शारदीय नवरात्र में आस्था और भक्ति का अनोखा संगम बिहार के खगड़िया में देखने को मिल रहा है. यहां एक भक्त ने अपनी छाती को ही माता का दरबार बना लिया है. आदावरी गांव के नीरज कुमार ने शारदीय नवरात्र के पहले ही दिन अपनी छाती पर कलश स्थापित कर लिया था और माता दुर्गा की ये दुर्लभ आराधना अब तक जारी है. नीरज बिना अन्न ग्रहण किए पूरे नवरात्र इसी अवस्था में देवी की उपासना करेंगे और विजयादशमी के बाद ही कलश का विसर्जन करेंगे.
नीरज का कहना है कि माता रानी ने उनकी हर मन्नत पूरी की है. इसलिए उन्होंने पांच वर्षों तक हर शारदीय नवरात्र पर छाती पर कलश स्थापित करने का संकल्प लिया है. इस अद्भुत भक्ति को देखने के लिए गांव के मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है. यहां नीरज की आस्था को देखकर हर कोई हैरान हो रहा है.
बता दें कि नीरज ने लेटकर अपनी छाती पर लकड़ी की एक चौकी रखी है. उस पर एक कपड़ा बिछाया है. फिर एक थाल रखकर उस पर मिट्टी का कलश स्थापित किया है. कलश को चारों तरफ से फूल माला से ढका गया है. ऊपर आम या अशोक के पत्ते दिखाई दे रहे हैं. फिर चुनरी में एक नारियल को लपेटकर कलश के मुख पर रखा गया है. नीरज के बगल में एक और चौकी लगी है, जिस पर लाल वस्त्र बिछा हुआ है. इस पर कुछ फल, धूप, दीप और कुछ पूजन सामग्री दिखाई दे रही है.
नवरात्र में कलश स्थापना क्यों होती है?
हिंदू धर्म में कलश स्थापना का विशेष महत्व बताया गया है. कलश स्थापित करने की परंपरा सिर्फ नवरात्र में नहीं है. हिंदू धर्म में प्रत्येक शुभ कार्य से पहले कलश स्थापना की जाती है. इसे घटस्थापना भी कहा जाता है. शुभ कार्यों से पहले देवी-देवताओं के आह्वान से पहले कलश स्थापित किया जाता है. कुछ मान्यताओं के अनुसार, कलश को भगवान गणेश का स्वरूप भी माना जाता है और शुभ काज में गणपति जी को प्रथम पूजनीय माना गया है. गणपति जी का एक नाम विघ्नहर्ता भी है. इसलिए शुभ कार्यों को बाधाओं, समस्याओं से मुक्त रखने के लिए सबसे पहले गणेश जी की पूजा होती है.
चैत्र या शारदीय नवरात्र की शुरुआत प्रतिपदा तिथि पर घटस्थापना यानी कलश स्थापना के साथ होती है. नवरात्र के पहले दिन लोग व्रत का संकल्प लेकर देवी की चौकी के पास एक कलश स्थापित करते हैं. फिर पूरे 9 दिन तक देवी की विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं. इसके बाद अष्टमी-नवमी तिथि पर कन्या पूजन के बाद दशमी तिथि पर इसका पारण कर दिया जाता है. यदि घटस्थापना में मिट्टी के कलश का इस्तेमाल किया गया है तो उसे पवित्र-नदी तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है. जबकि धातु के कलश को लोग दैनिक पूजा-पाठ आदि में इस्तेमाल कर लेते हैं.