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14 अगस्त की वो रात, जो आज भी हमारे भीतर खत्म नहीं हुई

14 अगस्त 1947 सिर्फ दो देशों के बनने की तारीख नहीं थी. यह वह दिन भी था, जब कराची में जश्न, दिल्ली में इंतजार और पंजाब-बंगाल में अनिश्चितता साथ-साथ चल रही थी.

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आज 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में याद किया जाता है. (File Photo- ITG)
आज 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में याद किया जाता है. (File Photo- ITG)

14 अगस्त 1947 की सुबह कराची में जश्न की तैयारी थी. पाकिस्तान बनने वाला था. दिल्ली में आजादी की रात का इंतजार था. लेकिन पंजाब के कई घरों में खुशी नहीं, डर था. लोगों को पता ही नहीं था कि कल उनका गांव किस देश में होगा.

एक और बात उन्हें परेशान कर रही थी. पंजाब और बंगाल की सीमा तय करने का काम सर सिरिल जॉन रेडक्लिफ को दिया गया था. लेकिन उनकी बनाई सीमा 14 अगस्त को लोगों के सामने नहीं आई. फैसला 17 अगस्त को बताया गया.

यानी दो मुल्क आजाद हो गए, लेकिन हजारों परिवारों को यह तक नहीं पता था कि उनका घर किस मुल्क में है.

यहीं से कहानी शुरू होती है.

पहले कराची चलते हैं, जहां पाकिस्तान के जन्म का जश्न था. फिर पंजाब जाएंगे, जहां लोग घर छोड़ने को मजबूर हो रहे थे. उसके बाद कोलकाता पहुंचेंगे, जहां गांधी आजादी के जश्न से दूर शांति बचाने में लगे थे. फिर दिल्ली आएंगे, जहां आधी रात को भारत आजाद होने वाला था. और आखिर में देखेंगे कि सीमा सामने आने के बाद क्या हुआ, जब लाखों लोग अपना घर छोड़कर दूसरी तरफ जाने लगे.

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एक तारीख थी. दो नए देश थे. लेकिन उस रात हर किसी की कहानी एक जैसी नहीं थी.

कराची में पाकिस्तान का जन्म और जश्न

13 अगस्त की शाम कराची में लॉर्ड माउंटबेटन के सम्मान में भोज हुआ था. अगले दिन उन्हें पाकिस्तान की संविधान सभा में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी करनी थी. लेकिन माउंटबेटन के लिए यह सिर्फ पाकिस्तान तक की यात्रा नहीं थी. उन्हें कुछ घंटों बाद दिल्ली भी पहुंचना था, जहां उसी रात भारत आजाद होने वाला था.

14 अगस्त की सुबह करीब 9 बजे कराची की मौजूदा सिंध असेंबली बिल्डिंग के बाहर भीड़ जमा थी. अंदर पाकिस्तान की संविधान सभा का विशेष सत्र शुरू हो चुका था. तभी मोहम्मद अली जिन्ना और माउंटबेटन एक खास बग्गी में सवार होकर वहां पहुंचे. बग्गी आगे बढ़ी तो भीड़ ने नारे और तालियों से उनका स्वागत किया.

अंदर का माहौल भी कम खास नहीं था. सभा की सभी सीटें भर चुकी थीं. कुछ ही देर में सत्ता हस्तांतरण की औपचारिक कार्यवाही पूरी हुई और पाकिस्तान के नए देश के रूप में सामने आने की प्रक्रिया पूरी हुई. बाहर भीड़ इस पल का गवाह बन रही थी और अंदर इतिहास लिखा जा रहा था.

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लेकिन माउंटबेटन के पास रुकने का वक्त नहीं था. कार्यवाही खत्म हुई तो वह और जिन्ना उसी बग्गी से गवर्नर जनरल हाउस लौटे. दोपहर करीब 2 बजे माउंटबेटन नई दिल्ली के लिए रवाना हो गए. कराची में एक नए देश के जन्म की रस्म पूरी हो चुकी थी. अब उन्हें उसी दिन रात दिल्ली में दूसरे देश की आजादी का हिस्सा बनना था.

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और यहीं से कहानी एक अजीब मोड़ लेती है. एक तरफ कराची में पाकिस्तान के जन्म का जश्न था. दूसरी तरफ भारत में आजादी की रात करीब आ रही थी. लेकिन इन दोनों के बीच जो लकीर खिंची थी, वह अभी आम लोगों के सामने नहीं आई थी.

पंजाब में ट्रेनें चल रही थीं और घर पीछे छूट रहे थे

14 अगस्त तक पंजाब का माहौल बहुत खराब हो चुका था. बंटवारे की खबर अब सिर्फ अखबार या नेताओं के भाषण की चीज नहीं रह गई थी. वह लोगों के दरवाजे तक पहुंच चुकी थी. हिंदू, मुस्लिम और सिख परिवारों के सामने सवाल था कि वे अपने घरों में रहेंगे या कहीं और चले जाएंगे. बंटवारे के बाद करीब 1.5 करोड़ लोगों ने नई सीमा के एक तरफ से दूसरी तरफ जाने की कोशिश की. कुछ ट्रेन या बस से गए, लेकिन बड़ी संख्या में लोग पैदल निकले. ये काफिले कई-कई मील तक फैल गए. रास्ते में उन पर हमले हुए और शरणार्थियों को ले जाने वाली ट्रेनों पर भी हमले किए गए.  

ट्रेनें सिर्फ लोगों को नहीं ले जा रही थीं. वे एक पूरी जिंदगी को एक जगह से दूसरी जगह खींच रही थीं. किसी के पास कपड़ों की गठरी थी. किसी के पास कुछ गहने. किसी ने बच्चों को सीने से लगा रखा था. किसी के पास बस इतना था कि वह खुद चल सकता था. कहा जाता है कि 15 अगस्त से 8 सितंबर के बीच करीब सात लाख शरणार्थियों ने ट्रेनों के जरिए सीमा पार की. इस दौरान, यात्री डिब्बों के साथ मालगाड़ियों के डिब्बों का भी इस्तेमाल हुआ. कुछ ट्रेनें सुरक्षित पहुंचीं. कुछ रास्ते में हमलों का शिकार हुईं. कुछ ऐसी भी थीं जो जलती हुई या बिल्कुल खामोश पहुंचीं.

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लेकिन यहां एक जरूरी फर्क है. इन सभी घटनाओं को 14 अगस्त की रात का हिस्सा नहीं कहा जा सकता. यह विभाजन के बाद कई दिनों तक चली त्रासदी थी. सबसे बड़ा पलायन नई सीमा की घोषणा के बाद हुआ. 17 अगस्त को जब सीमा सामने आई, तब बहुत से लोगों को पहली बार पता चला कि उनका गांव अब किस देश में है. इसके बाद पलायन और तेज हुआ. करीब डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए. हिंसा में मरने वालों की संख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं. कहीं 7 से 10 लाख तो कहीं 15 से 20 लाख तक मौतों का अनुमान मिलता है. इसलिए इसका कोई एक सटीक आंकड़ा बताना मुश्किल है.

हालांकि, एक बात आंकड़ों से परे थी. लोग घरों से निकले और बहुत से फिर कभी लौट नहीं सके. घर वहीं रह गए, लेकिन उनके भीतर रहने वाली जिंदगी दूसरी तरफ चली गई.

आजादी के दिन गांधी कहां थे?

कराची में पाकिस्तान के जन्म का जश्न तैयार था, पंजाब में बंटवारे की आग फैल रही थी और दिल्ली में आजादी का समारोह होने वाला था. लेकिन महात्मा गांधी इनमें से किसी जगह नहीं थे. वह कलकत्ता में थे.

गांधी ने दिल्ली जाने के बजाय कलकत्ता में रुकना चुना. क्योंकि, उन्हें डर था कि आजादी की खुशी सांप्रदायिक हिंसा में न बदल जाए. 15 अगस्त को जब देश जश्न मना रहा था, वह बेलियाघाटा की हैदरी मंजिल में थे. उनके लिए उस दिन जश्न से ज्यादा जरूरी लोगों के बीच शांति बनाए रखना था. हालांकि, कलकत्ता में 16 से 18 अगस्त के बीच हुई हिंसा में 4,000 से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों घायल हुए.

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कोलकाता में गांधी की मौजूदगी बताती है कि आजादी का दिन हर जगह सिर्फ जश्न का दिन नहीं था. किसी के सामने नए देश को लेकर सवाल थे, तो किसी को अपने घर और पड़ोसी की चिंता थी. गांधी की सबसे बड़ी चिंता यही थी कि आजादी की कीमत इंसानों के खून से न चुकानी पड़े.

दिल्ली में आजादी की रात

उधर दिल्ली में वह रात करीब आ रही थी, जिसका इंतजार पूरे स्वतंत्रता आंदोलन ने किया था. भारत को सत्ता मिलने वाली थी. लॉर्ड माउंटबेटन कराची से निकलकर दिल्ली पहुंच चुके थे. पाकिस्तान में आधी रात का ऐलान हो चुका था और अब भारत की बारी थी. 14 और 15 अगस्त की वह रात भारतीय इतिहास की सबसे यादगार रातों में बदलने वाली थी.

लेकिन उस रात की एक बात अक्सर तस्वीर से बाहर रह जाती है. दिल्ली में जब आजादी की तैयारी हो रही थी, तब देश के कई हिस्सों में लोग पहले ही अपना घर छोड़ चुके थे या छोड़ने की तैयारी कर रहे थे. यही वजह है कि उस रात को सिर्फ रोशनी से देखना पूरी कहानी नहीं बताता. रोशनी के ठीक बाहर बहुत अंधेरा था.

एक तरफ सत्ता हस्तांतरण था. दूसरी तरफ विस्थापन. एक तरफ नया झंडा था. दूसरी तरफ पुराने घरों के दरवाजे. एक तरफ भाषण थे. दूसरी तरफ रास्ते पर चलती भीड़.

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और फिर आधी रात आई. पाकिस्तान में रेडियो पर नए देश की आवाज सुनाई दी थी. भारत में भी आजादी का ऐलान हुआ. अंग्रेजी राज औपचारिक रूप से खत्म हो रहा था. लेकिन सीमा का फैसला अभी लोगों को नहीं बताया गया था. यही बात इस पूरी कहानी को और बेचैन कर देती है. 

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जब नक्शे पर खिंची लकीर ने लोगों की दुनिया बदल दी

1947 में भारत और पाकिस्तान के बीच नई सीमा तय करने की जिम्मेदारी ब्रिटिश वकील सर सिरिल जॉन रेडक्लिफ को मिली. वह जुलाई में भारत आए और उनके पास यह काम पूरा करने के लिए पांच हफ्ते से कुछ ज्यादा का समय था. पुराने नक्शों और जनगणना के आंकड़ों के आधार पर उन्हें पंजाब और बंगाल की सीमा तय करनी थी.

रेडक्लिफ ने जो लकीर खींची उसने गांवों और कस्बों के साथ लोगों की जिंदगी भी बांट दी. लेकिन इस सीमा का ऐलान आजादी के साथ नहीं हुआ. जब सीमा सार्वजनिक हुई तो लाखों लोगों को पहली बार पता चला कि उनका घर किस देश में है. 17 अगस्त 1947 को जब रेडक्लिफ लाइन सार्वजनिक हुई.

इसके बाद जो हुआ वही विभाजन के सबसे बड़े मानवीय संकट में बदल गया. करीब डेढ़ करोड़ हिंदू मुस्लिम और सिख अपने घर छोड़कर दूसरी तरफ चले गए.

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दो देश बने लाखों घर छूट गए

17 अगस्त को सीमा सामने आई तो लाखों लोगों को पहली बार पता चला कि उनका गांव और शहर किस देश में है. इसके बाद पलायन और तेज हो गया. करीब डेढ़ करोड़ हिंदू मुस्लिम और सिख दूसरी तरफ चले गए. कुछ ट्रेन और बस से निकले तो बड़ी संख्या पैदल चलने वालों की थी.

इस सफर के साथ हिंसा भी फैलती गई. शरणार्थी काफिलों और ट्रेनों पर हमले हुए. मौतों का कोई एक तय आंकड़ा नहीं है. अलग-अलग अनुमानों में 5 से 10 लाख से लेकर 15 से 20 लाख तक लोगों के मारे जाने की बात कही जाती है.

महिलाएं भी इस हिंसा से अछूती नहीं रहीं. कई रिपोर्टों और अध्ययनों में अपहरण और यौन हिंसा का जिक्र मिलता है. कुछ अनुमानों में करीब 75 हजार महिलाओं के अपहरण की बात कही गई है. लेकिन विभाजन की त्रासदी सिर्फ मौतों और पलायन के आंकड़ों में नहीं समाती. इसके साथ लाखों घर पीछे छूट गए. दुकानें बंद हुईं. खेत छूटे. रिश्ते टूटे और नई जगहों पर जिंदगी फिर से शुरू करनी पड़ी.

कई जगह पड़ोसियों ने एक-दूसरे को बचाया और दूसरे धर्म के परिवारों को अपने घरों में पनाह दी. फिर भी हिंसा का असर इतना बड़ा था कि लाखों लोगों को सब कुछ छोड़कर निकलना पड़ा. समय के साथ नई बस्तियां बनीं और जिंदगी दोबारा पटरी पर आई. लेकिन जो घर पीछे छूट गए उनकी कहानी वहीं रह गई.

आज 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में याद किया जाता है. इसका मतलब पुरानी नफरत को फिर जगाना नहीं होना चाहिए. इसका मतलब यह याद रखना है कि जब समाज में डर और नफरत बढ़ती है, तो उसकी सबसे बड़ी कीमत आम आदमी चुकाता है. 

14 अगस्त 1947 की रात इसलिए सिर्फ आजादी की रात नहीं थी. वह उस सवाल की रात भी थी, जो आज तक हमारे सामने खड़ा है, देश बांटने के लिए खींची गई एक लकीर के बीच आखिर इंसान कहां खड़ा था?

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