अयोध्या में रामलला के दरबार को अब किसी आम प्रशासनिक ढर्रे की नहीं, बल्कि फौजी अनुशासन की दरकार थी. इसी सोच के साथ श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र को अपना पहला सीईओ बनाकर 'ऑपरेशन अयोध्या' का शंखनाद किया है. पिछले दिनों चढ़ावा चोरी के दाग से मंदिर की साख पर जो उंगलियां उठी थीं, उस खोए भरोसे को वापस जीतना उनकी पहली प्राथमिकता है.
उम्मीद की जा सकती है कि मंदिर परिसर में सेना जैसा सख्त 'कमांड स्ट्रक्चर', पारदर्शी डिजिटल ऑडिट और एक ऐसा कड़ा फौजी सिस्टम लागू होगा, जहां गबन या ढिलाई की कोई गुंजाइश न बचे. सबसे बड़ी बात यह है कि एक फौजी कमांडर के हाथों में कमान आने से राम मंदिर अब रोजाना की राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप के चक्रव्यूह से मुक्त हो सकेगा.
अयोध्या में भव्य रामलला मंदिर बनने के साथ आस्था का समंदर उमड़ा था. तभी मान लिया गया था कि इतने बड़े मंदिर का प्रबंधन और सुरक्षा किसी विशाल साम्राज्य को संभालने से कम नहीं होगी. लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं का हुजूम, रोजाना आने वाला भारी चढ़ावा और दुनिया भर की निगाहें. फिर एक चूक हुई. मंदिर परिसर में चढ़ावा चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों ने जोर पकड़ा, तो करोड़ों रामभक्तों के मन में एक टीस पैदा हुई. आस्था के इस सबसे बड़े केंद्र पर उठे सवालों ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अब मंदिर का प्रबंधन किसी ढीले-ढाले या पारंपरिक तरीके से नहीं चलाया जा सकता. मंदिर को एक ऐसी व्यवस्था की दरकार थी, जहां न अनियमितता की गुंजाइश हो और न ही अनुशासन में कोई चूक.
एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र ही क्यों बने पहली पसंद?
राम मंदिर ट्रस्ट जब अपने पहले सीईओ की तलाश कर रहा था, तो उसकी शर्तें बेहद साफ थीं. उम्मीदवार के पास 20 साल से ज्यादा का बड़ा प्रशासनिक अनुभव हो, वह सनातनी आचरण वाला रामभक्त हो और उम्र 50 से 70 साल के बीच हो. ये तमाम कागजी योग्यताएं तो कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों और नौकरशाहों के पास भी थीं, लेकिन जब बात ईमानदारी, पेशेवर कड़े अनुशासन और निस्वार्थ निष्ठा की आई, तो पलड़ा सेना के पक्ष में झुक गया.
दरअसल, निष्कलंक ईमानदारी और उच्च स्तर के प्रोफेशनलिज्म का अद्भुत कॉम्बिनेशन भारतीय सेना में देखने को मिलता है, वैसा नागरिक प्रशासन में मिलना बेहद मुश्किल है. सेना का अफसर किसी राजनीतिक दबाव, पैरवी या निजी फायदे के आगे नहीं झुकता.
इसके साथ ही, एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र के पक्ष में कई और मजबूत पहलू भी जुड़े. वे अयोध्या के पास स्थित देवरिया जिले के मूल निवासी हैं, जिससे स्थानीय भाषा, संस्कृति और सरयू पार के भूगोल से उनका पुराना जुड़ाव है. वे एक सम्मानित ब्राह्मण परिवार से आते हैं, जिससे धार्मिक परंपराओं, कर्मकांडों और सनातन मर्यादाओं की समझ उनके भीतर स्वाभाविक रूप से मौजूद है.
पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में भारतीय सेनाओं के ऑपरेशन सिंदूर में उन्होंने वायुसेना के वेस्टर्न कमांड का नेतृत्व किया, जिसमें उनके लड़ाकू विमानों ने बहावलपुर और मुरीदके जैसे आतंकी ठिकानों को जमींदोज ही नहीं किया, बल्कि पाकिस्तान के 300 किमी भीतर S-400 एयर डिफेंस सिस्टम से पाकिस्तानी विमान को मार गिराने का रिकॉर्ड भी बनाया.
जब इन सभी पहलुओं को एक जगह मिलाया गया, तो ट्रस्ट के सामने तमाम विकल्पों के बीच एयर मार्शल मिश्र का नाम सबसे ऊपर चमकने लगा. माना गया कि वे एक ऐसे शख्स हैं, जिनके पास मंदिर की साख को वापस पुरानी बुलंदियों पर ले जाने का साहस और दृष्टि दोनों है.
सेना के मैनेजमेंट से कैसे बदलेगा राम मंदिर का मैनेजमेंट?
सैन्य प्रबंधन की सबसे बड़ी ताकत होती है स्पष्टता, त्वरित फैसले और जीरो करप्शन. एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र के आने के बाद राम मंदिर के भीतर कई बुनियादी और बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं.
सख्त कमांड स्ट्रक्चर और स्पष्ट जवाबदेही : नागरिक संस्थाओं में अक्सर यह पता नहीं चलता कि किसी चूक के लिए असली जिम्मेदार कौन है. लेकिन सेना के कमांड स्ट्रक्चर में हर व्यक्ति की भूमिका तय होती है. मंदिर मैनेजमेंट में सुरक्षा, साफ-सफाई, पुजारी वर्ग, आईटी सेल और अकाउंट्स विभाग के प्रमुखों की स्पष्ट जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. ताकि कोई भी कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर न डाल सके. और हर किसी की सीधे सीईओ की पारदर्शी रिपोर्टिंग हो.
वित्तीय पारदर्शिता और डिजिटल ऑडिट : चढ़ावा चोरी प्रकरण के बाद ट्रस्ट की सबसे बड़ी प्राथमिकता वित्तीय गबन को पूरी तरह रोकना है. एयर मार्शल मिश्र सेना के स्टॉक एवं फंड मैनेजमेंट मॉडल को यहां लागू कर सकते हैं. पहले ही सुझाव दिया जा चुका है कि दानपेटियों को खोलने से लेकर चढ़ावे की गिनती तक की पूरी प्रक्रिया हाई-रिजॉल्यूशन कैमरों और बायोमेट्रिक निगरानी में हो. ताकि हर छोटे-बड़े दान का रिकॉर्ड तुरंत डिजिटल सिस्टम में दर्ज हो सके. और रोजाना का रीयल-टाइम फाइनेंशियल ऑडिट किया जा सके. उम्मीद की जा सकती है कि अब मंदिर की एक-एक पाई का हिसाब शीशे की तरह साफ रखा जाएगा, जिससे श्रद्धालुओं का खोया हुआ भरोसा पूरी तरह बहाल हो सके.
जीरो-टॉलरेंस और निष्पक्ष आचरण : सेना के अनुशासन में सिफारिश या ढिलाई के लिए कोई जगह नहीं होती. मंदिर में काम करने वाले कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों के लिए एक सख्त कोड ऑफ कंडक्ट लागू होना बेहद जरूरी है. क्योंकि इसी की कमी से पिछले दिनों सब गड़बड़ हुई. उम्मीद की जानी चाहिए कि किसी भी तरह की अनैतिक गतिविधि या श्रद्धालुओं के साथ दुर्व्यवहार पर त्वरित और सख्त कार्रवाई होगी.
एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र के कंधों पर 'ऑपरेशन अयोध्या' के जरिए यह साबित करने की जिम्मेदारी है कि जब आस्था का प्रबंधन सेना के अनुशासन के साथ मिलता है, तो परिणाम अद्भुत होते हैं. देवरिया की माटी से जुड़ा यह जांबाज जब अयोध्या में रामकाज की कमान संभाल रहा है, तो यह केवल एक नया जॉब नहीं बल्कि एक राष्ट्रीय दायित्व भी है. और यहां चुनौतियां सीमा पार की नहीं हैं, बल्कि अपनों को लाइन पर लाने की है.