फ्रांस अपने फैशन ब्रांड्स के लिए दुनिया भर में मशहूर है. ये ब्रांड्स दुनिया को बताते हैं कि कपड़ों और स्टाइल में नया क्या है. लेकिन सड़कों पर विरोध का फ्रांसीसी अंदाज भी कम चर्चित नहीं है. जलती गाड़ियां, धुएं में डूबी सड़कें, पुलिस से भिड़ती भीड़ और लूटपाट के बाद बिखरा सामान. फ्रांस में दंगे भी एक तरह का अनूठा ब्रांड हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि यहां हर बार भीड़ के हाथ में एक जैसा झंडा नहीं होता और गुस्से की वजह भी बदल जाती है.
9 अक्टूबर से शुरू हुए बवाल ने फ्रांस की राजनीति को फिर गरमा दिया है. हालांकि इसकी शुरुआत सितंबर में स्कूलों की खराब हालत, शिक्षकों की कमी और भीड़ भरी कक्षाओं के खिलाफ छात्रों के प्रदर्शन से हुई थी. बाद में महंगाई, ईंधन की कीमतों और सरकारी सेवाओं में कटौती के खिलाफ गुस्सा भी इससे जुड़ गया. प्रदर्शनों में करीब आठ लाख लोगों के शामिल होने का दावा किया गया है. पुलिस और सरकार के आंकड़े हालांकि थोड़े अलग हैं. सबसे जरूरी बात यह है कि इतनी बड़ी भीड़ में शामिल सभी लोग हिंसा करने वाले नहीं थे.
बड़े-बड़े ब्रैंड्स से लेकर सारे सुपरस्टोर दंगाइयों का निशाना बने. जमकर लूटपाट हुई. गाड़ियां फूंकी जा रही हैं, ऐतिहासिक इमारतों को दंगाई तोड़फोड़ रहे हैं, आग के हवाले कर रहे हैं. पेरिस से लेकर लियोन, मार्सेय और लिमोज तक फैले विरोध में हजारों लोग गिरफ्तार हो चुके हैं. लिमोज में 19वीं सदी का ऐतिहासिक टाउन हॉल आग की चपेट में आ गया.
ऐसे में सवाल उठता है कि फ्रांस में विरोध की आग इतनी जल्दी कैसे फैल जाती है? और क्यों यहां सड़कों पर उठने वाला गुस्सा कई बार सिर्फ सरकार के खिलाफ नाराजगी नहीं रहता, बल्कि पूरे देश की पहचान, लोकतंत्र और सत्ता के भविष्य पर बहस छेड़ देता है?
छोटी चिंगारी, बड़ा बवाल
1789 में रोटी की कमी, महंगाई को लेकर फूटा लोगों का राजशाही के विशेषाधिकारों पर उतरा. 1830 में प्रेस की आजादी पर रोक के खिलाफ सड़क पर उतरी भीड़ ने राजा को सत्ता छोड़ने पर मजबूर किया. 1848 में राजनीतिक अधिकारों के साथ बेरोजगारी और रोजगार का सवाल जुड़ा, तो फिर सत्ता बदल गई. इन घटनाओं में फर्क था, लेकिन एक बात समान थी. जनता का गुस्सा सिर्फ नाराजगी जताकर खत्म नहीं हुआ. उसने सत्ता के सामने अपना हिसाब भी रखा.
फ्रांस के इतिहास में सड़क पर उतरी भीड़ ने कभी राजशाही को चुनौती दी, तो कभी गणतंत्र और नागरिक अधिकारों की लड़ाई लड़ी. मई 1968 में छात्रों का आंदोलन मजदूरों की ऐतिहासिक हड़ताल में बदल गया. करीब एक करोड़ मजदूर काम छोड़कर आंदोलन में शामिल हुए. सरकार संकट में आई, लेकिन गिरी नहीं. फिर भी इस आंदोलन ने फ्रांस के सामाजिक जीवन और मजदूरों के अधिकारों पर गहरा असर डाला.
इसलिए फ्रांस में दंगे को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या भूल होगी. लेकिन यह भी मान लेना गलत है कि हर दंगा किसी क्रांति की शुरुआत होता है. कई बार आगजनी और लूटपाट के बाद सिर्फ टूटी दुकानें, जली गाड़ियां और गिरफ्तारी की खबरें बचती हैं. असली सवाल यह है कि क्या सरकार उस गुस्से की वजह को समझती है, या सिर्फ सड़कों को खाली कराने के साथ उसकी चिंता खत्म हो जाती है?
फुटबॉल का नतीजा हो या किसी युवक की मौत, सड़क पर गुस्सा क्यों?
2022 में फ्रांस और मोरक्को के बीच विश्व कप सेमीफाइनल के बाद कई शहरों में फुटबॉल प्रशंसकों के बीच झड़पें हुईं. कई जगह पुलिस को भीड़ संभालने के लिए उतरना पड़ा. खेल का नतीजा अपने आप में दंगे की वजह नहीं था, लेकिन प्रतिद्वंद्विता, भीड़ का माहौल और कुछ लोगों की हिंसा ने हालात बिगाड़ दिए.
2023 में नांतेर में 17 साल के नाहेल की पुलिस गोली से मौत के बाद भी फ्रांस में हिंसा भड़क गई थी. गुस्सा सिर्फ एक युवक की मौत पर नहीं था. उसके साथ पुलिस के व्यवहार, भेदभाव की शिकायतों और गरीब उपनगरों में रहने वाले युवाओं के अनुभव भी जुड़ गए थे. दुकानों में लूटपाट हुई, गाड़ियां जलाई गईं और सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचा.
फिलिस्तीन के झंडे और मुस्लिम कट्टरपंथ का आरोप
इस बार के प्रदर्शनों पर एक दूसरी बहस भी हावी हो रही है. हिंसा में मुस्लिम कट्टरपंथी और फ्रांस की संस्कृति को स्वीकार नहीं करने वाले समूह बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. प्रदर्शनों में फिलिस्तीन के झंडे दिखने को भी इस दावे के समर्थन में पेश किया जा रहा है. फ्रांसीसी खुफिया विभाग ने इन दंगों में मुस्लिम कट्टरपंथी समूहों की बड़ी साजिश का जिक्र किया है. जिन्होंने सोशल मीडिया खासकर टिकटॉक पर भ्रामक वीडियो वायरल किए, और अराजकता का माहौल बनाया. जिसके बाद देशभर के अलग-अलग शहरों में लूटपाट और आगजनी शुरू हुई.
इस बहस में एक राजनीतिक दांव भी छिपा है. फ्रांस में 2027 के राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है. हिंसा के बीच दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन और जॉर्डन बार्डेला सरकार पर निशाना साध रहे हैं. उनके लिए यह दिखाने का मौका है कि मौजूदा सरकार व्यवस्था संभालने में नाकाम रही है. राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के कार्यकाल के अंतिम महीनों में यह संकट सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. क्योंकि दक्षिणपंथी पॉलिटिकल रैलियों में लंबे समय से इमिग्रेशन, राष्ट्रीय पहचान और कानून-व्यवस्था के मुद्दे एजेंडा रहे हैं.
फ्रांस में इस बहस का एक गहरा पहलू है. देश का रिपब्लिक यानी गणतांत्रिक व्यवस्था धर्म और नागरिकता को लेकर एक खास तरह की धर्मनिरपेक्ष पहचान पर जोर देती है. जिसमें फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन और स्पीच अहम है. यानी अभिव्यक्ति की पूरी आजादी है. दूसरी ओर, फ्रांस के कुछ मुस्लिम नागरिकों और प्रवासी परिवारों का कहना है कि मौजूदा सरकारी ढांचे में उनकी भावनाओं की कद्र नहीं की जाती, और उन्हें बराबरी का व्यवहार नहीं मिलता. इन दोनों के बीच का तनाव लंबे समय से फ्रांसीसी राजनीति का हिस्सा है. लेकिन इस तनाव को समझने और हिंसा को सही ठहराने में बड़ा फर्क है.