एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाकर अस्पताल में भर्ती कराने के मामले में सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई शुरू हुई. वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो की ओर से दाखिल याचिका में उन्हें दूसरे अस्पताल में ट्रांसफर करने की मांग की गई. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पुलिस और अस्पताल प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि कोर्ट के आदेश का गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया.
कोर्ट में क्या दी गईं दलीलें?
सुनवाई की शुरुआत में याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को सिंगल बेंच के उस आदेश का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था कि सोनम वांगचुक की मेडिकल कंडीशन की रेग्युलर निगरानी की जाए और जरूरत पड़ने पर जरूरी मेडिकल सुविधा दी जाए. वकील ने कहा कि अदालत के आदेश में कहीं भी यह नहीं कहा गया था कि उन्हें प्रदर्शन स्थल से जबरन हटाया जाए.
सिब्बल ने अदालत को बताया कि 17 जुलाई की मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध है, जो घटना के अगले दिन की है. इस रिपोर्ट में वांगचुक के ब्लड चेकअप के सभी जरूरी पैरामीटर दर्ज हैं. उन्होंने विशेष रूप से पोटैशियम के लेवल का जिक्र करते हुए कहा कि रिपोर्ट के अनुसार इलेक्ट्रोलाइट्स में पोटैशियम 4.3 था, जबकि सामान्य सीमा 3.5 से 5.1 के बीच मानी जाती है. यानी 17 जुलाई की दोपहर तक उनका पोटैशियम स्तर पूरी तरह सामान्य था.
अदालत ने दिया था स्वास्थ्य निगरानी का निर्देश
सिब्बल ने कहा कि इसके बावजूद बिना किसी पूर्व चेतावनी, बिना परिवार को सूचित किए और बिना ऐसी कोई मेडिकल रिपोर्ट साझा किए, जिससे किसी आपात स्थिति का संकेत मिलता हो, पुलिस बल के साथ सोनम वांगचुक को अचानक प्रदर्शन स्थल से जबरन उठा लिया गया. उन्होंने कहा कि पुलिस ने यह कार्रवाई अदालत के आदेश का हवाला देकर की, जबकि अदालत ने केवल स्वास्थ्य की निगरानी करने का निर्देश दिया था.
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो को इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई. सिब्बल ने अदालत को बताया कि 18 जुलाई को उन्होंने अस्पताल प्रशासन को एक लिखित प्रतिनिधित्व दिया. उन्हें खुद अस्पताल पहुंचकर यह पता लगाना पड़ा कि आखिर हुआ क्या है.
उन्होंने कहा कि अस्पताल में उन्हें केवल मौखिक रूप से बताया गया कि वांगचुक का पोटैशियम लेवल गिर गया था. जब उन्होंने संबंधित मेडिकल रिपोर्ट की कॉपी मांगी तो वह उपलब्ध नहीं कराई गई. सिब्बल ने अदालत से कहा कि यदि वास्तव में कोई चिकित्सकीय आपात स्थिति थी, तो उसका रिकॉर्ड परिवार के साथ साझा किया जाना चाहिए था.
सुनवाई के दौरान सिब्बल ने यह भी कहा कि सोनम वांगचुक उस समय पूरी तरह सचेत, बातचीत करने की स्थिति में और सामान्य अवस्था में थे. अगर प्रशासन को लगता था कि उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाना जरूरी है, तो पहले अदालत से परमिशन लेनी चाहिए थी. उन्होंने तर्क दिया कि अदालत के आदेश का उद्देश्य केवल स्वास्थ्य की निगरानी सुनिश्चित करना था, न कि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध प्रदर्शन स्थल से हटाना. दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं. मामले की सुनवाई आगे भी जारी है.