भारत में लंबी दूरी के सफर के लिए अधिकतर लोग ट्रेन का इस्तेमाल करते हैं. लोग ट्रेन से दो- दो दिन लंबी यात्रा कर देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच जाते हैं. ऐसे में इतने लंबे समय तक सफर के दौरान लोगों को टॉयलेट और फ्रेश होने या हैंडवॉश के लिए पानी की जरूरत पड़ती है.
अब सवाल यह उठता है कि ट्रेन के टॉयलेट और वॉश बेसिन में तो बाकायदा नल लगे होते हैं और उनमें से पानी भी आता रहता है, लेकिन इन नलों में पानी की सप्लाई कहां से होती है? आखिर ट्रेन में पानी की टंकी कहां लगी होती है? क्योंकि, ट्रेन में कहीं भी पानी की टंकी दिखाई नहीं देती है, फिर पानी आता कहां से है? पूरे सफर के दौरान निर्बाध रूप से नलों में और टॉयलेट्स में पानी आता रहता है.
ट्रेन के प्रत्येक कोच में पानी की टंकी लगी रहती है. चाहे वो एसी कोच हो या जनरल डिब्बा हो. पुराने तरीके से बने डिब्बों में पानी की टंकियां टॉयलेट के छत के ऊपर रहती है. एक डिब्बे में कुल 3 से 4 पानी की टंकी होती है. वहीं नए और आधुनिक एलएचबी कोचों में पानी की टंकियां नीचे की तरफ फीट की जाती है.
हर डिब्बे में लगे होते हैं इतने पानी के टंकी
एक टंकी में कम से कम 400 से 500 लीटर पानी भरा होता है. इस तरह एक कोच में 1600 से 2000 लीटर पानी हमेशा होता है. पुराने आईसीएफ मॉडल वाले कोच में पानी के टैंक टॉयलेट के ऊपर छत की तरफ फिट होते हैं और यहीं से टॉयलेट के फ्लश और वॉश बेसिन में पानी सप्लाई होती है.
हर टॉयलेट में लगी पानी की टंकी से एक सेंसर जुड़ा होता है जो पानी खत्म होने की स्थिति में ट्रेन पर मौजूद रेल कर्मियों को इसकी सूचना दे देता है. जब ट्रेन चुनिंदा और बड़े स्टेशनों पर रुकती है तो रेलवे कर्मचारी पाइप के जरिए इन टंकियों में दोबारा पानी भरते हैं.यह पानी मुख्य रूप से टॉयलेट फ्लश और वॉशबेसिन के इस्तेमाल के लिए होती है. पीने के लिए इसका इस्तेमाल कभी नहीं करना चाहिए.