रांची में भीड़ उस जनसैलाब के मुकाबले काफी छोटी है, जो पिछले दिनों जंतर-मंतर पर उमड़ी थी. लेकिन केवल संख्या बल किसी विरोध-प्रदर्शन की पूरी कहानी बयां नहीं करता. उसका मिजाज, उसकी भावना और उसके पीछे छुपे हुए विश्वासघात का अहसास अक्सर कहीं अधिक मायने रखता है. इस मायने में, जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह जंतर-मंतर की अजीबोगरीब ढंग से याद दिलाता है.
जंतर-मंतर की ही तरह, यह आंदोलन भी जन-आक्रोश, राजनीतिक भागीदारी और मूक समर्थन के चौराहे पर खड़ा है. जंतर-मंतर की तरह ही, यहां भी एक स्पष्ट राजनीतिक अंडर-करंट नजर आ रहा है. राजनीतिक चेहरे और समर्थक मौजूद हैं. राजनीतिक दल और कार्यकर्ता दिख रहे हैं, जैसा कि किसी भी बड़े जन-आंदोलन में स्वाभाविक रूप से होता ही है. फिर भी इस भीड़ को केवल 'राजनीतिक रूप से प्रायोजित' मानकर खारिज कर देना एक भूल होगी. यहां जुटी भीड़ का एक बड़ा हिस्सा स्वतःस्फूर्त है. आम नागरिक इसलिए यहां नहीं आया हैं क्योंकि उन्हें बुलाया गया है, बल्कि इसलिए हैं क्योंकि वे यहां आने के लिए मजबूर महसूस कर रहे हैं.
हालांकि, डेमोग्राफिक्स एक अलग कहानी बयां करती है. जंतर-मंतर एक युवा भारत का ठिकाना था- Gen Z, पहली बार सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी और ऐसे आदर्शवादी, जिन्हें लगता था कि बदलाव उनकी पहुंच में है. इसके विपरीत, जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में ज़्यादातर 25 से 35 साल के उम्र वर्ग के लोग हैं. वे अब सिर्फ़ उम्मीद के भरोसे नहीं चल रहे, बल्कि उनके भीतर गहरा आक्रोश और खीझ भरी है. यह एक ऐसी पीढ़ी है जिसने एक के बाद एक कई घोटाले, टूटे हुए वादे और संस्थागत विफलताओं को झेला है. उनका गुस्सा अचानक उबला हुआ नहीं है, यह बरसों से जमा हुआ आक्रोश है.
यह एक ऐसा वर्ग है जो आदर्शवादी कम, थका हुआ ज्यादा है. संस्थाओं से मिले बार-बार के धोखे का बोझ उठाए हुए. जिनके बारे में उनका मानना है कि वे पूरी तरह नाकाम हो चुकी हैं. वे हताश हैं और अपनी जवानी की उस कीमत का हिसाब चाहते हैं, जो वे इस ध्वस्त हो चुकी व्यवस्था के कारण खो रहे हैं.
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आम नागरिक दे रहे हैं योगदान
यहां दिख रही एकजुटता भी जंतर-मंतर की याद दिलाती है. जैसा कि तब हुआ था, आम नागरिकों ने प्रोटेस्टर्स के सपोर्ट के लिए अपना योगदान देना शुरू कर दिया है. वे प्रदर्शनकारियों के लिए खाना और जरूरी सामान भेज रहे हैं. ये केवल दान या मदद के संकेत भर नहीं हैं. यह इस बात का सार्वजनिक ऐलान है कि यह प्रदर्शन सिर्फ़ उस मैदान में डटे लोगों का नहीं है, बल्कि दूर बैठकर इसे देख रहे लोगों का भी है.
हालांकि, विरोध की भाषा काफी अलग है. जंतर-मंतर का माहौल व्यंग्य, बेबाकी, चटकीले नारों और सत्ता में बैठे लोगों पर तीखे कटाक्षों के लिए जाना जाता था. झारखंड में मिजाज अलग है. यहां का मुख्य स्वर आक्रोश, बेबसी और दर्द से भरा है. वह हास्य, जो कभी असंतोष के स्वर को थोड़ा हल्का कर देता था, अब मोहभंग के एक गहरे और ज्यादा प्रत्यक्ष रूप में बदल चुका है.
जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में, जैसा कि वे स्वयं महसूस कर रहे हैं, मजाक किसी और का नहीं बल्कि उनका ही बन चुका है. प्रदर्शनकारियों का.
यहां जो देखने को मिल रहा है, वह कहीं अधिक विचलित करने वाला है. यहां के नारे बहुत चतुर या आकर्षक नहीं हैं. वे उन लोगों की हताशा भरी चीखें हैं जिन्हें अब इस बात का रत्ती भर भी भरोसा नहीं रहा कि संस्थाएं खुद को खुद-ब-खुद सुधार लेंगी.
मैदान बदल जाएगा. भावना नहीं
इतिहास अक्सर एक चेतावनी देता है. जंतर-मंतर कभी भी सिर्फ़ एक लोकेशन का नाम नहीं था. जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में भले ही भीड़ कम हो, आज का नया जंतर-मंतर है. यदि इस आक्रोश के बुनियादी कारणों का समाधान नहीं किया गया, तो आज का यह प्रदर्शन स्थल कल किसी दूसरे स्थल में तब्दील हो जाएगा. किसी और शहर में. किसी और राज्य में. किसी और सरकार के शासन में. किसी और शिकायत को लेकर. मैदान बदल जाएगा. भावना नहीं बदलेगी.
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असली सवाल यह नहीं है कि क्या यह प्रदर्शन समाप्त होगा या नहीं. यह तो समाप्त हो जाएगा. सवाल यह है कि जिन परिस्थितियों ने इसे जन्म दिया, वे खत्म होंगी या नहीं?
यदि वे समाप्त नहीं होती हैं, तो भारत ऐसे ही नए जंतर-मंतर और नए जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम खोजता रहेगा. जन-चौराहों के नाम अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन वे एक ही संदेश से भरते रहेंगे. एक ऐसी पीढ़ी, जिसे लगता है कि उसकी सुनवाई नहीं हो रही है, वह आखिरकार अपनी बात कहने के लिए अपना मंच ढूंढ ही लेगी. और चाहे आप इसे पसंद करें या न करें- उनकी बात सुनी जाएगी. वे यह सुनिश्चित करेंगे कि उनकी बात सुनी जाए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)