क्या प्रशासन ने उत्तर भारत के हिंदुओं को फेल कर दिया है? देश के हर तीर्थ स्थल पर कॉरिडोर बन रहे हैं—काशी को मिला, महाकाल को मिला, केदारनाथ को मिल रहा है—लेकिन जहां वास्तव में और बेहद जरूरत है, वहां कोई कॉरिडोर नहीं. कांवड़िया कॉरिडोर. कांवड़ की सुरक्षा के लिए, और एनसीआर के बाकी लोगों की सुरक्षा के लिए उनकी अति-भक्ति से.
साल का वही समय आ गया है. आपको पता चल जाता है कि कांवड़िए करीब एक किलोमीटर दूर हैं क्योंकि खिड़कियां कांपने लगती हैं और सड़क पर आपकी कार हिलने लगती है. सरकार को भी पहले से पता होता है कि साल का वही समय है, क्योंकि हिंदू कैलेंडर में श्रावण नाम का महीना होता है.
इसका श्रवण कुमार से कोई लेना-देना नहीं, जिन्होंने अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ पर ढोया और उल्लेखनीय बात यह है कि कभी किसी गुजरते कार वाले पर नहीं गिराया या किसी को रॉड से नहीं पीटा. एक समर्पित बेटा, एक भी मुकदमा नहीं. सब कांवड़िये एक से नहीं होते. कुछ ही होते हैं जिनको भौकाल काटना होता है.
कांवड़िए श्रवण कुमार के तरह अपने स्वार्थ या अपने माता-पिता के मोक्ष के लिए नहीं, बल्कि पूरे गांव, समुदाय और राष्ट्र की शांति और भलाई के लिए इतना कष्ट उठाते हैं.
वे पवित्र गंगा का जल अपने गांव के शिवालय तक ले जाते हैं, क्योंकि भगवान शिव को समुद्र मंथन से निकले विष को पीने के बाद गंगा के ठंडे जल की जरूरत होती है, ताकि देवताओं को अमृत शांति से मिल सके. मानवता के लिए उन्होंने नीलकंठ बनना स्वीकार किया.
कांवड़िए भी मानवता के लिए ही आकंठ डूब लीन मीन और साथ में मशीन लेकर मोडिफाइड बाइक और डीजे वाले बाबू के ट्रक के साथ चलते हैं. पुराने कांवड़िए, या कम से कम कथा के अनुसार, उस कहानी को मिथक से सड़क तक ले जाते हुए कभी विंडस्क्रीन नहीं तोड़ी. उस समय हर कांवड़िये का आदर्श था संयम, इतना जितना इस श्रावण में पूरे मुजफ्फरनगर हाईवे में नहीं दिखता.
परंपरा जारी है. पवित्र जल ढोने वाले इंसान, उनमें से कुछ काफी कम पवित्र पदार्थों के प्रभाव में होते हैं, लेकिन तब तक किसी को गुस्सा नहीं आता जब तक कोई उनसे झगड़ा न कर ले. कांवड़ खंडित नहीं हो सकती, इसलिए वे बहुत विनम्रता से पहले ही चेतावनी देते हैं, और फिर अगर कोई फिर भी उसे छू ले, उसके रास्ते में आ जाए या सिर्फ उनसे उलझ जाए तो भयंकर गुस्से और भारी बदले के साथ कार्रवाई करते हैं. तब गुस्सा निकलता है, और मेरी कसम, बहुत उदारता से निकलता है—ब्याज समेत, और कभी-कभी एक घमंडी हॉकी स्टिक या शांत क्रिकेट बैट के साथ.
इस साल की यात्रा के पहले पांच दिनों में ही उत्तर प्रदेश में 170 से ज्यादा लोगों पर हुड़दंग का केस दर्ज हुआ, जो संदर्भ के लिए आईपीएल के ज्यादातर बल्लेबाजों का स्ट्राइक रेट भी नहीं होता. एक पिकअप ट्रक की विंडस्क्रीन सिर्फ इसलिए तोड़ी गई कि वह कांवड़ के बहुत करीब चला गया, और बच्चों से भरी स्कूल वैन की खिड़कियां उन लोगों ने फोड़ दीं जो भक्ति में इतने खोए थे कि सात साल के बच्चों की बस और झगड़े के लिए तैयार वयस्कों की कार में फर्क नहीं बता पाए.
एक अगस्त को हरिद्वार में एक नए समूह ने एक कार को घेर लिया, ड्राइवर को डंडों से पीटा और बॉडी को तोड़ा—कैमरे पर, तालियों की गड़गड़ाहट के लिए. श्रवण कुमार कांवड़ के बारे में वो बातें सीख रहे होंगे जो किसी पवित्र ग्रंथ में नहीं लिखी गईं. जब यात्रा श्रावण शिवरात्रि पर खत्म होगी, काशी विश्वनाथ, बागपत के पुरा महादेव और गाजियाबाद के दूधेश्वर नाथ पर जलभिषेक की भीड़ के साथ, वायरल वीडियो की संख्या आसानी से भक्तों की संख्या को पीछे छोड़ चुकी होगी.
हमें बताया जाता है कि यह मौसम उत्तर भारत के सामान्य मानविकी के लिए हाइ प्रायोरिटी है. हम ‘हाई’ की पुष्टि कर सकते हैं, लेकिन प्राथमिकता वही है जो सरकार देती है. समाजवादी पार्टी ने वीडियो में दिखे लड़कों को गुंडे कहा, सत्ताधारी पार्टी की प्रतिक्रिया इनकार और इकरार के बीच कहीं घूमती रही, और पूरा देश इस रार को क्या नाम दें, इस पर बहस करता रहा.
क्या वे Gen-Z हैं या सिर्फ कांवड़िए या आरएसएस के कट्टर भक्त, या संघी साथी? संभव है वह सिर्फ कांवड़िये हों. किसी ने समाधान पर पांच मिनट भी नहीं लगाए. समस्या को लेबल करना उसे ठीक करने से कहीं आसान है, और सोशल मीडिया के लिए मजेदार भी.
लेकिन यह लेख वास्तव में उनके बारे में नहीं है. दिल में भोले भक्ति, लहू में भंग और फड़कते अंग, यह संयोग लगभग फिजिक्स का नियम बन चुका है. असली दोषी वो है जिसके पास सालों थे और किताब का हर बहाना था लेकिन किसी का इस्तेमाल नहीं किया, वह सरकार है. और अब समय आ गया है कि कोई इसे साफ-साफ कहे, केसरिया चादर से ढंकने की बजाय, मामले का सामना किया जाए.
कांग्रेस के समय या सपा-बसपा के समय भी नजारा ज्यादा अलग नहीं था.
यात्रा हमेशा खुशी और भक्ति के साथ डर और गुस्से का मिश्रण रही है. फिर 2014 में सेंट्रल दिल्ली और हरियाणा ने केसरिया कस लिया. यूपी ने 2017 में. कांवड़ियों ने कमोबेश समझ लिया कि आखिरकार एक दोस्ताना सरकार सत्ता में है और उन्हें शाम के न्यूज में खलनायक और हुड़दंगी की तरह नहीं माना जाएगा. खैर, अभी भी शाम के न्यूज में उन्हें हुड़दंगी ही बुलाया जा रहा है, और सरकार ने 12 साल में एक चीज दी है उनको- एक हेलीकॉप्टर, और उसमें से गिराने के लिए कुछ गुलाब की पंखुड़ियां. बस इतना ही.
हर साल वही गुलाब की पंखुड़ियां, वही हेलीकॉप्टर, वही फोटोऑप, जबकि नीचे कांवड़िए कारों, ट्रकों, बसों और कभी-कभार भटकते गोवंश के साथ साझा राष्ट्रीय राजमार्ग का एक हिस्सा जाम कर देते हैं—अच्छे इरादों, टूटे कांच और बिखरे स्पेयर पार्ट्स से पटी सड़क पर, जो नौकरशाह की आपकी जेब पर टिकी निगाह जितनी तेज होती है जो त्वचा तक चुभती है.
अगर सरकार सच में इसे प्राथमिकता कहती तो क्या हरिद्वार से एक पैदल पथ बनाने में इतना समय लगता कि कांवड़ियों को हर साल अपनी पवित्र राह को सामान्य भयंकर ट्रैफिक के साथ साझा न करना पड़े? उस पथ पर पंखुड़ियां बिछानी चाहिए ताकि तीर्थयात्री के थके पैर गुलाबों के नरम बिस्तर पर पड़ें. सिर पर बरसाई गई पंखुड़ियों का कोई असर नहीं होता, ख़ुमार तो पहले सर चढ़कर बोल रहा होता है. पंखुड़ियां पैरों के नीचे जानी चाहिए, सिर के ऊपर नहीं. सरकारें अगर सर पर बिठा ले तो नृत्य करने का मन किसका नहीं करेगा.
मार्ग पर सात्विक भोजन कॉरिडोर बनाने की बजाय किसी प्रतिभाशाली अधिकारी ने फैसला किया कि इलाज सड़क किनारे के ढाबों को साइनबोर्ड पर मालिक का नाम लिखवाना है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत खारिज कर दिया. एक डेडिकेटेड कॉरिडोर होता तो वहां सब ढाबे बिना प्याज-लहसुन वाला भोजन परोसते तो प्याज़ के अंश का संदेह मारपीट का कारण ना बनता.
हाईवे से हटकर कांवड़ सेवा समिति के तंबू, जहां सेवादार वास्तव में किसी की आवाजाही रोके बिना सेवा कर सकें? नहीं बनाए गए. स्कूलों में छुट्टियां कर दी गईं, कोई मेकअप क्लास घोषित नहीं, क्योंकि सिलेबस एक हफ्ते के लिए स्थगित करना हाईवे से दूर फुटपाथ बनाने से आसान है. दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे पूरी अवधि के लिए बंद रहा और कागज पर खुला भी तो इस शानदार ट्रैफिक जाम ने खत्म होने से इनकार कर दिया. राज्य ने इस साल तकनीक आजमाई.
मुजफ्फरनगर के हिस्से को AI पावर्ड कैमरा ड्रोन मिले. नोएडा में ही 3,000 से ज्यादा CCTV, 30 टेथर्ड ड्रोन और करीब 2,500 पुलिसकर्मी, सभी रियल टाइम में असामान्य जनता का घनत्व फ्लैग करने के लिए ट्रेन किए गए. महिला कांवड़ियों की सुरक्षा के लिए 10,000 अतिरिक्त महिला पुलिसकर्मी तैनात की गईं, जो सचमुच अच्छा विचार है. फिर भी जो फुटेज असल में न्यूज बनी, वह किसी एल्गोरिदम ने नहीं पकड़ी, किसी के फोन ने पकड़ी, स्थानीय थाने को खबर होने से पहले अपलोड हो गई. सारी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तैनात कर दी, और सरकार को फिर भी अपना काम करने के लिए किसी राहगीर के सस्ते चीनी फोन की जरूरत पड़ी.
पुलिस पूरे पखवाड़े यह नहीं जान पाती कि वह कांवड़िए को जनता से बचा रही है या जनता को कांवड़िए से, और दोनों काम सरकारी तरीके से पूरा होता है, या कहिए अधूरा होता है, समाज भी कांवड़ ढोने के पारंपरिक नियमों को लागू करने में विफल रहा है—कोई नशा नहीं, कोई संगीत नहीं, सिर्फ नामजप, कोई मनोरंजन नहीं, सिर्फ दिल में भक्ति और होंठों पर भोले का नाम, कोई कठोर भाषा नहीं, कोई गाली नहीं, इत्यादि. लेकिन समाज के पास उन नियमों को लागू करने के औजार नहीं हैं. कानून व्यवस्था के पास हैं. उसने फिर से, उनका इस्तेमाल न करने का फैसला किया.
आवासीय, व्यावसायिक और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए कागज पर डेसिबल की सीमाएं हैं, और किसी भी DJ ट्रक के सबवूफर ने कभी उनके अस्तित्व के बारे में सुना ही नहीं, क्योंकि जब सिस्टम खुद सबवूफरिंग कर रहा हो तो कुछ सुनना मुश्किल है. सरकार जानती है कि महान हिंदुत्व सबाल्टर्न जागरण सबवूफर की मांग करता है, इतने जोर से कि आवाज अब डेसिबल में नहीं बल्कि रिक्टर स्केल पर मापी जाती है, और फिर भी उसने अपने खुद के नियम को लागू करने की हिम्मत नहीं जुटाई.
‘सबवूफर से नीचे, सब बराबर हैं’. संविधान की नज़र में हम सब बराबर हैं, सिवाय साल के एक पखवाड़े के. जब कांवड़िए नाममात्र की प्राथमिकता होते हैं. उन्हें उसी सड़क के हिस्से को घर लौटने की कोशिश कर रहे आम मानविकी के साथ साझा करने के लिए मजबूर किया जाता है. यात्रा खत्म होती है. बहाने नहीं.
वे अगले श्रावण में फिर लौटेंगे, यात्रा के साथ. डीजे वाले बाबू, कांवड़ वाले श्रद्धालु, पूड़ी और आलू, सरकारी कचालू, जाम में फंसा एनसीआर का नागरिक, वही किच-किच, डर और बोल बम. कांवड़िए कम से कम चलते तो हैं. सिस्टम ताकता रहता है. उनके लिए रोड ब्लॉक नहीं किया तो कांवड़िये बुरा मान जाएंगे. ब्लॉक कर दिया तो दफ़्तर के चक्कर लगाने वाले कोसेंगे. नौ दिन चले अढ़ाई कोस. इधर रोष, उधर भी रोष.
(यह लेखक के निजी विचार हैं)