30 जुलाई 2025 की वो तारीख मेरे करियर का हाई-वोल्टेज मैच थी. दरअसल, इसी दिन मैंने आजतक डिजिटल टीम में अपनी पारी शुरू की. मेरा नाम धीरज पांडेय है. फिलहाल यहां सब एडिटर की जिम्मेदारी निभा रहा हूं. मेरा ठिकाना होमपेज की वो हॉट सीट है, जहां हर सेकंड एक नई हेडलाइन जन्म लेती है. यहां कभी-कभी हालात सुपरओवर जैसे चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं, पर मेरी कोशिश रहती है कि इंटरनेट के शोर और गूगल के बदलते मिजाज के बीच, आप तक सिर्फ वो खबर पहुंचे जो मिडल ऑफ द बैट लगी हो. यानी एकदम खरी और सटीक. डिजिटल दुनिया के बदलते पैमानों के बीच बिना किसी लाग-लपेट के सबसे विश्वसनीय जानकारी आप तक पहुंचाना ही मेरा असल धर्म है, क्योंकि रफ्तार के इस दौर में भी खबर की साख ही मैच जिताती है.
पत्रकारिता का असली चस्का मुझे अप्रैल 2024 के आसपास लगा, जब समझ आया कि एक सही खबर किसी फिल्म के दमदार क्लाइमेक्स जैसी असरदार हो सकती है. सफर की शुरुआत लोकमत हिंदी में बतौर इंटर्न हुई, जहां मैंने खबर की पिच को समझना सीखा. वहां से निकले तो टीवी9 के गलियारों में पहुंचे और राजनीति की बिसात पर वो सच पकड़ा जो अक्सर बैकग्राउंड में छिप जाता है. इसके बाद किसान इंडिया के साथ जुड़ाव हुआ, जहां मैंने चमक-धमक से दूर भारत के असल अन्नदाता की सिसकियों और उसकी कामयाबी को स्क्रिप्ट की तरह पिरोया. आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि किताबें रास्ता तो दिखा देती हैं, असल काम और सलीके से चलना तो न्यूजरूम के रोज के अनुभव और वहां की चुनौतियां ही सिखाती हैं.
मेरी कहानी शुरू होती है संगम की रेती और इंकलाब की धरती प्रयागराज से. कहते हैं कि इलाहाबाद की हवाओं में ही राजनीति और साहित्य घुला हुआ है, तो मैं भी उससे अछूता कैसे रहता? साल 2014 से 2017 के बीच मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया. ये वो दौर था जब कैंपस की बहसों ने मुझे दुनिया को एक अलग नजरिए से देखना सिखाया. इसके बाद पत्रकारिता की रग समझी तो राजर्षि टंडन विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म में मास्टर्स की डिग्री ली, लेकिन दिल हमेशा क्रिकेट और सिनेमा के किस्सों में अटका रहा. फिलहाल मेरा दिल सियासत की खबरों में कुछ ज्यादा ही लगता है. दिलचस्पी की बात करें तो, मेरी रुचि ऐसी कहानियों को तलाशने में रहती है जो सिर्फ हेडलाइन न बनें, बल्कि पूरे खेल की परतें खोलकर रख दें. खबरों की भागदौड़ और की-बोर्ड की खटखट से ब्रेक मिलते ही मेरी दुनिया बदल जाती है. तब या तो मैं क्रिकेट के मैदान पर रोमांच ढूंढता हूं या फिर सिनेमा की कहानियों में सुकून.
एक और बात, मुझे लफ्जों से खेलना पसंद है. शायरी का पुराना शौक है, जो शायद प्रयागराज की ही देन है. बस, खबरों के इस सफर में अपनी पहचान पुख्ता करने और आप तक सत्य पहुंचाने की ये जद्दोजहद जारी है.