पितृपक्ष में पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है. मान्यता है कि इस अवधि में पितरों का श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है. पितृपक्ष में महिलाओं के श्राद्ध को लेकर भी अलग तिथि बताई गई है. ज्योतिषविद प्रवीण मिश्र के अनुसार, पति के जीवित रहते जिन महिलाओं की मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध मातृ नवमी पर किया जाता है. इस साल मातृ नवमी का श्राद्ध 4 अक्टूबर को किया जाएगा.
घर की दिवंगत महिलाओं के श्राद्ध को लेकर अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि पितृपक्ष में उनका श्राद्ध कब और कैसे किया जाता है. शास्त्रों के अनुसार, पितृपक्ष में नवमी तिथि पर घर की दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध करने की परंपरा है. इस दिन परिवार की दिवंगत माता, दादी, नानी और अन्य पूर्वज महिलाओं के निमित्त श्राद्ध किया जा सकता है. उनका पिंडदान व तर्पण कर आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है.
कुंवारी कन्याओं का श्राद्ध कब?
कुंवारी कन्याओं के श्राद्ध को लेकर भी अलग व्यवस्था बताई गई है. ज्योतिषविद के अनुसार, जिन अविवाहित कन्याओं की मृत्यु हो गई है, उनका श्राद्ध पंचमी तिथि पर करने की परंपरा है. यानी कुंवारी और शादीशुदा दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध अलग-अलग तिथि पर किया जाता है. इस बार पंचमी तिथि का श्राद्ध 30 सितंबर को किया जा चुका है.
तर्पण और पिंडदान का महत्व
श्राद्ध कर्म में तर्पण और पिंडदान को महत्वपूर्ण माना जाता है. तर्पण में पितरों को काले तिल वाला जल अर्पित किया जाता है. जबकि पिंडदान में चावल या जौ के आटे से बने पिंड बनाकर पितरों को अर्पित करने की परंपरा है. श्राद्ध के दौरान गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए भोजन का हिस्सा निकालने की भी परंपरा बताई गई है. इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने और सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा देने का विधान बताया जाता है.
श्राद्ध में अन्नदान से मिलेगा पुण्य
पितृपक्ष में अन्नदान का भी विशेष महत्व बताया गया है. जिस दिन श्राद्ध किया जाए, उस दिन अपनी क्षमता के अनुसार चावल, दाल, आटा, नमक, तेल और मसालों जैसी उपयोगी वस्तुओं का दान किया जा सकता है. इस दिन खाने की सामग्री का दान करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है.