पितृपक्ष में पूर्वजों के श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विधान बताया गया है. मान्यता है कि इस अवधि में पितरों का श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है. इस साल पितृपक्ष में 30 सितंबर की तारीख खास रहने वाली है. इस दिन चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एकसाथ किया जाएगा. आइए जानते हैं की चतुर्थी और पंचमी तिथि के श्राद्ध का महत्व क्या है और ये दोनों श्राद्ध एक ही तिथि पर क्यों किए जा रहे हैं.
हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार चतुर्थी तिथि 29 सितंबर की शाम 05.09 बजे से शुरू होकर 30 सितंबर को दोपहर 02.55 बजे तक रहेगी. इसके बाद पंचमी तिथि शुरू हो जाएगी. पंचमी तिथि 1 अक्टूबर को दोपहर 12.35 बजे तक रहेगी. शास्त्रों की जानकारों की मानें तो चूंकि श्राद्ध कर्म के लिए दोपहर का अपराह्न काल महत्वपूर्ण माना जाता है. इसलिए दोनों तिथियों का श्राद्ध 30 सितंबर दिन बुधवार को ही मान्य है.
चतुर्थी श्राद्ध का समय
शास्त्रों के अनुसार, पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण के कार्यों के लिए कुतुप काल को सबसे श्रेष्ठ और पवित्र समय माना गया है. 30 सितंबर को कुतुप वेला सुबह 11 बजकर 47 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगा. हालांकि यह समय देश के अलग-अलग शहरों में थोड़ा अलग हो सकता है. इसलिए पहले पंचांग जरूर देख लें.
30 सितंबर को किन लोगों का श्राद्ध होगा?
30 सितंबर पर चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एकसाथ किया जाएगा. चतुर्थी तिथि का श्राद्ध उन पितरों की आत्मा की शांति के लिए किया जाता है जिनका निधन किसी भी महीने के कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ हो. इसके अलावा, पंचमी तिथि पर अविवाहित मृतकों का श्राद्ध किया जाता है. इसलिए इसे कुंवारा पंचमी भी कहते हैं. इसके अलावा, जिन लोगों का निधन किसी भी महीने के कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होता है, उनका श्राद्ध भी इसी दिन किया जाता है.
चतुर्थी-पंचमी के श्राद्ध की विधि
पितृपक्ष की चतुर्थी-पंचमी तिथि पर पितरों के निमित्त पिंडदान और तर्पण करने की परंपरा है. श्राद्ध के लिए आटा, चावल या जौ, शहद, घी और काले तिल से पिंड तैयार किए जाते हैं. इसके बाद श्रद्धापूर्वक इन पिंडों को पितरों को अर्पित किया जाता है. पिंडदान के बाद जल में काले तिल मिलाकर पितरों का तर्पण किया जाता है. इस दौरान कुश से एक अंगूठी बनाकर दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में धारण करने की परंपरा है.
श्राद्ध कर्म पूरा होने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान-दक्षिणा की परंपरा है. पितृपक्ष के श्राद्ध कर्म में पंचबलि की भी परंपरा बताई गई है. इसमें तैयार भोजन का एक हिस्सा गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों समेत जीवों के लिए अलग निकाला जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इनके माध्यम से भोजन पितरों तक पहुंचता है. अंत में पितरों की आत्मिक शांति और उनका आशीर्वाद पाने के लिए प्रार्थना की जाती है.