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क्यों ममता की लाचारी, उद्धव से भी भारी? कमजोर पड़ती स्ट्रीट फाइटर की लड़ाई

तृणमूल कांग्रेस के बागियों ने अब ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी को भी पार्टी से हटा दिया है. बागी विधायक अरूप रॉय को नया अध्यक्ष बनाते हुए, ऋतब्रत बनर्जी ने ममता बनर्जी को मुख्य सलाहकार बनने की पेशकश की है. ममता बनर्जी के पास अब बहुत कम विकल्प बचे लगते हैं.

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तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे. (Photo: PTI)
तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे. (Photo: PTI)

ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे की राजनीति में जमीन आसमान का फर्क है. ममता बनर्जी ने जो भी राजनीतिक हैसियत हासिल की, अपनी बदौलत की. उद्धव ठाकरे को तो विरासत में मिली राजनीति जमीन संभालनी थी. उद्धव ठाकरे की पार्टी टूटी तो माना जा रहा था कि राजनीतिक दांव-पेच में कमजोर होने की कीमत चुकानी पड़ी. तब शरद पवार का भी एक बयान आया था, जिसमें वो उद्धव ठाकरे को अलर्ट करने की बात कर रहे थे. शरद पवार की बातों से लगा जैसे उद्धव ठाकरे उनकी बात मान लिए होते तो अपनी पार्टी को बचा सकते थे. लेकिन, शिवसैनिकों पर अपने भरोसे के आगे वो शरद पवार की बातों को नजरअंदाज कर दिए - लेकिन ये सारी बातें तब पीछे छूट गईं, जब शरद पवार की पार्टी के साथ भी बिल्कुल वैसा हो गया, जैसा उद्धव ठाकरे के साथ हुआ था. 

और, अब ममता बनर्जी की पार्टी के साथ भी ठीक वैसा ही हो गया है, जैसा उद्धव ठाकरे और शरद पवार के साथ हो चुका है. उद्धव ठाकरे को थोड़ी देर के लिए अलग रखकर देखें, तो शरद पवार महाराष्ट्र की राजनीति के दिग्गज माने जाते हैं, और ममता बनर्जी खुद को पश्चिम बंगाल की स्ट्रीट फाइटर बताती रही हैं - लेकिन, सब कुछ अलग अलग होने के बावजूद तीनों ही राजनीति में एक ही तरीके से गच्चा क्यों खा गए?

जिस दिन उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत करने वाले उनके सांसद महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के साथ प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे, उसी दिन पश्चिम बंगाल में टीएमसी के बागियों ने संगठन में समानांतर व्यवस्था बनाते हुए एक झटके में ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी को बेदखल कर दिया - ममता बनर्जी तो बड़ी ही अनुभवी पॉलिटिशियन हैं, ऐसा क्यों लगता है जैसे वो उद्धव ठाकरे से भी ज्यादा कमजोर पड़ गईं?

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टीएमसी बनाम 'असली टीएमसी'

कोलकाता में न्यूटाउन के एक होटल में बागी नेताओं की तरफ से तृणमूल कांग्रेस का स्पेशल सेशन बुलाया गया था. करीब आधे घंटे के विशेष अधिवेशन में पश्चिम बंगाल के बागी विधायक, पूर्व पार्षद और  पदाधिकारी शामिल हुए. आयोजन के जरिए हर तरह से संदेश देने की कोशिश लग रही थी. तृणमूल कांग्रेस का चुनाव निशान प्रमुखता से दिखाया जा रहा था. मंच पर महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, काजी नजरुल इस्लाम और बीआर आंबेडकर की तस्वीरें लगी थीं - ध्यान देने वाली बात यह रही कि ममता बनर्जी की कहीं कोई तस्वीर नजर नहीं आई.

बाद में बागी विधायकों के नेता ऋतब्रत ने मीडिया को विशेष अधिवेशन की जानकारी दी, और कहा, ममता दीदी चाहें तो हमारी मुख्य सलाहकार बन सकती हैं. असल में, ममता बनर्जी को हटाकर विधायक अरूप रॉय को 'असली TMC' का नया अध्यक्ष बनाया गया है. बागी नेताओं ने अपनी नई और समानांतर व्यवस्था को 'असली TMC' बताया है. 

'असली TMC' की नई कमेटी में अरूप बिस्वास, फिरहाद हकीम, रथिन घोष और सबीना यास्मीन को वाइस-चेयरमैन बनाया गया है. बंगाल में टीएमसी के बागियों के नेता ऋतब्रत बनर्जी के अलावा जावेद खान और संदीपन साहा जनरल सेक्रेटरी बने हैं. टीएमसी विधायक अखरुज्जमान अंसारी को कोषाध्यक्ष बनाया गया है. 

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ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि विशेष अधिवेशन तृणमूल कांग्रेस के संविधान के अनुसार ही आयोजित किया गया था, और उसकी जानकारी चुनाव आयोग को दी जाएगी. ऋतब्रत बनर्जी ने बताया कि नया नेतृत्व जल्दी ही जिला कमेटी, स्टेट यूनिट और प्रवक्ताओं के पैनल भी तैयार करेगा. 

ऋतब्रत बनर्जी की तरफ से ममता बनर्जी को तो मुख्य सलाहकार बनने की पेशकश की गई है, लेकिन अभिषेक बनर्जी को पूरी प्रक्रिया में नजरअंदाज किया गया है. वैसे भी टीएमसी में विद्रोह का बहाना तो अभिषेक बनर्जी ही बने हैं. कयास लगाए जा रहे थे कि अभिषेक बनर्जी को सस्पेंड कर दिया गया है, लेकिन बागियों की तरफ से बताया गया है कि न तो कोई ऐसा प्रस्ताव पेश किया गया, न ही पास किया गया. 

ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि जो भी बदलाव हुए हैं, टीएमसी संविधान के दायरे में किए गए हैं. ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस के संविधान के अनुच्छेद 20 में कहा गया है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति की बैठक हर तीन साल में होनी चाहिए, लेकिन 2022 के बाद से कोई बैठक नहीं हुई है. दावा किया गया है कि राष्ट्रीय कार्यसमिति का गठन इससे पहले 12 फरवरी, 2022 को हुआ था, और उसका कार्यकाल 11 फरवरी, 2026 को खत्म हो गया. समितियों के पुनर्गठन के पीछे यही दलील दी जा रही है.

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बीते 3 जून को तृणमूल कांग्रेस की तरफ से बताया गया था कि गहन विचार-विमर्श के बाद, यह फैसला लिया गया है कि पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सभी समितियां, साथ ही उसके सभी अनुषांगिक संगठन, तत्काल प्रभाव से भंग माने जाएंगे - कौन सही है, और कौन गलत, अब यह फैसला चुनाव आयोग ही कर सकता है. 3 जून को टीएमसी के 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता के तौर पर समर्थन जताया था, और उसके बाद स्पीकर की भी मान्यता मिल गई थी.

ममता बनर्जी क्या कर रही हैं?

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायकों में से 58 के समर्थन से ऋतब्रत बनर्जी विधानसभा में विपक्ष के नेता बनाए गए हैं. हालांकि, अब ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि उनको 65 विधायकों का समर्थन हासिल है. टीएमसी के 14 विधायकों ने ममता बनर्जी के प्रति अपना समर्थन जताया है, जबकि एक विधायक जेल में हैं. 28 में से 20 सांसदों ने काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व ममता बनर्जी का साथ छोड़ दिया था, और वे NCPI में शामिल हो गए थे. महुआ मोइत्रा, सौगत रॉय और बाबुल सुप्रियो जैसे सांसद जरूर फील्ड में ममता बनर्जी का बचाव कर रहे हैं, लेकिन खुद ममता बनर्जी खामोश बनी हुई हैं. 

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बागी नेताओं की तरफ से नई कमेटी बनाए जाने पर टीएमसी सांसद सौगत रॉय का कहना है, यह एक मजाक है. यह एक सर्कस है. ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी. एक विपक्षी पार्टी को सत्ताधारी पार्टी बनाया... उन्हें कौन हटाएगा? ऋतब्रत बनर्जी, जो कुछ दिन पहले तक सीपीएम के सदस्य थे? हम इसे स्वीकार नहीं करते... जो लोग नए गुट में शामिल हुए हैं, टीएमसी से निकाल दिया जाएगा और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

टीएमसी विधायक कुणाल घोष कहते हैं, यह कॉमेडी शो है. जिस व्यक्ति को तृणमूल कांग्रेस से निकाला जा चुका है, वही विशेष सत्र बुला रहा है. मामला अदालत में है और हमें विश्वास है कि इंसाफ होगा.

दोनों तरफ के अपने अपने दावे हैं. बागी नेताओं का दावा है कि बड़ी संख्या में विधायक, पार्षद और संगठन के नेताओं का उन्हें समर्थन हासिल है. और, ऐन उसी वक्त ममता बनर्जी के समर्थकों का दावा है कि तृणमूल कांग्रेस की पहचान ही ममता बनर्जी से है, जमीनी स्तर पर संगठन अब भी उनके ही कंट्रोल में है.

तृणमूल कांग्रेस के निलंबित प्रवक्ता ऋजु दत्ता ने सोशल साइट X पर एक पोस्ट के जरिए अलग जानकारी दी है. ऋजु दत्ता ने ममता बनर्जी के हस्ताक्षर वाला एक पत्र शेयर किया है. टीएमसी के लेटरहेड पर राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्यों के नाम हैं. ऋजु दत्ता के मुताबिक, यह पत्र ममता बनर्जी की तरफ से चुनाव आयोग को भेजा गया है.

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गौर करने वाली बात है कि यह पत्र भी 22 जून को ही चुनाव आयोग को भेजा गया है. मतलब, जिस दिन ऋतब्रत बनर्जी ने अपनी तरफ से टीएमसी का विशेष अधिवेशन बुलाया था. पत्र के अनुसार, राष्ट्रीय कार्यसमिति में ममता बनर्जी अध्यक्ष और अभिषेक बनर्जी राष्ट्रीय महासचिव हैं. डेरेक ओ'ब्रायन संयुक्त सचिव हैं - और यह भी बताया गया है कि राष्ट्रीय कार्यसमिति की यह स्थिति 20 जून, 2026 के मुताबिक है. 

अब तो जनता का ही आसरा

ममता बनर्जी की मुश्किलों का दायरा बहुत बड़ा हो गया है. टीएमसी के कई बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिए गए हैं. यह पार्टी के कोषाध्यक्ष के कहने पर हुआ है. कोलकाता के एक बैंक ने टीएमसी के तीन खातों को डेबिट फ्रीज कर दिया है, और रिपोर्ट के मुताबिक, खातों में करीब 440 करोड़ रुपये जमा हैं. 

उद्धव ठाकरे और शरद पवार की पार्टियों के साथ जो हुआ, और लड़ाई से जो नतीजा निकला, ममता बनर्जी को निराश करने वाला है. ममता बनर्जी अब जनता की ही अदालत से उम्मीद कर सकती हैं. जनता की उसी अदालत से जो ममता बनर्जी को विधानसभा चुनाव में खारिज कर चुकी है. 2024 के लोकसभा में तो उद्धव ठाकरे की पार्टी का प्रदर्शन एकनाथ शिंदे से भी अच्छा था, लेकिन बीएमसी चुनाव तक पूरी तरह चूक गए. ममता बनर्जी को अपना दबदबा साबित करने का मौका कोलकाता नगर निगम के चुनाव हो सकते हैं.

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