कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने दिवाली तक अपने कार्यकर्ताओं से आंदोलन को विराम देने और परिवार के साथ समय बिताने की अपील की है. सौरभ दास और आशुतोष रांका की हिरासत के बीच उनका यह संदेश ऐसे समय आया है, जब देश त्योहारी मौसम में प्रवेश कर चुका है. दिपके ने कार्यकर्ताओं से निराश न होने और नफरत या उकसावे के रास्ते पर न जाने की भी अपील की है. इसे आंदोलन की रणनीति में एक व्यावहारिक विराम के रूप में देखा जा सकता है.
दरअसल, भारत को समझने के लिए केवल उसकी राजनीति और चुनावों को समझना पर्याप्त नहीं है. इस देश की सामाजिक संरचना में त्योहारों की भूमिका बहुत गहरी है. नवरात्रि, गरबा, डांडिया, दुर्गा पूजा, दशहरा, धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस, धनतेरस, लक्ष्मी पूजा, दीपावली, गुरुपर्व और छठ जैसे अवसरों पर करोड़ों लोगों की दिनचर्या बदल जाती है. परिवार एकत्र होते हैं, बाजारों में रौनक बढ़ती है, गांवों और शहरों के बीच आवाजाही तेज होती है और सामाजिक जीवन में उत्सव का एक अलग रंग दिखाई देता है. ऐसे समय में किसी आंदोलन की योजना बनाना केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक परिस्थितियों को समझने का भी विषय है.
सौरभ दास और आशुतोष रांका के नेतृत्व में हुए पिछले प्रदर्शनों के समय भी यह सवाल उठा था कि त्योहारी मौसम में आंदोलन की रणनीति क्या होनी चाहिए.प्रदर्शन में भाग लेने वाले लोगों की धार्मिक पहचान के बारे में व्यापक और विश्वसनीय आंकड़ों के बिना यह निष्कर्ष निकालना कठिन है कि किस जाति धर्म के लोगों ने बहुतायत तौर पर सीजेपी के आंदोलनों में एक्टिव रूप से भाग लिया . हालांकि किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन उसकी मांगों, जनसमर्थन और उसके तरीकों से होना चाहिए, न कि उसके प्रतिभागियों को धार्मिक खांचों में बांटकर.
त्योहारों का समय आम दिनों से अलग
फिर भी यह बात समझने योग्य है कि त्योहारों का समय आम दिनों से अलग होता है. दुकानदारी, खरीदारी, यात्रा, पारिवारिक मुलाकातों और सामाजिक समारोहों के कारण लोगों की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं. छोटे दुकानदारों, कारीगरों, फूल विक्रेताओं, मिठाई कारोबारियों, परिवहन सेवाओं और अस्थायी रोजगार पर निर्भर लोगों के लिए यह अवधि खास महत्व रखती है. ऐसे में किसी आंदोलन के कारण बाजार, परिवहन या सामान्य जनजीवन बाधित होता है तो उसका असर केवल सरकार या राजनीतिक दलों पर नहीं पड़ता, आम नागरिक भी उसकी कीमत चुकाते हैं.
भारत की उत्सव परंपराएं इस लिहाज से भी उल्लेखनीय हैं कि वे अर्थव्यवस्था में मांग पैदा करती हैं. त्योहारों के दौरान कपड़ों, मिठाइयों, इलेक्ट्रॉनिक्स, घरेलू सामान, आभूषण और यात्रा पर खर्च बढ़ सकता है. इससे स्पष्ट है कि त्योहार बाजार को सहारा दे सकते हैं, लेकिन वे आर्थिक मुश्किलों का जादुई समाधान नहीं हैं. भारत में मंदी या आर्थिक सुस्ती को रोकने का श्रेय केवल त्योहारों को देना आर्थिक वास्तविकताओं को सरल बनाकर देखने जैसा होगा.
इसके बावजूद त्योहारों की सामाजिक शक्ति को कम करके नहीं आंका जा सकता. भारत की सांस्कृतिक परंपरा का प्रवाह अनेक धार्मिक और सामाजिक परिवर्तनों के बावजूद जारी रहा है. सनातन परंपराओं की निरंतरता इसका एक उदाहरण है. इसी देश में बौद्ध, जैन, सिख, इस्लाम और ईसाई परंपराओं से जुड़े पर्व भी सार्वजनिक जीवन का हिस्सा हैं. यह विविधता भारत की सांस्कृतिक पहचान को व्यापक बनाती है. इस विरासत की असली ताकत केवल किसी एक परंपरा का टिके रहना नहीं, बल्कि अलग-अलग आस्थाओं और समुदायों का एक साझा सामाजिक संसार में साथ रहना है.
यही कारण है कि आंदोलन करने वाले संगठनों के लिए भी भारत की सांस्कृतिक लय को समझना आवश्यक है. विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है और किसी त्योहार के आ जाने से लोगों की शिकायतें समाप्त नहीं हो जातीं. यदि चुनावी प्रक्रिया, बेरोजगारी, शिक्षा या सरकारी जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल हैं, तो उन्हें उठाने का अधिकार नागरिकों के लिए बना रहता है. इतिहास में अनेक जनआंदोलनों ने कठिन परिस्थितियों में भी जनता का ध्यान आकर्षित किया है. इसलिए यह कहना कि भारत में त्योहारों के दौरान कोई आंदोलन कभी सफल नहीं हुआ, एक अतिव्यापक दावा होगा. लेकिन आंदोलन की सफलता केवल भीड़ जुटाने में नहीं, जनता से संवाद बनाए रखने और व्यापक समर्थन हासिल करने में भी होती है.
दुनिया के दूसरे हिस्सों में जेनजी आंदोलनों ने दिखाया है कि बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर युवा असंतोष बड़े बदलावों का कारण बन सकता है. बांग्लादेश और नेपाल में युवा प्रदर्शनों के राजनीतिक परिणाम सामने आए. भारत में भी युवाओं के आंदोलनों ने शिक्षा और चुनावी पारदर्शिता से जुड़े मुद्दों पर बहस को व्यापक बनाया है. लेकिन हर देश की सामाजिक संरचना, संस्थाएं और राजनीतिक परिस्थितियां अलग होती हैं. भारत में त्योहारों, परिवारों, स्थानीय समुदायों और चुनावी राजनीति की बड़ी भूमिका होने से आंदोलनों का स्वरूप अलग हो सकता है. इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि यहां युवा असंतोष का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.
विराम की अपील को इसी संदर्भ में देखना चाहिए
अभिजीत दिपके की दिवाली तक विराम की अपील को इसी संदर्भ में देखना चाहिए. आंदोलन की ऊर्जा बनाए रखने के लिए कार्यकर्ताओं का मानसिक और पारिवारिक जीवन भी महत्वपूर्ण है. हालांकि, यह विराम आंदोलन की मांगों से पीछे हटने का पर्याय नहीं होना चाहिए. यदि किसी मुद्दे पर असंतोष वास्तविक है, तो त्योहार बीतने के बाद भी उसका समाधान जरूरी रहेगा. सरकार और संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे सवालों का जवाब दें, शिकायतों की निष्पक्ष जांच करें और संवाद की गुंजाइश बनाए रखें.
दुर्गा पूजा, दशहरा, धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस, नवरात्रि, लक्ष्मी पूजा, गुरु पर्व, धनतेरस, दीपावली और छठ की शुभकामनाओं के साथ यह समझना भी जरूरी है कि संस्कृति केवल उत्सव मनाने का नाम नहीं है. उसमें संयम, सहअस्तित्व और दूसरों के जीवन के प्रति संवेदनशीलता भी शामिल है. त्योहारों का सम्मान तभी सार्थक है, जब हम उन लोगों के प्रति भी सम्मान बनाए रखें जिनकी राजनीतिक राय हमसे अलग है.
भारत की सांस्कृतिक शक्ति उसके समाज को जोड़ने में है. आंदोलन हों या चुनाव, आर्थिक प्रगति हो या सामाजिक परिवर्तन इन सबको इसी व्यापक सामाजिक संदर्भ में समझना होगा. त्योहारों के दौरान विराम लेना व्यावहारिक हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में उठने वाले सवालों का जवाब उत्सव समाप्त होने के बाद भी देना ही होगा.