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पुराने साथी या पाला बदलकर आए नए समर्थक... मोदी की नई कैबिनेट में किसे मिलेंगे ज्यादा पद?

अब तक मोदी सरकार के दो कार्यकाल में जो मंत्रिमंडल विस्तार हुआ है, तब बीजेपी खुद अपने दम पर बहुमत में थी. सहयोगियों को सम्मान और पद जरूर मिला. लेकिन अबकी बार NDA सरकार का वो मंत्रिमंडल विस्तार है, जहां सहयोगियों की सियासी ताकत बीजेपी के लिए जरूरी है. ऐसे मंत्रिमंडल फेरबदल में चुनौती पुराने साथी बनाम नए दोस्तों के बीच सामंजस्य बनाने की होगी.

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तीन दलों में बगावत के बाद उनके सांसदों ने NDA को समर्थन देने का ऐलान किया है.   (Photo: ITG)
तीन दलों में बगावत के बाद उनके सांसदों ने NDA को समर्थन देने का ऐलान किया है. (Photo: ITG)

मोदी कैबिनेट के विस्तार को लेकर बड़ा सवाल यह है कि NDA से हाल ही में जुड़ने वाले सांसदों का क्या होगा? क्या इन सांसदों में से कुछ को कैबिनेट विस्तार में जगह मिलेगी. हाल ही में आम आदमी पार्टी से अलग होकर 7 सांसद, TMC से अलग होकर 20 सांसद और शिवसेना यूबीटी में टूट के बाद 6 सांसद NDA में शामिल हुए हैं. 

कैबिनेट विस्तार प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है. सवाल आता है कि इस कैबिनेट विस्तार में पुराने सहयोगियों के पद ज्यादा बढ़ेंगे या नए समर्थक सांसदों के. जो बागी सांसद NDA को समर्थन कर चुके हैं, उनको कितने मंत्री पद मिलेंगे? 

ममता बनर्जी की पार्टी के बीस बागी लोकसभा सांसद स्पीकर से मिले और कहा कि वे एनसीपीआई नाम की पार्टी में शामिल हो चुके हैं और देश के विकास में योगदान के लिए नरेंद्र मोदी सरकार को समर्थन करते हैं.

TMC से बगावत करने वाले सांसदों में कौन बनेगा मंत्री

टीएमसी के 20 बागी सांसदों की ये पार्टी इस वक्त NDA को समर्थन करने वाली सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी बन चुकी है. ऐसा इसलिए क्योंकि इसके सांसद नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी से भी ज्यादा हैं. क्या इन बागी सांसदों को मंत्री पद मिलेगा? अगर हां तो किसे? काकोली घोष, सुदीप बंदोपाध्याय, शताब्दी रॉय, माला रॉय, यूसुफ पठान, अरुप चक्रवर्ती समेत ये सारे बागी सांसद समर्थन तो दे चुके हैं. लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इनमें से कोई एक बड़ा नेता है जो इन सबका नेतृत्व करते हुए मंत्री पद हासिल कर सके?

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सबकी नजर इस बात पर है कि जो समर्थन देने वाले नए साथी हैं और जो पुराने सहयोगी हैं, उनमें किसकी संख्या मंत्री पद में ज्यादा रहेगी? TMC के बागी 20 सांसद भले ही NCPI नाम की पार्टी में विलय करके स्पीकर को NDA के समर्थन की चिट्टी दे चुके हैं. लेकिन अभी इनकी संवैधानिक स्थिति को लेकर स्पीकर को फैसला करना बाकी है. साथ ही ममता के बीस बागी सांसद भले एक दल की छतरी के नीचे आकर NDA को समर्थन दें, भले ही इस दल की प्रमुख काकोली घोष बन गई हों, लेकिन चुनौती ये है कि इन बागियों का सबसे बड़ा नेता कौन है?

 AAP से बगावत करने वाले सांसदों में किसको मंत्री पद?

क्या लीडरशिप स्पष्ट ना होने वाला सियासी संकट केजरीवाल का साथ छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए राघव चड्ढा समेत सात सांसदों पर भी रहेगा. यहां भी प्रश्न यही है कि इनका लीडर कौन है? कौन बड़ा है, जिसे मंत्रिमंडल में जगह दी जाएगी.

स्वाति मालीवाल ने राघव चड्ढ़ा के साथ आए सांसदों से पहले ही अपनी लाइन लेंथ अलग कर ली थी. ऐसे में ये नहीं कहा जा सकता है कि राघव ही सबके नेता हैं. तो फिर केजरीवाल के दल से पाला बदलने वाले सांसदों में कौन मंत्रिपरिषद का हिस्सा होगा ये सवाल अभी कायम रहने वाला है. 

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उद्धव का साथ छोड़ने वाले सांसदों को मिलेगी जगह?

आगे बारी शिवसेना- यूबीटी से पाला बदलने वाले 6 सांसदों की आती है. इस बगावत से एकनाथ शिंदे की ताकत और बढ़ी है. लेकिन क्या मोदी मंत्रिमंडल में शिंदे के खाते में नए मंत्री आएंगे?

शिंदे गुट के शिवसेना के सांसदों की संख्या अब 13 हो चुकी है. ये संख्या जेडीयू से ज्यादा है. जेडीयू को अभी मंत्रिमंडल में दो सीटें मिली हैं. एक कैबिनेट में और एक राज्य मंत्री की. तो क्या शिंदे की पार्टी का कोटा बढ़ेगा. अगर बढ़ेगा तो फिर वे पुराने सांसद में से चुने जाएंगे या फिर नए बागी सांसद में से. ये अहम मसला है. 

NDA के बड़े सहयोगी दलों का मंत्रिमंडल में अभी हिस्सा देखें तो जेडीयू से दो, टीडीपी से दो और शिवसेना से केवल एक मंत्री है. तो क्या पुराने सहयोगियों की पावर मंत्रिमंडल में बढेगी? 

जेडीयू, टीडीपी भी चाहेंगे कि नए मंत्रिमंडल विस्तार में अब उनका कोटा बढ़े. अजित पवार की पार्टी से क्या कोई चेहरा मंत्री पद पाएगा? इन सारे सवालों पर चर्चा चल रही है. सरकार के सामने चुनौती यही है कि पुराने साथियों को ज्यादा मौका दिया जाए या फिर नए साथियों को. 

इनपुट- हिमांशु मिश्रा

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