महाराष्ट्र के अकोला में करीब 80 साल पुरानी कांवड़ यात्रा की परंपरा आज भी उसी भव्यता के साथ जारी है. अकोला से करीब 20 किलोमीटर दूर गांधीग्राम की पूर्णा नदी से पवित्र जल लाकर राजराजेश्वर महाराज के शिवलिंग पर अर्पित किया जाता है. इसी परंपरा के तहत 1100 कलशियों वाली देश की सबसे बड़ी कांवड़ को गांधीग्राम के लिए रवाना किया गया. करीब ढाई से तीन टन वजन की इस विशाल डाबकी रोड वासियों की कांवड़ को दो से ढाई हजार कांवड़िए मिलकर उठाएंगे. ढोल-ताशे, बैंड और डीजे की धुन पर निकली इस कांवड़ यात्रा में श्रद्धालुओं का जोश देखते ही बन रहा है.
इस 1100 कलशी कांवड़ की टोली के अध्यक्ष अतुल येडने ने कहा, 'हमारी यह अकोला की सबसे बड़ी 1100 कलशियों वाली कांवड़ है. करीब 80 वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है. हर साल हम पूर्णा नदी से पवित्र जल लेकर राज राजेश्वर महाराज को अर्पित करते हैं. इस साल बारिश कम होने के कारण किसान और आम लोग चिंतित हैं. हम भोले बाबा से प्रार्थना करेंगे कि जल्द से जल्द अच्छी बारिश हो और सभी के जीवन में सुख-समृद्धि आए.'
80 साल पुरानी परंपरा
हर साल श्रावण के अंतिम सोमवार पर यहां 150 से ज्यादा छोटी-बड़ी कांवड़ और करीब 200 पालखियां इस धार्मिक उत्सव का हिस्सा बनती हैं. मराठी कैलेंडर में सावन का आखिरी सोमवार हिंदू कैंलेंडर के आखिरी सोमवार के ठीक एक सप्ताह बाद आता है. यानी महाराष्ट्र में श्रावण मास का अंतिम सोमवार 7 सितंबर 2026 को है. इस विशाल कांवड़ यात्रा को देखने यहां महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और उत्तर प्रदेश सहित देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु इस महोत्सव में शामिल होने पहुंचते हैं.
अकोला की ये भव्य कांवड़ यात्रा अब गांधीग्राम की ओर रवाना हो चुकी है. रातभर चलने के बाद सोमवार सुबह राजराजेश्वर महाराज के मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाएगा. आस्था के इस महासंगम में हजारों श्रद्धालु शामिल होंगे और भोलेनाथ से अच्छी बारिश और किसानों के लिए खुशहाली की प्रार्थना करेंगे.