दिव्या मित्तल का इस्तीफा व्यक्तिगत फैसला है, पर सवाल पुराना है. ईमानदार अधिकारी हर सरकार में असुविधाजनक हो जाते हैं. उनके लिए भी जो विपक्ष में रहते हुए उन अफसरों की ईमानदारी की दाद देते हैं. पर यह दावा अतिशयोक्ति भी है और आधा सच भी है. सिक्के के दोनों पहलुओं को देखने की जरूरत है.
उत्तर प्रदेश कैडर की 2013 बैच की आईएएस दिव्या मित्तल ने 13 वर्ष की सेवा के बाद स्वैच्छिक त्यागपत्र की घोषणा की है. आईआईटी दिल्ली, आईआईएम बेंगलुरु, लंदन की नौकरी छोड़कर वे देश लौटी थीं. मिर्जापुर में लहुरियादह जैसे पहाड़ी गांव तक पहली बार नल का पानी पहुंचाने और देवरिया में योजनाओं को जमीन तक ले जाने के लिए उन्हें याद किया जाएगा. उन्होंने कारण नहीं बताया, पर बाद में कहा कि कोई एक घटना ट्रिगर नहीं बनी, महीनों से सोच रही थीं, भविष्य तय नहीं है. हालांकि इसे लेकर सपा ने योगी सरकार पर दबाव बनाए जाने का आरोप लगाया. वहीं, भाजपा प्रवक्ता ने कांग्रेस से जुड़ाव का दावा किया. दोनों दावे अपुष्ट हैं. दिव्या मित्तल का इस्तीफा औपचारिक रूप से स्वीकार होना अभी बाकी है.
फिर भी यह घटना एक पुरानी सच्चाई को छूती है. भारतीय प्रशासनिक सेवा का आदर्श निष्पक्षता है, राजनीतिक व्यवस्था का स्वभाव नियंत्रण है. वहीं, दिव्या मित्तल ने सोशल मीडिया पर लिखे पोस्ट में किसी भी अफसर के लिए फाइल के पीछे के व्यक्ति की गरिमा को महत्वपूर्ण करार दिया. जाहिर है कि उनका इशारा इस तरफ है कि नेता को सुविधा से ऊपर रखा जाता है, तब टकराव होता है. यह टकराव किसी एक दल की विशेषता नहीं है. यह सभी दलों की सरकारों के साथ होता है.
चर्चित उदाहरण
अशोक खेमका इसका सबसे चर्चित उदाहरण हैं. हरियाणा कैडर के 1991 बैच के अधिकारी ने करीब 57 तबादले झेले. 2012 में उन्होंने रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के भूमि सौदे का म्यूटेशन रद्द किया, तब कांग्रेस की हुड्डा सरकार थी. बाद में बीजेपी की सरकार आई तो उम्मीद जगी कि खेमका को इसका रिवार्ड मिलेगा. पर ऐसा नहीं हुआ. दक्षिण और अन्य राज्यों में भी रेत, खनन, भूमि और ठेकों पर अड़े अधिकारियों को साइडलाइन किया गया है. जो व्यवस्था के अनुकूल नहीं चलता, उसे किनारे कर दिया जाता है. चाहे सरकार कोई भी हो.
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दरअसल, राजनीतिक दल विपक्ष में रहते हुए किसी की ईमानदारी की तारीफ करते हैं, सत्ता में आज्ञाकारिता चाहते हैं. यह दोहरा चरित्र सभी प्रमुख दलों में दिखता है. दूसरा सवाल ये है कि क्या राजनीति में जाकर सेवा ज्यादा हो सकती है? इतिहास इसका उत्तर पॉजिटिव और नेगेटिव दोनों ही देता है. अजित जोगी मुख्यमंत्री बने, यशवंत सिन्हा वित्त मंत्री, अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री, राज कुमार सिंह केंद्रीय मंत्री. कुछ पूर्व अफसर सांसद-विधायक रहकर भी असर डालते हैं. पर बहुसंख्यक पूर्व अधिकारियों की राजनीतिक यात्रा साधारण रहती है. बिना संगठन, बिना चुनावी मशीन, बिना शीर्ष कुर्सी के सांसद का हाथ अक्सर बंधा रहता है. बजट, नियुक्ति, जिला प्रशासन- ये चीजें कार्यपालिका के पास हैं. जिलाधिकारी फाइल पर दस्तखत कर किसान के खेत तक पानी पहुंचा सकता है, पर विपक्ष का या सत्तारूढ़ दल का सांसद उसी फाइल पर केवल सवाल पूछ सकता है, फैसला नहीं कर सकता. इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति है कि राजनीति में आकर सेवा करना आसान हो सकता है.