लेशियर और पहाड़ी ढलानों की निगरानी, बेहतर वॉर्निंग सिस्टम और तेज रेस्क्यू व्यवस्था जरूरी है. रिपोर्टः साक्षी प्रजापति